बासमती चावल को ऑस्ट्रेलिया में झटका! APEDA की ट्रेडमार्क अपील खारिज, GI सुरक्षा पर उठे सवाल
Basmati Rice: ऑस्ट्रेलिया की फेडरल कोर्ट ने बासमती चावल के नाम को ट्रेडमार्क के रूप में दर्ज कराने की APEDA की अपील खारिज कर दी है. कोर्ट ने माना कि 'Basmati rice' शब्द APEDA से प्रमाणित और गैर-प्रमाणित उत्पादों में पर्याप्त अंतर नहीं बताता.
Basmati Trademark Australia: भारत के मशहूर बासमती चावल को लेकर ऑस्ट्रेलिया से एक अहम खबर सामने आई है. ऑस्ट्रेलिया की फेडरल कोर्ट ने भारतीय कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) की अपील खारिज कर दी है. APEDA ने ऑस्ट्रेलिया में केवल ‘Basmati rice’ नाम को सर्टिफिकेशन ट्रेडमार्क के तौर पर दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन अदालत ने इसे मंजूरी देने से इनकार कर दिया. अदालत के इस फैसले के बाद भारत में बासमती चावल की भौगोलिक पहचान यानी GI सुरक्षा को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है. बासमती भारत के प्रमुख कृषि उत्पादों में शामिल है और इसके निर्यात से देश को बड़ा विदेशी मुद्रा लाभ मिलता है.
कोर्ट ने क्यों खारिज की APEDA की अपील?
ऑस्ट्रेलियाई फेडरल कोर्ट ने कहा कि ‘Basmati rice’ नाम से यह पता नहीं चलता कि चावल APEDA से प्रमाणित है या नहीं. कोर्ट ने ऑस्ट्रेलिया के ट्रेड मार्क्स एक्ट 1995 की धारा 177(2) का हवाला देते हुए कहा कि सर्टिफिकेशन ट्रेडमार्क ऐसा होना चाहिए, जिससे प्रमाणित और गैर-प्रमाणित उत्पादों के बीच साफ अंतर पहचाना जा सके.
APEDA ने पहले ऑस्ट्रेलियाई ट्रेडमार्क कार्यालय के फैसले के खिलाफ अदालत का रुख किया था. जनवरी 2023 में ट्रेडमार्क कार्यालय ने आवेदन खारिज कर दिया था. अब फेडरल कोर्ट ने भी उस फैसले को बरकरार रखा है.
पाकिस्तान का भी है बासमती पर दावा
मामले में एक बड़ी अड़चन यह है कि ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के सामने बासमती को केवल भारत से जुड़ा उत्पाद साबित करना आसान नहीं रहा. ऑस्ट्रेलियाई ट्रेडमार्क कार्यालय ने नेशनल लाइब्रेरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया के उपलब्ध रिकॉर्ड का भी हवाला दिया था, जिनमें बासमती के साथ पाकिस्तान को भी इसके मूल स्थान के तौर पर बताया गया था. इसी वजह से अदालत ने माना कि APEDA यह साबित नहीं कर सका कि ‘Basmati rice’ नाम केवल APEDA से प्रमाणित उत्पादों को ही अलग पहचान देता है.
भारत की GI रणनीति पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भारत की GI रणनीति पर गंभीर सवाल उठते हैं. भारत में कई खास कृषि उत्पादों को GI टैग मिला हुआ है, लेकिन विदेशों में उनकी सुरक्षा के लिए अलग-अलग देशों के कानून और व्यापार समझौतों का भी महत्व होता है. GI किसी खास क्षेत्र से जुड़े उत्पाद की पहचान और उसकी खासियत को कानूनी सुरक्षा देने का तरीका है. ऐसे में विशेषज्ञों का सुझाव है कि बासमती जैसे उत्पादों के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर GI सुरक्षा मजबूत करने पर ज्यादा जोर देना चाहिए.
ऑस्ट्रेलिया में नहीं मिली सुरक्षा, दूसरे देशों में भी चुनौती
भारत को बासमती के नाम की सुरक्षा को लेकर ऑस्ट्रेलिया के अलावा न्यूजीलैंड और केन्या जैसे देशों में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. यूरोपीय संघ में भारत का आवेदन जुलाई 2018 से लंबित बताया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि, भारत को अपने मुक्त व्यापार समझौतों यानी FTA में भी ऐसे खास कृषि उत्पादों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए. इससे विदेशों में भारतीय उत्पादों के नाम और पहचान के गलत इस्तेमाल को रोकने में मदद मिल सकती है.
बासमती का भारत के लिए कितना महत्व?
APEDA ने अदालत में दलील दी थी कि 1988 से अगस्त 2018 के बीच भारतीय बासमती की ऑस्ट्रेलिया के खुदरा बाजार में बिक्री 3,06,095 टन से ज्यादा रही, जिसकी कीमत करीब 380 मिलियन डॉलर थी. वहीं, पाकिस्तान से बासमती की बिक्री करीब 44.12 मिलियन डॉलर बताई गई. हालांकि, अदालत ने बिक्री के इन आंकड़ों को सबसे मजबूत सबूत मानने से इनकार किया. अब APEDA के पास इस फैसले को ऑस्ट्रेलिया की अंतिम अपीलीय अदालत यानी हाई कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प मौजूद है.
यह फैसला सिर्फ एक ट्रेडमार्क आवेदन का मामला नहीं है, बल्कि इससे यह सवाल भी जुड़ा है कि भारत अपने खास कृषि उत्पादों की पहचान और बाजार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितनी मजबूत कानूनी सुरक्षा दे पाता है.