वैज्ञानिकों ने खोजी नई तरकीब, कहां जल रही है पराली अब मिनटों में होगी पहचान, ऐसे काम करती है मशीन
धान की कटाई के बाद बचा अवशेष (पराली) किसानों के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं होता, इसलिए वे जल्दी खेत तैयार करने के लिए इसे जला देते हैं. अध्ययन के अनुसार, इससे सर्दियों में प्रदूषण काफी बढ़ जाता है. पराली जलाने से हवा की गुणवत्ता खराब होती है, मिट्टी के पोषक तत्व कम हो जाते हैं, उर्वरकों की जरूरत बढ़ती है और मिट्टी के जीव-जंतु भी प्रभावित होते हैं.
Stubble Management: उत्तर भारत में पराली जलाने की बढ़ती समस्या को देखते हुए शोधकर्ताओं ने इसका समाधान निकालने के लिए एक नया और सस्ता तरीका तैयार किया है. पटियाला के थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सिस्टम बनाया है, जो न्यूरल नेटवर्क तकनीक पर आधारित है और आग व धुएं को अपने आप पहचान सकता है. यह सिस्टम YOLO (You Only Look Once) प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जिसकी तकनीक को और बेहतर बनाकर आग और धुएं की पहचान को ज्यादा सटीक और तेज किया गया है.
शोधकर्ताओं ने अपनी स्टडी में बताया कि उनका नया तरीका मौजूदा तकनीकों से बेहतर प्रदर्शन करता है और कई मानकों पर ज्यादा सटीक साबित हुआ है. यह शोध 12 अप्रैल को प्रकाशित एक प्रतिष्ठित जर्नल में सामने आया है. उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में करीब 40 लाख हेक्टेयर जमीन पर धान और गेहूं की खेती होती है. धान की कटाई अक्टूबर के मध्य में होती है, जिसके बाद किसानों को नवंबर के मध्य तक गेहूं की बुवाई करनी होती है, ताकि अप्रैल के मध्य तक अच्छी फसल मिल सके.
थर्मल रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट का किया गया इस्तेमाल
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, धान की फसल के बाद बचा अवशेष (पराली) किसानों के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं होता, इसलिए वे जल्दी खेत तैयार करने के लिए इसे जला देते हैं. अध्ययन के अनुसार, इससे सर्दियों में प्रदूषण काफी बढ़ जाता है. पराली जलाने से हवा की गुणवत्ता खराब होती है, मिट्टी के पोषक तत्व कम हो जाते हैं, उर्वरकों की जरूरत बढ़ती है और मिट्टी के जीव-जंतु भी प्रभावित होते हैं. इसके अलावा यह बिजली उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकता है और कई बार अनियंत्रित आग का कारण भी बनता है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, पराली जलाने की पहचान के लिए थर्मल रिमोट सेंसिंग, सैटेलाइट और अन्य तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन इन तरीकों में कई कमियां हैं. इनमें कम सटीकता, बादलों की वजह से दिक्कत, जानकारी मिलने में देरी और कम समय तक होने वाली आग को सही समय पर पकड़ने में परेशानी शामिल है.
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सटीक तरीके से आग और धुएं की पहचान होगी
घनी आबादी वाले इलाकों में धुंध (स्मॉग) की वजह से निगरानी करना और भी मुश्किल हो जाता है, जिससे तुरंत कार्रवाई करना कठिन हो जाता है. इन सीमाओं को देखते हुए शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर विजन और डीप लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल करने पर जोर दिया है, जिसमें ड्रोन (UAV) और जमीन से ली गई तस्वीरों का उपयोग किया जाता है. उन्होंने बताया कि YOLO जैसे मॉडल तेजी से और सटीक तरीके से आग और धुएं की पहचान कर सकते हैं, इसलिए ये रियल-टाइम निगरानी के लिए काफी उपयोगी हैं. हालांकि, असल इस्तेमाल में डेटा अक्सर कम गुणवत्ता में भेजा जाता है, जिससे पहचान की सटीकता घट जाती है. इस समस्या को दूर करने के लिए नई तकनीकों से YOLO मॉडल को और मजबूत बनाया जा रहा है, ताकि खराब गुणवत्ता वाली तस्वीरों में भी सही पहचान हो सके.
सुधारों से प्रतिक्रिया समय काफी कम हो गया
तीन सदस्यीय टीम द्वारा किए गए परीक्षणों में पाया गया कि यह सिस्टम अलग-अलग मौसम और रोशनी की स्थिति में भी पराली जलाने की सही पहचान कर सकता है. यह दिन या रात किसी भी समय आग का पता लगाने में सक्षम है. अध्ययन के अनुसार, सिस्टम में किए गए सुधारों से प्रतिक्रिया समय काफी कम हो गया है, जिससे रियल-टाइम में निगरानी संभव हो पाई है. साथ ही, बेहतर हार्डवेयर और अतिरिक्त सेंसर के इस्तेमाल से इसकी सटीकता और क्षमता में भी काफी सुधार हुआ है.