हिमाचल प्रदेश के आठ उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला है. GI टैग प्राप्त करने वाले उत्पादों में सलूणी सफेद मक्का, किन्नौरी सेब, स्पीति का सीबकथॉर्न (छरमा), सिरमौरी लोइया, चंबा मेटल आर्ट, किन्नौरी टोपी, मंडी की सेपूवड़ी और किन्नौरी आभूषण शामिल हैं. अधिकारियों के अनुसार, इन उत्पादों का हिमाचल प्रदेश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और कृषि क्षेत्र में विशेष महत्व है. GI टैग मिलने से इन उत्पादों की पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा और उनकी बाजार में मांग बढ़ने की संभावना है. विशेष रूप से किन्नौरी सेब और स्पीति के सीबकथॉर्न की खेती करने वाले किसानों को इसका बड़ा लाभ मिल सकता है. इससे उनके उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान मिलेगी, जिससे बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद है. GI टैग मिलने के बाद इन उत्पादों की नकल और दुरुपयोग पर रोक लगेगी. साथ ही, स्थानीय किसानों, कारीगरों और पारंपरिक उत्पादकों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी.
सीबकथॉर्न की क्या है खासियत
हिमाचल प्रदेश के स्पीति क्षेत्र में उगने वाला सीबकथॉर्न को स्थानीय भाषा में ‘छरमा’ कहा जाता है. यह अपने औषधीय गुणों और पोषण मूल्य के लिए जाना जाता है. विटामिन-सी से भरपूर होने के कारण इसे विटामिन-सी का राजा’ भी कहा जाता है. ऐसे सीबकथॉर्न एक ऐसी झाड़ी है जो अत्यधिक ठंड और रेतीली मिट्टी वाले क्षेत्रों में आसानी से उगती है. स्पीति में यह प्राकृतिक रूप से पाया जाता है और स्थानीय किसानों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनता जा रहा है. साथ ही, यह पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है.
तीन साल में फल देते हैं पौधे
विशेषज्ञों के अनुसार, सीबकथॉर्न का पौधा द्विलिंगी होता है, यानी नर और मादा फूल अलग-अलग पौधों पर लगते हैं. फल केवल मादा पौधों में आते हैं, इसलिए बेहतर उत्पादन के लिए बागानों में नर और मादा पौधों का संतुलित अनुपात रखा जाता है. इसकी खेती बीज और कलम दोनों तरीकों से की जाती है. कलम से तैयार पौधे दो से तीन साल में फल देने लगते हैं.
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पीएम मोदी भी कर चुके हैं जिक्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई मौकों पर सीबकथॉर्न की विशेषताओं का उल्लेख कर चुके हैं. उन्होंने बताया था कि यह पौधा बेहद कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है और माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी फल देता है. पीएम मोदी ने एक शोध का हवाला देते हुए कहा था कि दुनिया में उपलब्ध सीबकथॉर्न के भंडार में इतनी क्षमता है कि इससे पूरी मानव जाति की विटामिन-सी की जरूरत को पूरा किया जा सकता है. यही वजह है कि इस पौधे को पोषण और स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.
10,000 फीट की ऊंचाई पर होती किन्नौरी सेब की खेती
किन्नौरी सेब अपनी आकर्षक गहरे लाल रंग, बेहतरीन स्वाद और प्राकृतिक मिठास के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है. इसकी खास बात यह है कि यह लंबे समय तक ताजा और सुरक्षित रहता है. हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती है और यह जिला राज्य के कुल सेब उत्पादन में तीसरे स्थान पर है. ऐसे किन्नौर जिले में 11,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सेब की खेती की जाती है. यह इलाका उच्च गुणवत्ता वाले, मीठे और प्राकृतिक तरीके से उगाए गए सेबों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है.
70 हजार मीट्रिक टन सालाना उत्पादन
किन्नौर के सेब 10,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उगाए जाते हैं. ठंडी जलवायु और अनुकूल मौसम के कारण इनमें प्राकृतिक मिठास, बेहतर स्वाद और खास कुरकुरापन पाया जाता है. यही वजह है कि किन्नौरी सेब की देश और विदेश के बाजारों में अच्छी मांग रहती है. मौसम के अनुसार किन्नौर में हर साल औसतन 35 से 36 लाख पेटी सेब का उत्पादन होता है, जो करीब 70 हजार मीट्रिक टन के बराबर है. यह सेब अपने चटख लाल रंग, बेहतरीन स्वाद और लंबे समय तक सुरक्षित रहने की क्षमता के लिए जाना जाता है. ऐसे हिमाचल प्रदेश का कुल सेब कारोबार करीब 5,500 करोड़ रुपये का माना जाता है, जिसमें किन्नौर की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है.
सलूणी घाटी में होती है सफेद मक्का की खेती
हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले की सलूणी घाटी में उगाई जाने वाली सलूणी सफेद मक्का पारंपरिक फसल है. GI मिलने से इस विशेष मक्का की पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा और किसानों को बेहतर बाजार मिलने की उम्मीद है. सलूणी सफेद मक्का अपने उच्च पोषण मूल्य के लिए जानी जाती है. इसमें प्रोटीन, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है और मधुमेह के मरीजों के लिए भी उपयोगी मानी जाती है. इस मक्के से रोटी, हलवा, लड्डू, इडली और सेवइयां जैसे कई पारंपरिक और पौष्टिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं.