Masane Ki Holi: आस्था या अंधविश्वास? मणिकर्णिका की मसान होली ने खड़ा किया बड़ा सवाल, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट
Massan Holi: वाराणसी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर खेली जाने वाली मसान होली इस बार आस्था और विवाद के केंद्र में है. जहां कुछ लोग इसे शिव की अलौकिक परंपरा और मोक्ष का प्रतीक मानते हैं, वहीं कई विद्वान इसे शास्त्रों के विरुद्ध बताते हैं. चिता की राख से खेली जाने वाली इस अनोखी होली ने धार्मिक बहस को और तेज कर दिया है.
Masan Ki Holi: बनारस की पहचान सिर्फ आध्यात्मिक नगरी के रूप में ही नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के अनोखे दर्शन के लिए भी है. यहां मृत्यु भी एक उत्सव होती है और ऐसी जगह की होली भी भला आम होली जैसी कैसे हो सकती है? यहां रंगों की जगह चिता की राख उड़ती है. इसे ही कहते हैं ‘मसान की होली’. गंगा किनारे बसे मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर खेली जाने वाली ‘मसान की होली’ इन दिनों चर्चा और विवाद दोनों का विषय बनी हुई है. जहां एक ओर रोकेश चतुर्वेदी जैसे विद्वान इसे शिव की अलौकिक लीला और मोक्ष का प्रतीक मानते हैं, वहीं दूसरी ओर काशी विद्वत परिषद के विद्वान इसे शास्त्रों के विरुद्ध बताते हैं. ऐसे में आइए ज्योतिषाचार्य राकेश चतुर्वेदी से जानते हैं की आखिर मसान की होली है क्या.
मसान की होली कब मनाई जाती है?
गाजियाबाद के ज्योतिषाचार्य राकेश चतुर्वेदी ने किसान इंडिया (Kisan India) से बातचीत के दौरान बताया कि, मसान की होली महाशिवरात्रि के बाद मनाई जाती है. इस साल में यह उत्सव 28 फरवरी को मनाया जाएगा. यह आयोजन काशी के महाश्मशान में होता है, जहां चिताएं दिन-रात जलती रहती हैं. यहां रंगों या गुलाल का इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि चिता की भस्म को शरीर पर लगाया जाता है. इसे जीवन-मृत्यु के चक्र को स्वीकार करने और भय से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है.
कौन होते हैं शामिल?
इस अनुष्ठान में मुख्य रूप से अघोरी, तांत्रिक और नागा साधु भाग लेते हैं. बिना तांत्रिक दीक्षा के आम लोगों का इसमें शामिल होना परंपरा के नियमों के विरुद्ध माना जाता है. साधु शिव भक्ति में लीन होकर मंत्रोच्चार, डमरू और शंख ध्वनि के बीच भस्म से होली खेलते हैं. लोककथाओं के अनुसार, इस अवसर पर अदृश्य शक्तियां और शिव के गण भी उपस्थित रहते हैं. यही कारण है कि माहौल रहस्यमय और अलौकिक प्रतीत होता है.
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परंपरा या हाल की शुरुआत?
काशी विद्वत परिषद के कुछ विद्वानों का मानना है कि श्मशान में होली खेलना प्राचीन परंपरा नहीं है. परिषद से जुड़े पंडित विनय पांडेय के अनुसार, श्मशान एक ऐसा स्थान है जहां लोग अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए आते हैं, इसलिए वहां उत्सव मनाना मर्यादा के खिलाफ है.
उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों मसान की होली को प्राचीन परंपरा बताकर प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि शास्त्रों में इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है. इस तर्क की वजह से उत्सव को लेकर शहर में बहस को और गहरा कर रहा है.
आस्था का पक्ष: शिव की लीला का उत्सव
दूसरी ओर ज्योतिषाचार्य रोकेश चतुर्वेदी ने बताया कि, काशी का मणिकर्णिका घाट तो खुद ही ‘महाश्मशान’ है. यहां यह परंपरा शिव-शक्ति के मिलन से जुड़ी है. उनके अनुसार, जब माता सती के देह त्याग के बाद भगवान ने उनके जले हुए शरीर को लेकर तांडव किया था, तब आठ दिनों तक शोक और शक्ति का संगम हुआ. लोकमान्यता है कि मणिकर्णिका में आज भी माता सती की भस्म का अंश मौजूद है. इसी कारण चिता की राख को शिव-शक्ति के पुनर्मिलन का प्रतीक मानकर उससे होली खेली जाती है. श्रद्धालु इसे आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव मानते हैं.
विवाद क्यों गहराया?
श्मशान की मर्यादा और वहां मौजूद शोकग्रस्त परिवारों की भावनाओं को लेकर कुछ धार्मिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि श्मशान उत्सव का स्थल नहीं, बल्कि शांति और श्रद्धा का स्थान है. वहीं समर्थकों का तर्क है कि काशी में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार माना जाता है. इसलिए यहां मृत्यु भी उत्सव का रूप ले लेती है.
आध्यात्मिक संदेश क्या है?
मसान की होली केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन के गहरे दर्शन से जुड़ा संदेश देती है. यह बताती है कि मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है और उससे डरने के बजाय उसे स्वीकार करना चाहिए.
काशी की यह अनोखी होली रंगों की नहीं, बल्कि भस्म और भक्ति की होली है. यहां मृत्यु भय नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग बन जाती है. आस्था और विवाद के बीच खड़ी मसान की होली आज भी लोगों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि जीवन और मृत्यु दोनों एक ही चक्र के दो पहलू हैं और काशी में यह दर्शन उत्सव बन जाता है.