खेत से मंडी तक नहीं पहुंच रही सेब की फसल, कश्मीर के किसान अब क्यों रोक रहे हैं बिक्री?

पिछले सीजन में अगस्त और सितंबर के महीनों में कश्मीर में जरूरत से ज्यादा बारिश हुई. लगातार बारिश की वजह से जम्मू–श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग बार-बार बंद होता रहा. यही सड़क घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने का सबसे बड़ा जरिया है. सड़क बंद होते ही सेब से भरे सैकड़ों ट्रक रास्ते में ही फंस गए.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 3 Feb, 2026 | 07:23 AM

Kashmir apple farmers: कश्मीर घाटी में सेब सिर्फ एक फल नहीं है, बल्कि यहां की जिंदगी का हिस्सा है. लाखों परिवारों की रोजी-रोटी इसी से जुड़ी हुई है. सालों से यहां के किसान सेब की फसल उगाकर कटाई के तुरंत बाद उसे देश की अलग-अलग मंडियों में बेचते रहे हैं. लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. मौसम की मार, सड़कें बंद होने की परेशानी और बढ़ती लागत ने किसानों को अपनी पुरानी सोच बदलने पर मजबूर कर दिया है.

अब कश्मीर के सेब किसान एक नया रास्ता अपना रहे हैं. वे सेब को तुरंत बेचने के बजाय नियंत्रित वातावरण वाले स्टोरेज यानी सीए स्टोरेज में रख रहे हैं, ताकि सही समय पर बेहतर दाम मिल सकें.

बारिश और सड़क बंद होने से बिगड़ा पूरा खेल

पिछले सीजन में अगस्त और सितंबर के महीनों में कश्मीर में जरूरत से ज्यादा बारिश हुई. लगातार बारिश की वजह से जम्मू–श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग बार-बार बंद होता रहा. यही सड़क घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने का सबसे बड़ा जरिया है. सड़क बंद होते ही सेब से भरे सैकड़ों ट्रक रास्ते में ही फंस गए.

कई ट्रक दिन-दिन भर खड़े रहे. इस दौरान सेब खराब होने लगे, ढुलाई का खर्च बढ़ता गया और मजबूरी में किसानों को बेहद कम दामों पर सेब बेचना पड़ा. ऐसे हालात में कई किसानों ने तय किया कि अब जोखिम उठाने से बेहतर है सेब को स्टोरेज में रखा जाए.

इस बार रिकॉर्ड मात्रा में सेब स्टोरेज में पहुंचे

किसानों और व्यापारियों के अनुसार, इस सीजन में करीब 25 से 30 लाख मीट्रिक टन सेब कश्मीर की अलग-अलग सीए स्टोरेज इकाइयों में रखा गया. यह मात्रा पिछले वर्षों की तुलना में काफी ज्यादा है. आमतौर पर किसान कटाई के कुछ ही दिनों में सेब मंडी भेज देते थे, लेकिन इस बार हालात ने उन्हें इंतजार करने पर मजबूर कर दिया.

कश्मीर देश के सबसे बड़े सेब उत्पादक क्षेत्रों में से एक है. यहां सेब की खेती से करीब 35 लाख लोग जुड़े हुए हैं. यही वजह है कि सेब की बिक्री में थोड़ी सी भी रुकावट पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था को हिला देती है.

जलवायु परिवर्तन ने किसानों की सोच बदली

अब किसान खुलकर मानने लगे हैं कि मौसम पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा. कभी जरूरत से ज्यादा बारिश, कभी ओलावृष्टि, तो कभी अचानक तापमान में बदलाव इन सबका सीधा असर फसल पर पड़ता है. इसके साथ ही खाद, कीटनाशक और मजदूरी की लागत भी लगातार बढ़ रही है.

शोपियां जैसे सेब उत्पादक इलाकों के किसानों का कहना है कि अब कटाई के तुरंत बाद सेब बेच देना हर बार फायदे का सौदा नहीं होता. अगर उस समय बाजार में दाम कम हों या सड़कें बंद हों, तो नुकसान तय है. ऐसे में स्टोरेज एक तरह का सुरक्षा कवच बन गया है.

बाजार और व्यापार का तरीका भी बदला

सेब व्यापारियों का कहना है कि पिछले साल के मौसम ने पूरे बाजार की चाल बदल दी. जब सड़कें बार-बार बंद हुईं, तो सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई. इससे किसानों के साथ-साथ व्यापारियों को भी भारी नुकसान झेलना पड़ा.

इसी वजह से बड़ी संख्या में सेब को सीए स्टोरेज में भेजा गया, ताकि फसल को खराब होने से बचाया जा सके और बाद में सही समय पर बाजार में उतारा जा सके.

स्टोरेज बढ़ी, लेकिन चुनौतियां अभी बाकी

पिछले कुछ सालों में सरकार और निजी कंपनियों के निवेश से कश्मीर में सीए स्टोरेज की संख्या बढ़ी है. फिलहाल घाटी में करीब तीन लाख मीट्रिक टन से ज्यादा सेब रखने की क्षमता मौजूद है. लेकिन किसान मानते हैं कि अगर मौसम और परिवहन की समस्याएं ऐसे ही बनी रहीं, तो आने वाले समय में यह क्षमता भी कम पड़ सकती है.

बदलते हालात में नई रणनीति अपना रहे किसान

कश्मीर के सेब किसान अब हालात के हिसाब से खुद को ढाल रहे हैं. वे समझ चुके हैं कि बदलते मौसम और बाजार की अनिश्चितता में सिर्फ मेहनत काफी नहीं है, सही रणनीति भी जरूरी है. स्टोरेज के जरिए वे नुकसान से बचने और बेहतर दाम पाने की कोशिश कर रहे हैं.

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