पपीते की खेती में दीमक बन रही बड़ी परेशानी, समय रहते अपनाएं ये आसान उपाय

पपीते की फसल तभी अच्छी पैदावार देती है, जब पौधा पूरी तरह स्वस्थ रहे. दीमक जैसी समस्या को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. समय पर पहचान, सही उपचार और नियमित निगरानी से किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं.

नई दिल्ली | Published: 13 Jan, 2026 | 03:13 PM

Papaya farming: पपीते की खेती आज कई किसानों के लिए अच्छी आमदनी का जरिया बन चुकी है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल सही देखभाल के साथ बढ़िया मुनाफा देती है. लेकिन अगर खेत में दीमक का हमला हो जाए, तो मेहनत पर पानी फिर सकता है. दीमक दिखने में भले ही छोटी हो, लेकिन यह पपीते के पौधों को अंदर से खोखला कर देती है. धीरे-धीरे पौधा कमजोर पड़ने लगता है, फल छोटे रह जाते हैं या पेड़ सूख भी सकता है. यही वजह है कि पपीते की खेती करने वाले किसानों के लिए दीमक नियंत्रण बेहद जरूरी हो जाता है.

दीमक क्यों बनती है पपीते की दुश्मन

दीमक जमीन के अंदर रहकर पौधों की जड़ों और तने को नुकसान पहुंचाती है. पपीते का पौधा मुलायम होता है, इसलिए दीमक इसे आसानी से अपना निशाना बना लेती है. खासकर उन खेतों में जहां मिट्टी में नमी ज्यादा रहती है या सड़ी-गली जैविक सामग्री पड़ी होती है, वहां दीमक तेजी से पनपती है. शुरुआत में किसान को इसका अंदाजा नहीं लग पाता, लेकिन जब पौधा मुरझाने लगता है तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है.

दीमक की पहचान कैसे करें समय पर

अगर किसान नियमित रूप से अपने खेत का निरीक्षण करें, तो दीमक की पहचान आसान हो जाती है. पपीते के तने पर मिट्टी की पतली परत चढ़ी हुई दिखे, तना अंदर से खोखला लगे या हल्का दबाने पर टूट जाए, तो यह दीमक का साफ संकेत है. कई बार पौधे के नीचे आटे या बुरादे जैसा चूरा जमा दिखता है. पत्तियां बिना किसी कारण पीली पड़ने लगें और पौधे की बढ़वार रुक जाए, तो भी सतर्क हो जाना चाहिए. शुरुआती अवस्था में पहचान होने से फसल को बचाया जा सकता है.

रासायनिक तरीकों से दीमक पर नियंत्रण

जब खेत में दीमक का प्रकोप ज्यादा हो जाए, तब रासायनिक उपाय कारगर साबित होते हैं. बाजार में दीमक नियंत्रण के लिए कई प्रभावी कीटनाशक उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग मिट्टी में ड्रेंचिंग या पौधे के चारों ओर दिया जाता है. इन दवाओं का इस्तेमाल हमेशा विशेषज्ञ की सलाह से करना चाहिए, ताकि मात्रा सही रहे और पौधे को नुकसान न पहुंचे. दवा डालते समय दस्ताने और मास्क का उपयोग करना भी जरूरी है, जिससे किसान खुद सुरक्षित रह सके.

जैविक उपाय भी हैं असरदार

जो किसान रसायनों का कम इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनके लिए जैविक तरीके भी काफी मददगार हैं. नीम की खली को पौधों के चारों ओर मिट्टी में मिलाने से दीमक दूर रहती है. इसके अलावा कुछ खास प्रकार के लाभकारी फंगस और परजीवी कीट भी दीमक को नियंत्रित करने में मदद करते हैं. यह तरीके धीरे असर दिखाते हैं, लेकिन लंबे समय तक फायदेमंद रहते हैं और मिट्टी की सेहत भी खराब नहीं करते.

रोकथाम ही सबसे अच्छा उपाय

दीमक से बचाव के लिए सबसे जरूरी है खेत की साफ-सफाई. पपीते के पौधों के आसपास सूखी लकड़ी, गोबर के ढेर या सड़ा हुआ कचरा जमा न होने दें. खेत में पानी का जमाव न हो, क्योंकि नमी दीमक को बढ़ावा देती है. पौध रोपण से पहले खेत की गहरी जुताई करने से भी दीमक के पुराने घर नष्ट हो जाते हैं. अगर शुरुआत से ही सावधानी रखी जाए, तो दीमक का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.

सही देखभाल से मिलेगी अच्छी उपज

पपीते की फसल तभी अच्छी पैदावार देती है, जब पौधा पूरी तरह स्वस्थ रहे. दीमक जैसी समस्या को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. समय पर पहचान, सही उपचार और नियमित निगरानी से किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं. थोड़ी सी सावधानी और सही जानकारी पपीते की खेती को नुकसान से बचाकर अच्छा मुनाफा दिला सकती है.

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