सेम की खेती से बढ़ेगी आमदनी, सही तकनीक अपनाकर किसान कमा सकते हैं अच्छा मुनाफा
सेम में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. यही वजह है कि यह सेहत के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है. खास बात यह है कि सेम मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिर करने की क्षमता रखती है, जिससे जमीन की उर्वरता भी बढ़ती है.
Bean cultivation: भारत सब्जी उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है और इसी में सेम की खेती भी किसानों के लिए तेजी से लोकप्रिय विकल्प बनती जा रही है. सेम एक ऐसी फसल है जिसे सब्जी और दलहन दोनों रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी फलियां स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी होती हैं. बाजार में इसकी मांग सालभर बनी रहती है, इसलिए किसान कम समय में अच्छी आमदनी कमा सकते हैं.
सेम में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. यही वजह है कि यह सेहत के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है. खास बात यह है कि सेम मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिर करने की क्षमता रखती है, जिससे जमीन की उर्वरता भी बढ़ती है.
सेम की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी
सेम की खेती गर्म और मध्यम जलवायु में अच्छी होती है. 18 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके लिए उपयुक्त माना जाता है. ज्यादा ठंड या पाला फसल को नुकसान पहुंचा सकता है.
मिट्टी की बात करें तो अच्छी जल निकासी वाली बलुई-दोमट मिट्टी सबसे बेहतर रहती है. मिट्टी का पीएच मान 6 से 7 के बीच होना चाहिए. जहां पानी रुकता हो, वहां इसकी खेती से बचना चाहिए, क्योंकि जड़ों में सड़न की समस्या हो सकती है.
खेत की तैयारी और बुवाई का तरीका
बुवाई से पहले खेत की दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए और पाटा लगाकर मिट्टी भुरभुरी बना लेनी चाहिए. अगर खेत में नमी कम हो तो हल्का पलेवा कर लें, ताकि बीजों का अंकुरण अच्छा हो सके.
सेम की बुवाई आमतौर पर जुलाई-अगस्त में की जाती है. इसे मेड़ों या क्यारियों में बोना बेहतर रहता है. लता वाली किस्मों के लिए कतार से कतार की दूरी लगभग 90 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 60 से 75 सेंटीमीटर रखनी चाहिए.
खाद और उर्वरक का सही इस्तेमाल
अच्छी पैदावार के लिए 10 से 12 टन सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर खेत में मिलाना फायदेमंद रहता है. इसके अलावा 20-25 किलो नाइट्रोजन, 40-45 किलो फास्फोरस और 40-50 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है. नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय और बाकी आधी 30-35 दिन बाद देनी चाहिए.
सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण
बरसात के मौसम में ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन फूल और फली बनने के समय खेत में नमी बनी रहनी चाहिए. सूखे की स्थिति में हल्की सिंचाई करें.
खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई जरूरी है. बुवाई के तुरंत बाद मल्चिंग करने से नमी बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं. जरूरत पड़ने पर पेंडामेथालीन का सीमित और सावधानीपूर्वक उपयोग किया जा सकता है.
प्रमुख किस्में और पैदावार
पूसा सेम-2 और पूसा सेम-3 जैसी किस्में अच्छी पैदावार देती हैं. काशी हरितमा किस्म भी लोकप्रिय है, जिसकी उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से अधिक हो सकती है. सही देखभाल और उन्नत तकनीक अपनाने से किसान बेहतर उत्पादन पा सकते हैं.
रोग और बचाव
सेम में कॉलर रॉट, तना सड़न और विषाणु रोग जैसी समस्याएं हो सकती हैं. बीज उपचार, खेत की साफ-सफाई और समय पर छिड़काव से इन रोगों पर नियंत्रण पाया जा सकता है. नीम तेल का छिड़काव भी लाभकारी माना जाता है.
सेम का आर्थिक महत्व
सेम की फलियां बाजार में अच्छी कीमत पर बिकती हैं. इसकी दाल और हरी फलियां दोनों की मांग रहती है. कम अवधि की फसल होने के कारण किसान जल्दी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं.