12 फरवरी को बंद का ऐलान, किसान और मजदूर क्यों कर रहे हैं देशव्यापी हड़ताल?

केंद्र सरकार का कहना है कि भारत-EU समझौता देश के लिए एक बड़ा आर्थिक अवसर है. इसके जरिए भारत का निर्यात बढ़ेगा, नए बाजार खुलेंगे और भारतीय उत्पादों को यूरोप में बेहतर पहुंच मिलेगी. सरकार के मुताबिक इस समझौते से ज्वेलरी, खेल सामग्री, कपड़ा और कई अन्य उद्योगों को फायदा होगा.

नई दिल्ली | Published: 31 Jan, 2026 | 11:13 AM

Nationwide strike: 12 फरवरी 2026 को देशभर में भारत बंद का ऐलान किया गया है. इस बंद का आह्वान संयुक्त किसान मोर्चा और मजदूर संगठनों ने मिलकर किया है. मुख्य वजह भारत-यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता और केंद्र सरकार के नए लेबर कोड हैं. किसानों और मजदूरों का कहना है कि ये दोनों फैसले उनके हितों के खिलाफ हैं और इससे उनकी आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा.

भारत-EU समझौते से किसानों की चिंता

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, किसान संगठनों का मानना है कि भारत-EU व्यापार समझौता सुनने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इसका सीधा नुकसान खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को हो सकता है. संयुक्त किसान मोर्चा का आरोप है कि इस समझौते के तहत यूरोप से आने वाले प्रोसेस्ड फूड, फलों के जूस और कृषि आधारित उत्पादों पर टैक्स में भारी छूट दी जाएगी. इससे भारतीय किसानों के उत्पाद सस्ते विदेशी सामान से मुकाबला नहीं कर पाएंगे.

किसानों को डर है कि बड़े कॉर्पोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तो इसका फायदा मिलेगा, लेकिन छोटे और मझोले किसान बाजार से बाहर हो जाएंगे. पहले ही लागत बढ़ने, मौसम की मार और न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर असमंजस से जूझ रहे किसानों के लिए यह समझौता एक और दबाव बन सकता है. यही वजह है कि किसान संगठन इसे खेती के लिए “धीमा जहर” बता रहे हैं.

लेबर कोड के खिलाफ मजदूरों का विरोध

किसानों के साथ-साथ मजदूर वर्ग भी 12 फरवरी को सड़कों पर उतरने की तैयारी में है. ट्रेड यूनियनों, खासकर CITU का कहना है कि नए लेबर कोड मजदूरों के हक कमजोर करते हैं. उनका आरोप है कि इन कानूनों से नौकरी की सुरक्षा घटेगी, काम के घंटे बढ़ेंगे और ट्रेड यूनियन की ताकत सीमित हो जाएगी.

मजदूर संगठनों का यह भी कहना है कि सरकार रोजगार गारंटी और सामाजिक सुरक्षा की बात तो करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है. महंगाई के इस दौर में मजदूरों को स्थिर रोजगार और सम्मानजनक मजदूरी चाहिए, जबकि नए कानून उन्हें और असुरक्षित बना रहे हैं. इसी नाराजगी के चलते 12 फरवरी को हजारों औद्योगिक क्षेत्रों, दफ्तरों और निर्माण स्थलों पर कामकाज ठप रहने की आशंका है.

सरकार का पक्ष क्या है

सरकार का नजरिया इन विरोधों से अलग है. केंद्र सरकार का कहना है कि भारत-EU समझौता देश के लिए एक बड़ा आर्थिक अवसर है. इसके जरिए भारत का निर्यात बढ़ेगा, नए बाजार खुलेंगे और भारतीय उत्पादों को यूरोप में बेहतर पहुंच मिलेगी. सरकार के मुताबिक इस समझौते से ज्वेलरी, खेल सामग्री, कपड़ा और कई अन्य उद्योगों को फायदा होगा.

लेबर कोड को लेकर भी सरकार का दावा है कि इससे श्रम कानून सरल होंगे और निवेश का माहौल बेहतर बनेगा. सरकार का मानना है कि लंबे समय में इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फायदा जमीन तक पहुंचेगा या सिर्फ आंकड़ों में सिमट कर रह जाएगा.

आम जनता पर असर

भारत बंद का असर परिवहन, बाजार और कुछ सेवाओं पर पड़ सकता है. हालांकि आंदोलनकारियों का कहना है कि वे जरूरी सेवाओं को प्रभावित नहीं करना चाहते.

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