गुजरात के गिर जंगल इलाके में दो शेर के शावकों और तीन शेरों की मौत के बाद वन्य जीवों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर बहस छिड़ गई है. वहीं, बेबेसिया वायरस की वजह से मौत होने की बात कही गई है. वेटनेरी डॉक्टरों का कहना है कि इस वायरस के चलते खांसी, कमजोरी और नाक बहने की दिक्कत होती है, जिसकी वजह से शावकों की जान चली गई. अब पशु चिकित्सक जंगल में वायरस फैलने से रोकने के लिए तेजी से जुटे हैं.
गुजरात के वन मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने मंगलवार को जारी बयान में कहा कि दो शावकों की मौत बेबेसिया वायरस इन्फेक्शन की वजह से हुई है. जबकि तीन अन्य बड़े शेरों की मौत अलग-अलग घटनाओं में प्राकृतिक कारणों और आपसी लड़ाई की वजह से हुई है. पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार मंत्री के बयान कहा गया कि कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि शेरों की मौत बेबेसिया वायरस से हुई है. केवल दो संदिग्ध शेरों की मौत का कारण इस वायरल इन्फेक्शन को माना गया है. बाकी शेरों की मौत या तो आपसी लड़ाई या अन्य कारणों से हुई है.
जानलेवा है बेबेसिया वायरस
बयान में कहा गया कि बेबेसिया वायरस टिक्स (कीड़ों) के जरिए फैलता है और इससे प्रभावित जानवरों में कमजोरी, खांसी और नाक से पानी बहने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. मंत्री ने कहा कि वन विभाग के अधिकारी और पशु चिकित्सकों की टीमें बेबेसिया वायरस के फैलाव को रोकने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही हैं. उन्होंने कहा कि अधिकारी संदिग्ध शेरों की पहचान कर रहे हैं, सैंपल इकट्ठा कर रहे हैं और उनका इलाज कर रहे हैं. साथ ही बचाव के उपायों के तौर पर जानवरों से टिक्स हटाने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं.
बीमारी को जंगल में फैलने से रोकने के लिए जुटे चिकित्सक
गुजरात के वन मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कि वन विभाग पूरी तरह से तैयार है और यह सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है कि यह बीमारी जंगल के इलाके में और न फैले. किसी को भी चिंता करने की जरूरत नहीं है. पशु चिकित्सकों की टीम इस वायरस के संक्रमण को रोकने और इलाज पर काम कर रही है. उन्होंने कहा कि घबराने या चिंता करने की बात नहीं है.
मुख्य वन संरक्षक ने क्या कहा
प्रधान मुख्य वन संरक्षक जयपाल सिंह ने पीटीआई से कहा कि ये मौतें अलग-अलग घटनाएं थीं और इनमें “कुछ भी असामान्य नहीं” था. ऐसी घटनाएं इसलिए होती हैं क्योंकि शावकों के जीवित रहने की दर आम तौर पर केवल 50 फीसदी होती है. हालांकि, पशु चिकित्सा सुविधाओं में बढ़ोतरी, निगरानी और लगातार शेरों पर नजर रखने वाले ट्रैकर्स की वजह से हम मृत्यु दर को बहुत कम रखने में सफल रहे हैं. उन्होंने बताया कि जिन दो शावकों की मौत हुई, वे बहुत छोटे थे. जबकि दो अन्य शेरों की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई और एक शेर की मौत आपसी लड़ाई के बाद हुई.