आलू फसल पर पिछेता झुलसा बीमारी का खतरा, CPRI ने किसानों को दवा छिड़काव का तरीका बताया

Agriculture Advisory for Potato Farmers : केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने इंडो ब्लाइटकास्ट (पैन इंडिया) पूर्वानुमान मॉडल के अनुसार मौसम की वर्तमान परिस्थितियों में झुलसा बीमारी के फैलने के लिए अनुकूल हैं बताया है और निकट भविष्य में आलू फसल में इसका प्रकोप बढ़ने की चेतावनी दी है.

रिजवान नूर खान
नोएडा | Updated On: 13 Jul, 2026 | 05:00 PM

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश में आलू की फसल पर पिछेता झुलसा बीमारी का प्रकोप देखा जा रहा है. इससे आलू उत्पादन घटने की आशंका बढ़ गई है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के आलू शोध संस्थान ने किसानों को फसल बचाने की सलाह जारी की गई है. सलाह में किसानों को दवा के छिड़काव और घोल बनाने का तरीका भी बताया गया है. कहा गया है कि समय रहते किसान इस सलाह का पालन करके आर्थिक नुकसान से बच सकते हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (ICAR-Central Potato Research Institute) ने हिमाचल प्रदेश के आलू उत्पादक किसानों को पिछेता झुलसा (लेट ब्लाइट) बीमारी के संभावित प्रकोप को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है. संस्थान की ओर से विकसित इंडो ब्लाइटकास्ट (पैन इंडिया) पूर्वानुमान मॉडल के अनुसार मौसम की वर्तमान परिस्थितियों इस बीमारी के फैलने के लिए अनुकूल हैं और निकट भविष्य में इसका प्रकोप बढ़ सकता है.

आलू के लिए क्यों खतरनाक है पिछेता झुलसा रोग

संस्थान में पौध संरक्षण संभाग के अध्यक्ष डॉ. संजीव शर्मा ने किसानों से समय रहते बचाव के उपाय अपनाने का आग्रह किया है. उन्होंने कहा कि पिछेता झुलसा रोग की वजह से पत्तियों के किनारों या सिरों से पानी जैसे धब्बे शुरू होते हैं जो बाद में भूरे या काले रंग में बदल जाते हैं. नमी अधिक होने पर पत्तियों के नीचे की तरफ हल्के सफेद रंग की फफूंद दिखाई देने लगती है. इसके बाद तने गलने लगते हैं और यदि रोग कंद (आलू) तक पहुंच जाए तो आलू पर बैंगनी-भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और वे सड़ने लगते हैं.

बीमारी के चपेट में आने से पहले इस दवा का करें छिड़काव

डॉ. संजीव शर्मा ने कृषि सलाह में किसानों से कहा है कि जिन खेतों में आलू फसल में अभी तक बीमारी के लक्षण दिखाई नहीं दिए हैं और फफूंदनाशक का छिड़काव नहीं किया गया है, वहां मैन्कोजेब या क्लोरोथलोनील युक्त फफूंदनाशक का रोग सुगाही किस्मों पर 0.2 0.25 प्रतिशत की दर से अर्थात 2.0-2.5 किलोग्राम दवा 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करने की सलाह दी गई है.

बीमारी के लक्षण दिखने पर इस दवा का इस्तेमाल करें

कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि अगर खेत में पिछेता झुलसा बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगे हैं तो किसानों को फफूंदनाशक जैसे डाइमेथोमोर्फ का 1.0 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से अथवा अमेटोक्ट्रडीन डाइमेथोमोर्फ का 2.0 मिली प्रति लीटर पानी की दर से अथवा डाइमेथोमोर्फ 1.0 ग्राम मैन्कोजेब 2.0 ग्राम (कुल मिश्रण 3.0 ग्राम) का प्रति लीटर की दर से या फ्लुपिकोलिडे प्रोपमोकार्ब का 3.0 मिली प्रति लीटर के दर अथवा अजोक्षिस्ट्रोबिन टेबुकोनाज़ोल का 1.0 मिली प्रति लीटर की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है.

दवा छिड़काव का अंतराल और पानी मिलावट का ध्यान जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार फफूंदनाशक का छिड़काव सामान्य रूप से 10 दिन के अंतराल पर दोहराया जा सकता है. हालांकि बीमारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए इस अंतराल में बदलाव किया जा सकता है. साथ ही एक ही फफूंदनाशक का लगातार इस्तेमाल न करें और प्रत्येक छिड़काव में 0.1 फीसदी स्टिकर (लगभग 1 मिली प्रति लीटर पानी) का इस्तेमाल जरूर करने की सलाह दी गई है. उन्होंने कहा कि बताई गई मात्रा में पानी का घोल बनाना जरूरी है, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके.

खेत में जलनिकासी की सही व्यवस्था करें किसान

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने किसानों को खेतों में जल निकासी की समुचित व्यवस्था बनाए रखने के साथ ही खरपतवार नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान देने की सलाह दी है, ताकि बीमारी के प्रसार को रोका जा सके. किसानों से अपील की गई है कि वह बताई गई दवाओं का सलाह के अनुसार ही इस्तेमाल करें. ताकि, आलू की फसल को समय पर बीमारी से बचाया जा सके और उत्पादन को बरकरार रखा जा सके.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

Published: 13 Jul, 2026 | 04:56 PM

लेटेस्ट न्यूज़