अरुणाचल के जंगल में छिपा था अनमोल खजाना! पहली बार मिला ये दुर्लभ पौधा, वैज्ञानिक भी हैरान

अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है. शोधकर्ताओं ने पहली बार भारत में ओफियोपोगोन जैपोनिकस पौधे को दर्ज किया है. 2,185 मीटर की ऊंचाई पर मिला यह दुर्लभ पौधा पूर्वी हिमालय की अनोखी जैव विविधता को उजागर करता है और संरक्षण की जरूरत भी बताता है.

नोएडा | Published: 3 Sep, 2026 | 03:57 PM

अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग जिले से वनस्पति विज्ञान से जुड़ी एक अहम खोज सामने आई है. शोधकर्ताओं ने यहां एक ऐसी दुर्लभ पौध प्रजाति ओफियोपोगोन जैपोनिकस को दर्ज किया है, जिसे इससे पहले भारत की वनस्पतियों में आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं किया गया था. इस खोज के बाद भारत की वनस्पति सूची में एक नई प्रजाति जुड़ गई है. साथ ही, पूर्वी हिमालय की समृद्ध जैव विविधता एक बार फिर चर्चा में आ गई है. यह खोज भारतीय वन्यजीव संस्थान और पश्चिम बंगाल के उलुबेरिया वनस्पति संस्थान के शोधकर्ताओं ने की है. शोध के निष्कर्ष विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा किए गए एक शोध पत्र में प्रकाशित किए गए हैं.

अरुणाचल में 2,185 मीटर की ऊंचाई पर मिला पौधा

शोधकर्ताओं ने मई 2025 में वनस्पति सर्वेक्षण के दौरान  इस पौधे को पश्चिम कामेंग जिले में खोजा था. यह पौधा समुद्र तल से करीब 2,185 मीटर की ऊंचाई पर एक नम और छायादार जगह में मिला. यह स्थान समशीतोष्ण चौड़ी पत्ती वाले जंगल के किनारे सड़क के आसपास का क्षेत्र था. यह पौधा शेरगांव और ग्युतो मठ के बीच सड़क किनारे उगी वनस्पतियों के बीच मिला. शोधकर्ताओं ने इस पौधे का नमूना एकत्र किया और उसकी बारीकी से जांच की. जांच के बाद इसकी पहचान ओफियोपोगोन जैपोनिकस के रूप में हुई. इस खोज के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. अयान कुमार नस्कर हैं. अध्ययन के बाद शोधकर्ताओं ने इसकी पहचान की पुष्टि की और इसे भारत में पहली बार दर्ज की गई प्रजाति बताया.

घास जैसा दिखता है यह सदाबहार पौधा

ओफियोपोगोन जैपोनिकस एक सदाबहार और कई वर्षों तक जीवित रहने वाला पौधा है. यह जमीन पर घने गुच्छों के रूप में उगता है. इसकी पत्तियां पतली और घास  जैसी होती हैं. पौधे में छोटे सफेद से हल्के बैंगनी रंग के फूल आते हैं. इसके फल नीले रंग के बेर जैसे दिखाई देते हैं. यह पौधा मूल रूप से पूर्वी एशिया का माना जाता है. चीन, जापान, कोरिया और नेपाल में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है. आमतौर पर यह समुद्र तल से करीब 200 से 2,800 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है.

पारंपरिक चिकित्सा में भी उपयोगी है पौधा

ओफियोपोगोन जैपोनिकस की जड़ें कंद जैसी होती हैं. इन जड़ों को चीन में पारंपरिक चिकित्सा  में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है. वहां इन्हें मैडोंग नाम से जाना जाता है. यह पौधा शतावरी कुल के ओफियोपोगोन वंश का हिस्सा है. दुनिया भर में इस वंश की करीब 85 प्रजातियां पाई जाती हैं. इस नई खोज से पहले भारत में इस वंश की सात प्रजातियां दर्ज थीं. इनमें ओफियोपोगोन क्लार्की, ओफियोपोगोन ड्रैकेनोइड्स और ओफियोपोगोन इंटरमीडियस जैसी प्रजातियां शामिल हैं.

सड़क किनारे का प्राकृतिक क्षेत्र बना खतरे की वजह

शोधकर्ताओं ने इस पौधे के भविष्य  को लेकर चिंता भी जताई है. इसकी वजह यह है कि भारत में मिली इसकी आबादी सड़क किनारे के प्राकृतिक क्षेत्र में मौजूद है. सड़क निर्माण और भूस्खलन जैसी घटनाओं से इसका प्राकृतिक आवास प्रभावित हो सकता है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, पूर्वी हिमालय वनस्पतियों और जैव विविधता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इसके कई हिस्सों का अभी भी पूरी तरह अध्ययन नहीं हुआ है. ऐसे में ओफियोपोगोन जैपोनिकस की खोज इस क्षेत्र में मौजूद अन्य दुर्लभ और अब तक अनजान पौधों की प्रजातियों की पहचान की संभावना भी बढ़ाती है. साथ ही, यह खोज हिमालयी क्षेत्र के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखने की जरूरत को भी सामने लाती है.

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