Opinion: भारत में दालों पर ट्रंप की टैरिफ नीति से अमेरिकी सांसद खफा
ट्रंप के बेतुके रवैये की हदें पार होने पर उनके अपने ही घर में पुरजोर विरोध होने लगा है. ताजा उदाहरण भी भारत के कृषि उत्पाद बने हैं. अमेरिका में मुख्य विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता पहले से ही ट्रंप की नीतियों का मुखर विरोध कर रहे हैं. अब विरोध के स्वर ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी में उभरने लगे हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ’टैरिफ टेरर’ इस समय दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के साथ ही टैरिफ का शिगूफा छोड़ दिया था. उन्होंने भारत के कृषि उत्पादों काे टैरिफ के नाम पर आतंकित करने की नाकाम कोशिश की थी. भारत ने इसके जवाब में अपने कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए वैकल्पिक बाजारों की व्यवस्था करके ट्रंप के टैरिफ टेरर की उसी समय हवा निकाल दी. न तो भारत के कृषि उत्पादों पर इस आतंक का कोई दीर्घकालिक असर हुआ और ना ही भारतीय बाजार में इस आतंक से कोई उथल पुथल हुई.
विरोध के स्वर ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी में उभर रहे
इसके बावजूद ट्रंप अभी भी दुनिया के तमाम देशों को टैरिफ के नाम पर धमकाने में लगे हैं. अब तो उन्होंने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की उनकी कोशिश का विरोध करने वाले देशों पर भी टैरिफ थोपने की धमकी दे डाली है. ट्रंप के इस बेतुके रवैये की हदें पार होने पर अब उनके अपने ही घर में इसका पुरजोर विरोध होने लगा है. इसका ताजा उदाहरण भी भारत के कृषि उत्पाद बने हैं. अमेरिका में मुख्य विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद और नेता पहले से ही ट्रंप की नीतियों को अलोकतांत्रिक बताते हुए मुखर विरोध कर रहे हैं. अब विरोध के स्वर ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी में उभरने लगे हैं. उनकी अपनी ही पार्टी के सांसदों ने ट्रंप को आगाह किया है कि इस टैरिफ टेरर से दूसरे देशों को नुकसान होने के बजाए अमेरिकी बाजार निराशा के गर्त में जा रहा है. खासकर कृषि उत्पादों के मामले में अमेरिका के किसानों को इस टैरिफ टेरर की भविष्य में भारी कीमत चुकानी पडेगी.
अमेरिकी किसानों में ट्रंप की नीतियों पर भारी असंतोष
ट्रंप की नीतियों से अमेरिकी किसानों को हो रही परेशानी और इससे उपजी नाराजगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में ट्रंप को किसानों के लिए 12 अरब डॉलर का भारी भरकम कृषि सहायता पैकेज जारी करना पडा. इसके पीछे अमेरिका में किसानों को उनकी उपज का सही दाम और बाजार का सपोर्ट न मिल पाने के कारण किसानों में उपज रहे भारी असंतोष को सबसे बडी वजह बताया जा रहा है. दरअसल इसी असंतोष की वजह से फ्रांस और बेल्जियम सहित तमाम विकसित देशों में किसानों के बडे आंदोलन चल रहे हैं. इसकी आंच अमेरिकी किसानों तक पहुंचने के बाद वहां भी बडे किसान आंदोलन की सुगबुगाहट होने लगी थी. इसे भांप कर ही ट्रंप सरकार ने अपने किसानों के लिए लगभग 1 लाख करोड रुपये का कृषि सहायता पैकेज जारी किया.
ट्रंप प्रशासन टैरिफ कम करने की मांग कर रहा
अब ताजा मामला अमेरिका के मुख्य कृषि उत्पाद के रूप में दालें बनी हैं. भारत अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले अपने कृषि उत्पादों पर पहले से ही जितना टैरिफ लगाता रहा है, ट्रंप प्रशासन उसे कम करने की मांग कर रहा है. भारत द्वारा इस मांग को नहीं मानने पर ट्रंप ने भारत की ओर से लगाए जा रहे टैरिफ की तुलना में कहीं ज्यादा टैरिफ लगाने की धमकी दी है. कृषि उत्पादों पर टैरिफ को लेकर मचे घमासान के कारण ही दोनों देशों के बीच लंबे समय से व्यापार समझौता नहीं हो पा रहा है. इस गतिरोध का हवाला देते हुए रिपब्लिकन पार्टी के दो वरिष्ठ सांसदों ने ट्रंप को पत्र लिखकर कहा है कि भारत के साथ भविष्य में यदि कोई व्यापार समझौता होता है तो उसमें दलहनी फसलों के लिए अनुकूल प्रावधान शामिल किए जाएं.
इतना ही नहीं, नॉर्थ डकोटा से सांसद केविन क्रेमर और मोंटाना के सांसद स्टीव डेंस ने ट्रंप से अमेरिका से भारत को निर्यात की जा रही दालों पर टैरिफ कम करने की भी मांग की है. जिससे अमेरिकी दाल उत्पादकों को भावी संभावनाओं से भरे भारत के बाजार तक अपनी पहुंच बनाने में मदद मिल सके. हालांकि दोनों सांसदों ने भारत द्वारा अपने कृषि उत्पादों पर लगाए जा रहे टैरिफ को अनुचित भी बताया है और कहा है कि इसकी वजह से अमेरिकी दाल उत्पादकों को अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान का सामना करना पड रहा है. इस नुकसान से बचने के लिए क्रेमर और डेंस ने ट्रंप से अमेरिकी दलहन उत्पादों पर टैरिफ संतुलित रखते हुए भारत को इस बात के लिए राजी करने की मांग की है कि वह भी अमेरिकी दलहन उत्पादों पर टैरिफ को घटा ले.
अमेरिका की दलहन खपत का 27 फीसदी भारत पूरा कर रहा
गौरतलब है कि अमेरिका में मोंटाना और नॉर्थ डकोटा, मटर सहित दलहनी फसलों के शीर्ष उत्पादक राज्य हैं. उन्होंने दलील दी है कि पूरी दुनिया में मसूर, चना, सूखी फली और मटर सहित अन्य दलहन उत्पादों की जितनी खपत होती है, उसमें 27 प्रतिशत भागीदारी भारत की है. इस लिहाज से भारत, दलहन उत्पादों का दुनिया में सबसे बडा उपभोक्ता देश है. उनका कहना है कि भारत ने दलहन उत्पादों के अमेरिकी निर्यात पर भारी टैरिफ लगाया है. जिससे अमेरिका से भारत को होने वाली दालों के निर्यात की लागत बढ़ने दूसरे निर्यातकों के साथ प्रतिस्पर्धा भी बढ जाती है. यही बात दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन का कारण भी बन रही है.
उन्होंने गत वर्ष अक्टूबर में अमेरिका से निर्यात की गई पीली मटर पर भारत द्वारा 30 प्रतिशत टैरिफ लगाने से अमेरिकी किसानों की मुश्किलें बढ़ने का भी जिक्र करते हुए कहा कि इससे भारत जैसे बड़े बाजार में अमेरिकी कृषि उत्पाद नहीं पहुंच पा रहे हैं. इस संकट से निपटने के लिए उन्होंने ट्रंप से अनुरोध किया है कि भारत के कृषि उत्पादों पर ज्यादा मात्रा में जवाबी टैरिफ लगाने की रणनीति कारगर साबित नहीं होगी. इससे अमेरिकी किसानों का ही नुकसान होगा. इसके बजाए भारत को अमेरिकी कृषि उत्पादों खासकर दलहन पर टैरिफ कम करने के लिए मनाया जाए.
व्यापार समझौतों में भारतीय किसानों का हित प्रभावित नहीं होने देने का संकल्प
हालांकि इस मामले में भारत सरकार की अपनी वाजिब दलीलें हैं. मोदी सरकार ने अमेरिका सहित किसी भी देश के साथ हो रहे व्यापार समझौतों में भारतीय किसानों का हित किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होने देने की प्रतिबद्धता जताई है. यह बात बिल्कुल सही है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दलहन उपभोक्ता देश है. भारत में शाकाहारी भोजन को पसंद करने की बहुतायत होने के कारण दालें ही प्रोटीन का सबसे प्रमुख स्रोत हैं. इसलिए भारत में दालों के मामले में मांग और आपूर्ति का संतुलन 1960 के दशक में हुई हरित क्रांति के बाद से गड़बड़ा गया है. दरअसल भारत में खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए 1960 के दशक में हरित क्रांति के फलस्वरूप गेहूं और धान की फसलों ने बड़े पैमाने पर दलहन फसलों का रकबा हड़प लिया. इस कारण से पिछले कुछ दशकों में आबादी बढ़ने के साथ दालों की मांग बढ़ती गई लेकिन इस अनुपात में दालों की उपज नहीं बढ़ पाई.
मांग एवं आपूर्ति के संतुलन को बनाए रखने के लिए भारत को दलहन एवं तिलहन उत्पादों के मामले में आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा है. इसके मद्देनजर ही मोदी सरकार ने देश के किसानों से फसल विविधीकरण को अपनाने पर जोर दिया है. इस काम को मिशन मोड में करने के मकसद से पल्स मिशन भी चलाकर किसानों को गेहूं और धान की फसलों का मोह छोड कर दलहन और तिलहन फसलें उपजाने के लिए तमाम तरह से सरकारी प्रोत्साहन दिए जा रहे है. भारत में उपजी दलहन और तिलहन फसलों को स्थानीय बाजार में सही कीमत किसानों को मिल सके, इसके लिए ही दूसरे देशों से आयातित दालों पर टैरिफ ज्यादा लगाना भारत सरकार की मजबूरी है. अगर भारत सरकार दलहन और तिलहन उत्पादों पर टैरिफ कम कर देगी तो स्थानीय बाजार में उसके अपने ही किसानों द्वारा उपजाई गई दालों और तिलहन फसलों को सही कीमत नहीं मिल पाएगी.
हालांकि भारत में उच्च टैरिफ के बावजूद मलेशिया सहित अन्य पड़ोसी देशों से आयातित दलहन और तिलहन उत्पाद अमेरिका की तुलना में कम लागत पर भारतीय बाजार में पहुंच जाते है. इससे भारतीय किसानों में बड़े पैमाने पर असंतोष है. इससे निपटने के लिए सरकार सभी देशों के साथ लगातार व्यापार संतुलन के उपाय सुनिश्चित कर रही है. वैश्विक व्यापार जगत की जटिलताओं के कारण डगर कठिन जरूर है, मगर नामुमकिन नहीं है. इस सोच के साथ ही मोदी सरकार अपने किसानों और उपभोक्ताओं के हित संरक्षित करते हुए व्यापारिक हित भी साधने में लगी है.
Published: 19 Jan, 2026 | 01:42 PM