LNG संकट से जूझ रहा देश, आधी क्षमता पर चल रहे यूरिया प्लांट, लागत बढ़ने से बढ़ सकती है खाद की किल्लत
गैस की कमी का सबसे बड़ा असर उत्पादन पर पड़ा है. कई प्लांट्स में यूरिया उत्पादन लगभग आधा रह गया है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि उत्पादन घटने के बावजूद खर्च कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ गया है. ऊर्जा खपत करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है.
Urea production crisis: देश में इस समय एक ऐसा संकट बनता दिख रहा है, जिसका सीधा असर किसानों और खेती पर पड़ सकता है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने गैस सप्लाई को प्रभावित कर दिया है, और इसका असर अब भारत के यूरिया उत्पादन पर साफ दिखने लगा है. हालात ऐसे हैं कि कई बड़े उर्वरक प्लांट अब आधी क्षमता पर काम कर रहे हैं. इससे उत्पादन कम हो गया है और लागत बढ़ गई है, जो आगे चलकर किसानों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है.
गैस की कमी ने बिगाड़ी पूरी व्यवस्था
बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, यह समस्या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते एलएनजी (LNG) सप्लाई में आई रुकावट की वजह से पैदा हुई है. यही रास्ता भारत के लिए गैस का बड़ा स्रोत है. जब यहां से सप्लाई प्रभावित हुई, तो देश की सबसे बड़ी एलएनजी टर्मिनल कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी को भी फोर्स मेज्योर घोषित करना पड़ा, यानी वह तय मात्रा में गैस उपलब्ध नहीं करा पा रही है.
इसका असर यह हुआ कि गैस सप्लाई करने वाली कंपनियां जैसे GAIL, इंडियन ऑयल और बीपीसीएल ने उर्वरक प्लांट्स को मिलने वाली गैस में कटौती कर दी. अब कई प्लांट्स को सिर्फ 60-65 प्रतिशत गैस मिल रही है, जबकि कुछ जगह यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से भी कम हो गया है.
कम उत्पादन, लेकिन खर्च बढ़ता जा रहा
गैस की कमी का सबसे बड़ा असर उत्पादन पर पड़ा है. कई प्लांट्स में यूरिया उत्पादन लगभग आधा रह गया है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि उत्पादन घटने के बावजूद खर्च कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ गया है. ऊर्जा खपत करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है.
असल में बड़े अमोनिया-यूरिया प्लांट इस तरह बनाए जाते हैं कि वे लगातार एक तय क्षमता पर चलें. जब इन्हें कम लोड पर चलाया जाता है, तो उनकी कार्यक्षमता घट जाती है और ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है. यानी कम यूरिया बनाने के लिए ज्यादा गैस और बिजली खर्च करनी पड़ रही है. इससे कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है.
अचानक फैसलों से संचालन में दिक्कत
स्थिति और मुश्किल तब हो जाती है जब गैस सप्लाई से जुड़े फैसले अचानक लिए जाते हैं. कई बार रात के समय ही प्लांट्स को गैस कम या ज्यादा करने के निर्देश दिए जाते हैं. इससे प्लांट चलाने वाले इंजीनियरों और कर्मचारियों को तुरंत बदलाव करना पड़ता है, जो आसान नहीं होता.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह अचानक लोड बदलने से मशीनों पर दबाव बढ़ता है और खराबी का खतरा रहता है. साथ ही यह सुरक्षा के लिहाज से भी ठीक नहीं है. कुछ प्लांट्स को सुरक्षित संचालन बनाए रखने के लिए तय सीमा से ज्यादा गैस भी लेनी पड़ी.
कीमतों में उलझन ने बढ़ाई परेशानी
गैस की कीमतों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है. GAIL ने हाल ही में कंपनियों को बताया है कि अब गैस की कीमत एक नहीं, बल्कि कई आधारों पर तय होगी. इसमें कॉन्ट्रैक्ट प्राइस, पूल्ड प्राइस और गजट प्राइस शामिल हैं. इसका मतलब यह है कि कंपनियों के लिए लागत का सही अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है. खासकर पूल्ड प्राइस बाद में बदल सकता है, जिससे भविष्य में अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है. ऐसे में कंपनियों की आर्थिक स्थिति पर और दबाव बढ़ रहा है.
किसानों पर क्या पड़ेगा असर
भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपयोग करने वाले देशों में शामिल है. ऐसे में अगर उत्पादन लंबे समय तक कम रहता है, तो इसका असर सीधे किसानों तक पहुंचेगा. आने वाले खरीफ सीजन में खाद की उपलब्धता कम हो सकती है.
हालांकि फिलहाल देश में 19 मार्च तक 61.14 लाख टन यूरिया का स्टॉक मौजूद है, जो पिछले साल के 55.22 लाख टन से ज्यादा है. लेकिन अगर यही स्थिति बनी रही, तो यह स्टॉक जल्दी खत्म हो सकता है और बाजार में कमी देखने को मिल सकती है.
वहीं मौजूदा हालात यह साफ दिखाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय तनाव अब सीधे भारत की खेती और खाद उत्पादन को प्रभावित कर रहा है. अगर जल्द ही गैस सप्लाई सामान्य नहीं होती, तो उर्वरक उत्पादन और महंगा हो सकता है.
इसका असर खेती की लागत पर पड़ेगा और किसानों को ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है. ऐसे में जरूरी है कि सरकार और संबंधित कंपनियां मिलकर इस समस्या का जल्दी समाधान निकालें.