पशु के पेट में फंसी पॉलीथिन बन सकती है जानलेवा, समय रहते पहचानें खतरे के संकेत
शहरों में खुले कचरे के साथ फेंकी जा रही पॉलीथिन पशुओं के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है. इसे खाने से उनके पेट में गंभीर समस्या पैदा हो सकती है. समय रहते लक्षण पहचानना और सावधानी बरतना जरूरी है, ताकि मूक पशुओं की जान बचाई जा सके.
Animal Health : सुबह-सुबह गली के मोड़ पर कचरे के ढेर के पास खड़ी एक गाय, सब्जियों के छिलकों के साथ पन्नी भी निगल लेती है. उसे क्या पता कि यही पन्नी कुछ दिनों बाद उसके लिए जान का खतरा बन जाएगी. शहरों और कस्बों में खुले कचरे के बीच भटकते पशु आज एक ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं, जिस पर अक्सर किसी का ध्यान नहीं जाता. पॉलीथिन और प्लास्टिक अब मूक जानवरों के पेट में फंसकर उन्हें धीरे-धीरे बीमार कर रहे हैं.
कचरे की पन्नी कैसे बन रही है मुसीबत
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, घरों से निकलने वाला किचन वेस्ट अक्सर पॉलीथिन में बांधकर खुले में फेंक दिया जाता है. पशु इसे भोजन समझकर खा लेते हैं. सब्जियों के छिलकों के साथ पन्नी भी उनके पेट में चली जाती है. यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब पशु रोज ऐसे कचरे के संपर्क में आते हैं. पॉलीथिन न तो पचती है और न ही शरीर से बाहर निकल पाती है, जिससे यह पेट में जमा होती जाती है और अंदर ही अंदर नुकसान करने लगती है.
जुगाली करने वाले पशु ज्यादा जोखिम में
गाय, भैंस, बकरी और भेड़ जैसे जुगाली करने वाले पशु इस खतरे में सबसे आगे हैं. खासतौर पर गाय, जिसे अक्सर खुला छोड़ दिया जाता है. भोजन की तलाश में वह कचरे के ढेर तक पहुंच जाती है. पेट के अंदर जमा पॉलीथिन धीरे-धीरे रुकावट पैदा करती है, जिससे पाचन क्रिया बिगड़ जाती है. कई बार शरीर में खनिज तत्वों की कमी के कारण भी पशु असामान्य चीजें खाने लगते हैं, जैसे दीवार चाटना या मिट्टी निगलना, और यही आदत आगे चलकर बड़ी बीमारी का कारण बनती है.
पेट में गैस और अफरा, पहला खतरे का संकेत
अगर पशु ने पॉलीथिन खा ली है, तो इसका पहला संकेत पेट में बार-बार गैस बनना होता है. दवा देने पर भी गैस ठीक न हो और समस्या लौट-लौट कर आए, तो सतर्क हो जाना चाहिए. पेट और बाईं कोख का फूलना, अफरा पड़ना, खाना कम कर देना, बार-बार उठना-बैठना और बेचैनी इसके आम लक्षण हैं. गंभीर हालत में नाक या मुंह से अधपचा भोजन निकल सकता है. लंबे समय तक इलाज न होने पर स्थिति इतनी बिगड़ सकती है कि ऑपरेशन तक की जरूरत पड़ जाए.
बचाव ही सबसे बड़ा इलाज
पशुपालकों के लिए जरूरी है कि वे पशुओं को कचरे वाले इलाकों में खुला न छोड़ें. समय-समय पर डेवर्मिंग कराएं और खनिज मिश्रण दें, ताकि शरीर में जरूरी तत्वों की कमी न हो. पर्याप्त रेशेदार चारा देने से भी पशु इधर-उधर कुछ भी खाने से बचते हैं. वहीं समाज के स्तर पर यह जिम्मेदारी बनती है कि किचन वेस्ट को पॉलीथिन में बांधकर खुले में न फेंका जाए. थोड़ी सी सावधानी और समय पर ध्यान से कई मूक जानों को बचाया जा सकता है.