Gardening Tips: बालकनी या छत पर उगाएं काली गाजर, जानिए बीज से कटाई तक पूरा तरीका

काली गाजर देखने में भले ही सामान्य गाजर से अलग लगे, लेकिन इसके गुण इसे खास बनाते हैं. इसका रंग गहरा बैंगनी या लगभग काला होता है और स्वाद हल्का खट्टा-मीठा रहता है. उत्तर भारत में इससे बनने वाली कांजी बहुत मशहूर है. सेहत की बात करें तो काली गाजर में एंथोसाइनिन जैसे शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं.

नई दिल्ली | Published: 14 Jan, 2026 | 09:22 AM

Gardening Tips: आजकल शहरों में रहने वाले लोग फिर से प्रकृति की ओर लौट रहे हैं. भागदौड़ भरी जिंदगी, मिलावटी सब्जियों और बढ़ती बीमारियों ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कम से कम रोज़ की थाली में आने वाली सब्जियां तो शुद्ध हों. यही वजह है कि किचन गार्डन का चलन तेजी से बढ़ रहा है. बालकनी, छत या छोटे से आंगन में लोग अब अपनी सब्जियां खुद उगाने लगे हैं. इन्हीं सब्जियों में काली गाजर लोगों की खास पसंद बनती जा रही है, क्योंकि यह न सिर्फ दिखने में अलग है बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद मानी जाती है.

काली गाजर क्यों बन रही है लोगों की पसंद

काली गाजर देखने में भले ही सामान्य गाजर से अलग लगे, लेकिन इसके गुण इसे खास बनाते हैं. इसका रंग गहरा बैंगनी या लगभग काला होता है और स्वाद हल्का खट्टा-मीठा रहता है. उत्तर भारत में इससे बनने वाली कांजी बहुत मशहूर है. सेहत की बात करें तो काली गाजर में एंथोसाइनिन जैसे शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं. इसके अलावा इसमें फाइबर और आयरन भी भरपूर मात्रा में होता है, जिससे पाचन तंत्र मजबूत रहता है और खून की कमी दूर करने में सहायता मिलती है.

घर पर उगाने का सही समय और जगह

काली गाजर ठंडे मौसम की फसल मानी जाती है. इसे उगाने के लिए अक्टूबर से दिसंबर का समय सबसे बेहतर होता है. अगर आप इसे बालकनी या छत पर उगा रहे हैं तो ऐसी जगह चुनें जहां रोज़ कम से कम पांच से छह घंटे धूप आती हो. हल्की धूप में यह अच्छी तरह बढ़ती है, लेकिन बहुत तेज गर्मी या ज्यादा उमस इसके विकास में रुकावट डाल सकती है.

गमले और मिट्टी की तैयारी क्यों है जरूरी

क्योंकि गाजर जमीन के अंदर बढ़ती है, इसलिए इसके लिए गहरा गमला लेना बहुत जरूरी है. कम से कम 12 से 14 इंच गहराई वाला गमला या ग्रो बैग सबसे अच्छा रहता है. मिट्टी हल्की और भुरभुरी होनी चाहिए ताकि गाजर की जड़ बिना रुकावट नीचे की ओर बढ़ सके. इसके लिए बगीचे की मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद और थोड़ी रेत या कोकोपीट मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है. इससे पानी की निकासी भी सही रहती है और जड़ें सड़ने से बचती हैं.

बीज बोने से लेकर पौधे निकलने तक का सफर

बीज बोने से पहले मिट्टी को हल्का गीला कर लेना चाहिए. बीजों को बहुत गहराई में दबाने की जरूरत नहीं होती. ऊपर से हल्की मिट्टी डालकर ढक देना ही काफी है. बीजों के बीच थोड़ा अंतर रखना जरूरी है, ताकि पौधों को बढ़ने की जगह मिल सके. बोने के बाद पानी तेज धार से न दें, बल्कि स्प्रे से हल्का पानी छिड़कें. कुछ ही दिनों में छोटे-छोटे पौधे निकलने लगते हैं, जो देखने में काफी अच्छे लगते हैं.

देखभाल में थोड़ी समझदारी जरूरी

काली गाजर को नमी पसंद होती है, लेकिन ज्यादा पानी इसके लिए नुकसानदेह हो सकता है. मिट्टी जब ऊपर से सूखी लगे, तभी पानी देना सही रहता है. ठंड के मौसम में तीन-चार दिन में एक बार पानी देना काफी होता है. समय-समय पर सूखी पत्तियां हटाते रहें और मिट्टी को हल्का सा ढीला करते रहें, ताकि हवा का संचार बना रहे.

जैविक खाद से मिले बेहतर स्वाद और रंग

अगर आप चाहते हैं कि आपकी काली गाजर का रंग गहरा और आकार अच्छा हो, तो हर 15–20 दिन में वर्मी कम्पोस्ट या तरल जैविक खाद देना फायदेमंद रहता है. केमिकल खाद से बचना बेहतर है, क्योंकि इससे स्वाद और पोषण पर असर पड़ सकता है. घर पर उगाई गई काली गाजर का असली मज़ा तभी आता है, जब वह पूरी तरह प्राकृतिक हो.

कटाई का सही समय और उपयोग

करीब 90 से 110 दिन बाद काली गाजर तैयार हो जाती है. जब ऊपर की पत्तियां मजबूत दिखने लगें और जड़ का थोड़ा हिस्सा मिट्टी के बाहर नजर आए, तो समझ लें कि गाजर तैयार है. इसे सावधानी से निकालें ताकि जड़ टूटे नहीं. ताजा काली गाजर का इस्तेमाल आप सलाद, जूस, कांजी या सब्जी में कर सकते हैं.

घर पर काली गाजर उगाना सिर्फ सब्जी पैदा करना नहीं है, बल्कि यह एक सुकून देने वाला अनुभव भी है. अपनी मेहनत से उगी, केमिकल-फ्री सब्जी खाने का आनंद ही अलग होता है. थोड़ी सी जगह, थोड़ा समय और थोड़ी समझदारी से आप भी अपनी बालकनी को एक छोटे से पोषण भरे बगीचे में बदल सकते हैं.

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