बागवानों की जीत: केंद्र ने रोकी कश्मीर की विवादित रेलवे परियोजनाएं, 7 लाख सेब के पेड़ कटने से बचे

यह विरोध सिर्फ जमीन बचाने का नहीं था, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी बचाने की लड़ाई थी. पिछले साल भूस्खलन के कारण परिवहन बाधित हुआ था और सेब की तुड़ाई के समय किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा था. ऐसे में नई रेलवे परियोजनाओं से उनकी परेशानियां और बढ़ सकती थीं. किसानों ने साफ कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो उनकी जड़ों को ही काट दे, वह स्वीकार्य नहीं है.

नई दिल्ली | Published: 5 Feb, 2026 | 10:00 AM

Kashmir railway projects: कश्मीर की वादियों में सेब सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की रोजी-रोटी और पहचान है. जब दक्षिण कश्मीर में नई रेलवे लाइनों की योजना सामने आई, तो विकास की उम्मीद के साथ ही बागवानों के मन में एक डर भी घर कर गया, कहीं उनकी जिंदगी की जड़ें ही न उजड़ जाएं. सात लाख से ज्यादा सेब के पेड़ों पर खतरा मंडराने लगा, और तभी किसानों की आवाज सड़कों से होते हुए संसद तक पहुंच गई. आखिरकार केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए इन रेलवे परियोजनाओं पर रोक लगा दी, जिससे घाटी के बागवानों ने राहत की सांस ली.

सेब के पेड़ और कश्मीर की पहचान

कश्मीर घाटी में सेब सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि यहां की अर्थव्यवस्था और पहचान की रीढ़ है. अनंतनाग, शोपियां, पुलवामा और आसपास के इलाके घाटी के सबसे बड़े सेब उत्पादक क्षेत्र माने जाते हैं. इन इलाकों में पीढ़ियों से लोग बागवानी करते आ रहे हैं. सेब के पेड़ उनके लिए जमीन से उगने वाली आमदनी ही नहीं, बल्कि आने वाले कल की सुरक्षा भी हैं. ऐसे में जब इन इलाकों से होकर नई रेलवे लाइनों की योजना सामने आई, तो सबसे पहले बागवानों के मन में डर बैठ गया.

रेलवे परियोजनाएं और बढ़ती चिंता

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, केंद्रीय रेल मंत्रालय ने पहले तीन नई रेलवे लाइनों के सर्वे को मंजूरी दी थी. इनमें सोपोर-कुपवाड़ा (33.7 किलोमीटर), अवंतीपोरा-शोपियां (27.6 किलोमीटर) और अनंतनाग-बिजबेहड़ा-पहलगाम (77.5 किलोमीटर) शामिल थीं. जैसे ही यह खबर सामने आई कि रेलवे लाइन सेब के घने बागों के बीच से गुजरेगी, स्थानीय किसानों ने विरोध शुरू कर दिया. बागवानों का अनुमान था कि अगर परियोजनाएं आगे बढ़तीं, तो शोपियां और पुलवामा जिलों में करीब सात लाख से ज्यादा सेब के पेड़ काटने पड़ सकते थे.

किसानों का विरोध और जमीन से जुड़ा दर्द

यह विरोध सिर्फ जमीन बचाने का नहीं था, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी बचाने की लड़ाई थी. पिछले साल भूस्खलन के कारण परिवहन बाधित हुआ था और सेब की तुड़ाई के समय किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा था. ऐसे में नई रेलवे परियोजनाओं से उनकी परेशानियां और बढ़ सकती थीं. किसानों ने साफ कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो उनकी जड़ों को ही काट दे, वह स्वीकार्य नहीं है.

सरकार तक पहुंची आवाज

बागवानों की यह चिंता धीरे-धीरे प्रशासन और राजनीति तक पहुंची. जम्मू-कश्मीर सरकार और वहां के सांसदों ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया. आखिरकार केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में साफ किया कि इन प्रस्तावित रेलवे परियोजनाओं को फिलहाल रोक दिया गया है. उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार और सांसदों की मांग के बाद यह फैसला लिया गया, क्योंकि इन परियोजनाओं से सेब के बागों को नुकसान पहुंचने की आशंका थी.

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया

केंद्र के इस फैसले का सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) दोनों ने स्वागत किया. नेशनल कॉन्फ्रेंस ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी सांसदों को इस “जरूरी और अहम हस्तक्षेप” के लिए धन्यवाद दिया. पार्टी के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा कि अनंतनाग-पहलगाम और अनंतनाग-शोपियां रेलवे लाइन को रोकने से लोगों की आजीविका और उनके बाग सुरक्षित हो गए हैं. उन्होंने इसे लोगों की बात सुनने वाली सरकार का उदाहरण बताया.

पीडीपी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी इस फैसले को कश्मीर की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत बताया. उन्होंने कहा कि ये परियोजनाएं अगर आगे बढ़तीं, तो उपजाऊ जमीन नष्ट होती और दस लाख से ज्यादा ग्रामीण परिवारों का भविष्य खतरे में पड़ जाता. महबूबा मुफ्ती ने यह भी कहा कि ऐसा विकास, जो किसानों को उजाड़ दे, प्रगति नहीं कहलाता.

बागवानी और रोजगार का मजबूत रिश्ता

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में बागवानी क्षेत्र करीब 33 लाख लोगों को रोजगार देता है. सेब की खेती से लेकर उसकी ढुलाई, भंडारण और बिक्री तक लाखों परिवार जुड़े हुए हैं. यही वजह है कि रेलवे लाइन जैसी बड़ी परियोजनाओं का असर सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे पर पड़ता.

स्थानीय प्रतिनिधियों की भूमिका

शोपियां से निर्दलीय विधायक शबीर कुल्ले ने भी इस फैसले को संतुलित विकास की मिसाल बताया. उन्होंने कहा कि शुरू से ही इन परियोजनाओं से होने वाले सामाजिक और आर्थिक नुकसान को जिम्मेदारी के साथ उठाया गया था. केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार के बीच लगातार बातचीत के बाद इन आशंकाओं की गहराई से जांच हुई और आखिरकार परियोजनाओं को रोकने का फैसला लिया गया.

फिलहाल, दक्षिण कश्मीर के सेब के बागों में राहत का माहौल है. सात लाख पेड़ आज भी खड़े हैं और उनके साथ लाखों लोगों की उम्मीदें भी. यह फैसला दिखाता है कि जब लोगों की आवाज एकजुट होकर उठती है, तो वह बड़े से बड़े फैसलों की दिशा बदल सकती है.

 

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