धान के हाइब्रिड बीजों पर विवाद! पंजाब चाहता है बैन, केंद्र बोला- जांच के बाद होगा फैसला

हाइब्रिड धान को लेकर सबसे बड़ा विवाद 2024 में सामने आया था. मिलर्स का कहना था कि वे हाइब्रिड और सामान्य धान को अलग-अलग पहचान नहीं पा रहे हैं. ऐसे में कम रिकवरी वाले धान की वजह से उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है. इसी विरोध में कई मिलर्स ने मंडियों से धान उठाना बंद कर दिया था.

नई दिल्ली | Updated On: 9 May, 2026 | 01:00 PM

Punjab paddy controversy: पंजाब में हाइब्रिड धान बीजों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से मांग की है कि सभी हाइब्रिड गैर-बासमती धान किस्मों को डिनोटिफाई किया जाए, ताकि राज्य में इन बीजों की बिक्री पर रोक लगाई जा सके. हालांकि केंद्र सरकार इस मामले में जल्दबाजी के मूड में नहीं दिख रही है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की रिपोर्ट में इन बीजों को तय मानकों पर सही पाया गया है. ऐसे में केंद्र ने साफ कर दिया है कि किसी भी फैसले से पहले पूरे मामले की जांच और राज्य सरकार से बातचीत की जाएगी.

यह मामला अब किसानों, मिलर्स, बीज कंपनियों और सरकार के बीच बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. क्योंकि एक तरफ किसान अधिक पैदावार के लिए हाइब्रिड बीजों की ओर बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर मिलर्स इन किस्मों से होने वाली कम मिलिंग रिकवरी को लेकर परेशान हैं.

आखिर क्या है पूरा विवाद?

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, पंजाब सरकार ने केंद्र को पत्र लिखकर मांग की है कि हाइब्रिड गैर-बासमती धान की सभी किस्मों को अधिसूचना सूची से हटाया जाए. इसे डिनोटिफिकेशन कहा जाता है. अगर केंद्र ऐसा करता है तो पंजाब सरकार राज्य के कानून के तहत इन बीजों की बिक्री पर रोक लगा सकेगी. दरअसल, पंजाब पहले भी इन बीजों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर चुका है, लेकिन मामला अदालत तक पहुंच गया था.

साल 2024 में पंजाब सरकार ने कुछ हाइब्रिड धान बीजों पर रोक लगाई थी. बाद में अगस्त 2025 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस प्रतिबंध को रद्द कर दिया. हालांकि अदालत ने यह भी कहा था कि राज्य सरकार गैर-अधिसूचित बीजों की बिक्री रोक सकती है. इसी वजह से अब पंजाब केंद्र से डिनोटिफिकेशन की मांग कर रहा है.

पंजाब सरकार को क्यों है आपत्ति?

राज्य सरकार और राइस मिलर्स का कहना है कि कुछ हाइब्रिड धान किस्मों से चावल की रिकवरी कम हो रही है. मिलिंग रिकवरी का मतलब यह होता है कि धान से कितना चावल निकलता है. भारतीय खाद्य निगम (FCI) के लिए धान की प्रोसेसिंग करते समय कम से कम 67 प्रतिशत मिलिंग रिकवरी और 55 प्रतिशत अखंडित चावल का मानक जरूरी होता है. पंजाब सरकार का दावा है कि कई हाइब्रिड किस्में इस मानक को पूरा नहीं कर पा रही हैं. इससे मिलर्स को नुकसान उठाना पड़ता है.

2024 में क्यों हुई थी मिलर्स की हड़ताल?

हाइब्रिड धान को लेकर सबसे बड़ा विवाद 2024 में सामने आया था. मिलर्स का कहना था कि वे हाइब्रिड और सामान्य धान को अलग-अलग पहचान नहीं पा रहे हैं. ऐसे में कम रिकवरी वाले धान की वजह से उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है. इसी विरोध में कई मिलर्स ने मंडियों से धान उठाना बंद कर दिया था. इसका असर सीधे किसानों पर पड़ा. मंडियों में धान का उठाव धीमा हो गया और किसानों को अपनी फसल बेचने में परेशानी हुई. स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि किसानों ने कई जगह प्रदर्शन भी किए थे.

केंद्र सरकार क्यों बरत रही सावधानी?

केंद्र सरकार इस पूरे मामले में बहुत सतर्क नजर आ रही है. खबर के मुताबिक अगर बिना मजबूत कानूनी आधार के इन बीजों को डिनोटिफाई किया गया तो बीज कंपनियां अदालत का रुख कर सकती हैं. सरकार यह भी देख रही है कि हाइब्रिड धान की खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा बनती जा रही है. इसलिए केंद्र बिना वैज्ञानिक जांच और व्यापक चर्चा के कोई फैसला नहीं लेना चाहता.

ICAR की रिपोर्ट में क्या सामने आया?

ICAR की विशेषज्ञ रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के बाद जारी की गई सभी 23 हाइब्रिड धान किस्में मिलिंग रिकवरी के तय मानकों पर खरी उतरी हैं. यानी इन किस्मों में 67 प्रतिशत मिलिंग रिकवरी और 55 प्रतिशत अखंडित चावल का स्तर पाया गया. यही वजह है कि केंद्र सरकार तुरंत प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं दिख रही.

किसान क्यों पसंद कर रहे हैं हाइब्रिड बीज?

हालांकि हाइब्रिड धान बीज महंगे होते हैं, फिर भी पंजाब के किसान तेजी से इन्हें अपना रहे हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक हाइब्रिड धान से सामान्य किस्मों की तुलना में करीब 25 प्रतिशत तक ज्यादा पैदावार मिलती है. यही इसकी सबसे बड़ी वजह है. हालांकि इन बीजों की कीमत सामान्य बीजों से करीब तीन गुना ज्यादा होती है. साथ ही इनमें उर्वरक और देखभाल की जरूरत भी अधिक पड़ती है. इसके बावजूद किसान इन्हें इसलिए पसंद कर रहे हैं क्योंकि पंजाब में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर धान की खरीद की पूरी गारंटी मिलती है.

बीज कंपनियों पर भी असर पड़ सकता है

अगर भविष्य में केंद्र सरकार डिनोटिफिकेशन का फैसला लेती है तो इसका असर बीज कंपनियों पर भी पड़ेगा. हाइब्रिड बीजों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और कई निजी कंपनियां इसमें बड़े स्तर पर काम कर रही हैं. ऐसे में प्रतिबंध लगने पर कंपनियों को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है.

किसानों के सामने क्या है सबसे बड़ी चिंता?

किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर अचानक हाइब्रिड बीजों पर रोक लग गई तो उन्हें दूसरी किस्मों की ओर लौटना पड़ेगा. कई किसान पहले ही इन बीजों पर खर्च कर चुके हैं और आने वाले खरीफ सीजन की तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में किसी भी फैसले का असर सीधे उनकी खेती और आय पर पड़ेगा.

फिलहाल केंद्र सरकार ने साफ किया है कि पंजाब सरकार के साथ चर्चा के बाद ही कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा. संभावना है कि आने वाले समय में केंद्र, पंजाब सरकार, वैज्ञानिकों, मिलर्स और किसानों के साथ बैठक कर इस मुद्दे का समाधान निकालने की कोशिश करेगा.

 

Published: 9 May, 2026 | 12:58 PM

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