GI Tag: देश की पारंपरिक कला, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों को नई पहचान दिलाने के लिए नाबार्ड (NABARD) ने बड़ा कदम उठाया है. नाबार्ड की मदद से देश के 28 नए पारंपरिक उत्पादों को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला है. इससे इन उत्पादों को कानूनी सुरक्षा मिलने के साथ-साथ देश और विदेश के बाजारों में नई पहचान मिलेगी. इस पहल से 13,000 से अधिक कारीगरों और दस्तकारों को बेहतर बाजार मिलेगा, जबकि 50,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलने का रास्ता मजबूत होगा. नाबार्ड का उद्देश्य ग्रामीण कारोबार को बढ़ावा देना और पारंपरिक कला को नई पहचान दिलाना है.
28 नए उत्पादों को मिली खास पहचान
इस बार कई राज्यों के पारंपरिक और प्रसिद्ध उत्पादों को GI टैग मिला है. इनमें बिहार की नालंदा बावनबूटी साड़ी, गया पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट, झारखंड की कुचाई सिल्क साड़ी, असम का बांस शिल्प और बिहू पेपा, हिमाचल प्रदेश की लकड़ी की नक्काशी तथा मध्य प्रदेश का खजुराहो मेटल क्राफ्ट जैसे कई उत्पाद शामिल हैं. GI टैग मिलने से इन उत्पादों की असली पहचान सुरक्षित रहेगी और नकली सामान पर रोक लगाने में भी मदद मिलेगी. अब तक नाबार्ड की मदद से 176 भारतीय उत्पादों को GI टैग मिल चुका है.
कारीगरों को मिलेगा बड़ा बाजार और बेहतर दाम
GI टैग मिलने के बाद इन उत्पादों को देश और विदेश के बाजारों में नई पहचान मिलेगी. इससे कारीगरों को अपनी मेहनत का सही दाम मिलने की संभावना बढ़ेगी. नाबार्ड केवल GI टैग दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि कारीगरों को प्रशिक्षण, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और बड़े बाजारों से जोड़ने का भी काम कर रहा है. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे कारोबार मजबूत होंगे और स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ेगी. साथ ही निर्यात के नए अवसर भी खुलेंगे.
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रोजगार बढ़ाने के लिए नए सेंटर और GI स्टोर
ग्रामीण कारोबार को मजबूत बनाने के लिए नाबार्ड ने कई नए कदम उठाए हैं. देश के तीन बड़े संस्थानों में GI फैसिलिटेशन सेंटर शुरू किए गए हैं, जहां कारीगरों को GI रजिस्ट्रेशन से लेकर उत्पाद की बिक्री तक हर तरह की मदद दी जाती है. इसके अलावा कर्नाटक के ऐहोले में GI स्टोर भी खोला गया है, जहां लोग प्रमाणित और असली GI उत्पाद खरीद सकते हैं. नाबार्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म और बेहतर ब्रांडिंग के जरिए भी इन उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचा रहा है.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया सहारा
इस पहल का सबसे बड़ा फायदा गांवों में रहने वाले कारीगरों और छोटे उद्यमियों को मिलेगा. अब तक 13,000 से अधिक कारीगरों को सीधे बड़े बाजारों से जोड़ा जा चुका है और 50,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार के अवसर मिले हैं. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक और गुजरात सहित कई राज्यों में ग्रामीण उत्पादक संगठन भी इन उत्पादों के निर्माण और प्रचार में सक्रिय हैं. नाबार्ड की यह पहल न सिर्फ पारंपरिक कला को बचाने में मदद करेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती देगी और स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने का रास्ता खोलेगी.