क्या होता है KVK और क्यों अलग है विदिशा का नया मॉडल कृषि विज्ञान केंद्र….
जानिए कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) क्या होता है, इसका काम क्या है और विदिशा में बनने वाला मॉडल KVK किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है. दावा है कि यह KVK किसानों को वैज्ञानिक खेती, एग्री क्लीनिक, मशीन बैंक और आधुनिक कृषि तकनीकों की सुविधाएं उपलब्ध कराएगा.
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में नए कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के भूमिपूजन के बाद एक सवाल उठता है. खासतौर पर उनके मन में, जो खेती–किसानी से सीधे जुड़े हुए नहीं हैं. सवाल यह है कि आखिर केवीके इतना अहम क्यों होता है… या सीधे–सीधे कहें तो जिस देश में आदिकाल से खेती हो रही है, वहां यह इतना जरूरी क्यों है. उससे भी पहले यह सवाल कि आखिर आखिर KVK होता क्या है और किसानों के लिए इसकी उपयोगिता क्या है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस मॉडल KVK की घोषणा की है, उसे देश के सबसे आधुनिक कृषि प्रशिक्षण केंद्रों में शामिल करने की योजना है. इस आधुनिक मॉडल से क्या फायदा होगा.
KVK यानी कृषि विज्ञान केंद्र, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की कृषि विस्तार प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इन केंद्रों का उद्देश्य कृषि अनुसंधान संस्थानों और किसानों के बीच पुल का काम करना होता है। यहां विकसित तकनीकों और वैज्ञानिक सलाह को सीधे किसानों तक पहुंचाया जाता है.
सामान्य भाषा में समझें तो KVK किसानों का प्रशिक्षण केंद्र होता है. यहां फसल उत्पादन, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, कृषि यंत्रीकरण, जैविक खेती और मूल्य संवर्धन जैसी गतिविधियों पर प्रशिक्षण दिया जाता है. साथ ही नई किस्मों और तकनीकों का प्रदर्शन भी किया जाता है.
खेती की जमीन कम होने की चुनौती
भारत में 85 प्रतिशत से ज्यादा किसान छोटे और सीमांत वर्ग में आते हैं. खेती योग्य भूमि लगातार छोटी होती जा रही है. ऐसे में केवल गेहूं, धान या सोयाबीन जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहना किसानों के लिए आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए आधुनिक केवीके की जरूरत है, जो मॉडल केवीके की तरह उभरे. यही बात शिवराज सिंह चौहान ने कही है.
विदिशा में प्रस्तावित मॉडल KVK की विशेषता यह होगी कि यहां केवल कक्षाओं में प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, बल्कि खेतों में लाइव डेमो होंगे. किसान अपनी आंखों से नई तकनीकों को काम करते हुए देख सकेंगे. इससे तकनीकों को अपनाने की संभावना भी बढ़ेगी. फसल उत्पादन के साथ बागवानी, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, मत्स्य पालन और प्रसंस्करण गतिविधियों को जोड़कर खेती को अधिक लाभकारी बनाने की योजना है.
इस केंद्र में होगा फसलों का अस्पताल
इस केंद्र में एग्री क्लीनिक की स्थापना भी प्रस्तावित है. इसे फसलों का अस्पताल कहा जा सकता है. किसान अपनी फसल, मिट्टी या पौधों के नमूने लेकर आएंगे और विशेषज्ञ वैज्ञानिक उनकी समस्याओं का समाधान बताएंगे.
इसके अलावा मशीन बैंक, कस्टम हायरिंग सेंटर, आधुनिक सिंचाई तकनीकों के प्रदर्शन, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, नर्सरी विकास, फूड प्रोसेसिंग और कृषि स्टार्टअप को बढ़ावा देने जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी.
विशेषज्ञों के अनुसार कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका भविष्य में और बढ़ने वाली है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लागत और बदलते बाजार के बीच किसानों को लगातार नई जानकारी और तकनीकों की जरूरत पड़ रही है. ऐसे में विदिशा का मॉडल KVK केवल एक जिला स्तरीय परियोजना नहीं बल्कि कृषि विस्तार तंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है.
क्या मिट पाएगी तकनीक और किसान के बीच की दूरी
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय कृषि की सबसे बड़ी समस्या “तकनीक और किसान के बीच की दूरी” रही है. कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में विकसित तकनीक अक्सर खेत तक नहीं पहुंच पाती. समस्या यही है कि अब तक खेती को लेकर बड़ी-बड़ी बातें होती रही हैं. लेकिन सच्चाई यही है कि अब तक की योजनाएं उस तरह धरातल पर नहीं उतर पाईं, जैसा होना चाहिए. किसानों से बात करके समझ आता है कि वैज्ञानिकों के साथ उनकी साझेदारी नहीं रही है और दोनों पक्ष की सोच आपस में मिलती नहीं दिखती.
यह सही है कि केंद्र सरकार का फोकस अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है. खेती को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुरूप बनाना, पानी की बचत करना, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना और किसानों की आय बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है. इसी वजह से कार्यक्रम में ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर, डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) और लेजर लेवलिंग जैसी तकनीकों पर विशेष जोर दिया गया. लेकिन असली सवाल यही है कि केवीके अपना काम उस तरह कर पाएंगे, जैसी उम्मीद किसानों और सरकार दोनों को है या इस बार भी सारी बातें जमीन से ऊपर ही रह जाएंगी.