अरुणाचल के जंगलों में मिला 188 साल से लापता ब्लूबेरी परिवार का दुर्लभ पौधा, वैज्ञानिक भी हैरान

अरुणाचल प्रदेश को देश के सबसे समृद्ध वनस्पति क्षेत्रों में गिना जाता है और यह वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है. 188 साल बाद इस दुर्लभ पौधे का दोबारा मिलना यह साबित करता है कि भारत के जंगलों में अभी भी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं, जिनके बारे में दुनिया को बहुत कम जानकारी है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 30 May, 2026 | 07:56 AM

Vaccinium piliferum: भारत की जैव विविधता को लेकर एक बेहद अहम और उत्साहजनक खोज सामने आई है. अरुणाचल प्रदेश के घने जंगलों में वैज्ञानिकों ने एक ऐसे दुर्लभ पौधे को फिर से खोज निकाला है, जिसे लगभग 188 वर्षों से नहीं देखा गया था. यह पौधा “वैक्सीनियम पिलिफेरम” नाम से जाना जाता है और इसे ब्लूबेरी का जंगली संबंधी माना जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह खोज न केवल वनस्पति विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध जैव विविधता को भी दुनिया के सामने उजागर करती है.

लगभग दो सदियों बाद मिला पौधा

इस दुर्लभ पौधे का पहला रिकॉर्ड वर्ष 1836 में दर्ज किया गया था. उस समय ब्रिटिश वनस्पतिशास्त्री विलियम ग्रिफिथ ने इसे मिश्मी हिल्स क्षेत्र से एकत्र किया था. इसके बाद 1850 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जोसेफ डाल्टन हूकर और टी. थॉमसन ने मेघालय के खासी हिल्स में इसका उल्लेख किया.

इसके बाद करीब 188 वर्षों तक इस प्रजाति का कोई प्रमाणित रिकॉर्ड नहीं मिला. लंबे समय तक गायब रहने के कारण वैज्ञानिक समुदाय इसे लेकर चिंतित था. अब 2026 में इसकी दोबारा खोज ने शोधकर्ताओं को नई उम्मीद दी है.

अरुणाचल के जंगलों में हुई खोज

यह महत्वपूर्ण खोज अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले के विजयनगर क्षेत्र में की गई है. शोधकर्ताओं ने फील्ड सर्वे के दौरान इस पौधे को नोआ-दिहिंग नदी की सहायक धाराओं के आसपास खोजा.

यह पौधा समुद्र तल से लगभग 1,150 से 1,280 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया गया. सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों को केवल 16 पौधे मिले, जो करीब 2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए थे. इतनी कम संख्या में मौजूदगी इस प्रजाति की दुर्लभता को दर्शाती है.

ब्लूबेरी परिवार से जुड़ा है यह पौधा

वैक्सीनियम पिलिफेरम “एरिकेसी” परिवार और “वैक्सीनियम” वंश का सदस्य है. इसी वंश में ब्लूबेरी जैसे लोकप्रिय फल भी शामिल हैं. यह एक चढ़ने वाली झाड़ी के रूप में विकसित होता है और पहाड़ी तथा ठंडे क्षेत्रों में पाया जाता है. हालांकि ब्लूबेरी की कई प्रजातियां दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आसानी से मिल जाती हैं, लेकिन वैक्सीनियम पिलिफेरम बेहद दुर्लभ माना जाता है. यही वजह है कि इसकी पुनः खोज को बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि माना जा रहा है.

संरक्षण की बढ़ी जरूरत

वैज्ञानिकों ने इस पौधे के सभी 16 नमूनों के जीपीएस स्थान दर्ज कर लिए हैं, ताकि भविष्य में उनकी निगरानी और संरक्षण किया जा सके. यह प्रजाति पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में “संकटग्रस्त” यानी Endangered श्रेणी में शामिल है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखा जाए तो इस प्रजाति को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है.

भारत की जैव विविधता के लिए बड़ी उपलब्धि

यह खोज पूर्वी हिमालय क्षेत्र की अनूठी जैव विविधता को भी उजागर करती है. अरुणाचल प्रदेश को देश के सबसे समृद्ध वनस्पति क्षेत्रों में गिना जाता है और यह वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है. 188 साल बाद इस दुर्लभ पौधे का दोबारा मिलना यह साबित करता है कि भारत के जंगलों में अभी भी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं, जिनके बारे में दुनिया को बहुत कम जानकारी है. यह खोज भविष्य में वनस्पति अनुसंधान और संरक्षण प्रयासों को नई दिशा दे सकती है.

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