धान, मक्का और मोटे अनाज उगाने वाले किसानों की हुई मौज! इथेनॉल उत्पादन से खुले कमाई के नए रास्ते
Ethanol Blending Programme: केंद्र सरकार के इथेनॉल कार्यक्रम से किसानों को नई फसलों के लिए बड़ा बाजार मिला है. अब गन्ने के साथ धान, मक्का और मोटे अनाज से भी इथेनॉल बनाया जा रहा है, जिससे किसानों की आय बढ़ने की उम्मीद है.
Ethanol Blending: देश में इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की पहल का असर अब खेतों तक साफ दिखाई देने लगा है. पहले जहां इथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने से होता था, वहीं अब धान, मक्का और मोटे अनाजों से भी इथेनॉल बनाया जा रहा है. इससे इन फसलों की खेती करने वाले किसानों को नया बाजार मिला है और उनकी आमदनी बढ़ाने के नए रास्ते खुले हैं. किसान संगठनों का भी मानना है कि, यह पहल सिर्फ किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए भी एक बड़ा कदम है.
किसानों की आय बढ़ाने का नया जरिया
किसान नेताओं का कहना है कि इथेनॉल कार्यक्रम ने खेती को नई दिशा दी है. पहले कई बार धान, मक्का और मोटे अनाज की कीमत किसानों को उम्मीद के मुताबिक नहीं मिल पाती थी. लेकिन अब इन फसलों का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में होने लगा है, जिससे किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए एक अतिरिक्त विकल्प मिला है. इससे बाजार में मांग बढ़ी है और किसानों को बेहतर दाम मिलने की संभावना भी बढ़ी है.
वैज्ञानिक अध्ययन में भी सुरक्षित माना गया
कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन (CIFA) के राष्ट्रीय अध्यक्ष विपिनचंद्र पटेल का कहना है कि इथेनॉल को लेकर सरकार ने जो फैसला लिया है, वह किसानों, उपभोक्ताओं और देशहित को ध्यान में रखकर लिया गया है. उनके मुताबिक, इथेनॉल के उपयोग पर वैज्ञानिक स्तर पर रिसर्च किया गया है और आईआईटी की रिपोर्ट में भी इसे सुरक्षित और उपयोगी माना गया है. इससे यह साफ होता है कि यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर भी मजबूत पहल है.
इथेनॉल पर भारत सरकार का निर्णय किसानों, उपभोक्ताओं और देशहित में ध्यान रखकर लिया गया है। इसका उपयोग वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है तथा इसपर पूर्ण अध्ययन किया गया है। आईआईटी के अध्ययन में भी इसे सुरक्षित और सार्थक माना गया है।
-विपिनचंद्र पटेल, राष्ट्रीय अध्यक्ष, कंसोर्टियम ऑफ़… pic.twitter.com/zrZpYkItLW
— पीआईबी हिंदी (@PIBHindi) July 29, 2026
गन्ने के साथ अब धान और मक्का को भी फायदा
पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक बालियान का कहना है कि, पहले गन्ने से बनने वाली चीनी का उत्पादन कई बार जरूरत से ज्यादा हो जाता था, जिससे किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता था. लेकिन अब सरकार ने धान, मक्का और मोटे अनाज से भी इथेनॉल बनाने की अनुमति दी है. इससे इन फसलों की मांग बढ़ी है और किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने लगा है.
गन्ने से बनने वाली चीनी की बहुत ज्यादा मात्रा में अधिकता को जाती थी जिसके कारण किसानों को अधिक लाभ नहीं होता था। जबसे सरकार ने धान, मक्का और मोटे अनाजों से भी इथेनॉल बनाना शुरू किया है। इससे इस क्षेत्र के किसानों को इसका बहुत बड़ा लाभ हुआ है।
-अशोक बालियान, राष्टीय अध्यक्ष,… pic.twitter.com/qgz018lUTX
— पीआईबी हिंदी (@PIBHindi) July 29, 2026
राष्ट्रीय किसान प्रगतिशील संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद आनंद के अनुसार, सरकार का किसान केंद्रित और पर्यावरण के अनुकूल इथेनॉल कार्यक्रम स्वतंत्र भारत की एक दूरगामी योजना है.
अन्नदाता से अब ऊर्जादाता बनने की ओर किसान
भारतीय किसान यूनियन (चौधरी चरण सिंह) के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मेंद्र चौधरी का कहना है कि आज किसान केवल देश का पेट ही नहीं भर रहा, बल्कि देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी योगदान दे रहा है. उनके मुताबिक, गन्ना और मक्का जैसी फसलों का उपयोग अब स्वदेशी ईंधन तैयार करने में हो रहा है, जिससे किसान आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. उनका मानना है कि वर्ष 2047 तक आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य में किसानों की भूमिका बेहद अहम होगी.
कई स्रोतों से हो रहा इथेनॉल का उत्पादन
एक्सपर्ट्स का मानना है कि, भारत का इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम पूरी तरह देश की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. इसका मकसद किसानों की आय बढ़ाना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और देश को ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत बनाना है. वर्तमान में बी-हेवी मोलासेस, सी-हेवी मोलासेस, गन्ने का रस, टूटे चावल, मक्का और क्षतिग्रस्त खाद्यान्न से इथेनॉल तैयार किया जा रहा है.
देश के लिए गर्व की बात
किसान संगठनों का मानना है कि इथेनॉल कार्यक्रम ने खेती को सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन तक सीमित नहीं रखा है. अब किसान देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. यही वजह है कि, आज किसान को केवल ‘अन्नदाता’ ही नहीं, बल्कि ‘ऊर्जादाता’ के रूप में भी देखा जाने लगा है. यह बदलाव किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.