कर्नाटक में खाद की किल्लत से किसानों की बढ़ी टेंशन, ईंधन महंगा होने से बढ़ गई खेती में लागत
कर्नाटक में खरीफ सीजन से पहले खेती की लागत बढ़ने से किसान परेशान हैं. ट्रैक्टर किराया, उर्वरक, खाद और मजदूरी महंगी होने से प्रति एकड़ बुवाई का खर्च काफी बढ़ गया है. किसान संगठनों ने सरकार से विशेष राहत पैकेज, सब्सिडी, ब्याज मुक्त ऋण और मूल्य समर्थन की मांग की है.
Karnataka News: कर्नाटक में खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले किसानों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि खेती में इस्तेमाल होने वाले जरूरी संसाधनों की लागत में तेज बढ़ोतरी हुई है. ट्रैक्टर किराया, उर्वरक और अन्य कृषि सामग्री महंगी होने से इस साल खेती के लिए शुरुआती निवेश काफी बढ़ गया है, जिससे किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है. राज्य में खरीफ सीजन के दौरान करीब 70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती की जाती है. किसान मुख्य रूप से रागी, धान, ज्वार, बाजरा, तूर और मूंगफली जैसी फसलों की खेती करते हैं. लेकिन पश्चिम एशिया संकट जैसे वैश्विक घटनाक्रमों के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है, जिससे ईंधन और उर्वरकों की कीमतों में सीधा असर देखने को मिला है.
वहीं, बैलों से होने वाली पारंपरिक जुताई अब काफी कम हो गई है और किसान बड़े पैमाने पर मशीनों पर निर्भर हो गए हैं. ऐसे में डीजल की बढ़ती कीमतों के कारण ट्रैक्टर का किराया भी महंगा हो गया है, जिससे खेती की लागत और बढ़ गई है. किसानों की लागत बढ़ने की एक बड़ी वजह ट्रैक्टर किराए में हुई बढ़ोतरी भी है. पिछले साल जहां ट्रैक्टर किराया 900 से 1,000 रुपये प्रति घंटे के बीच था, वहीं इस साल यह बढ़कर 1,200 से 1,300 रुपये प्रति घंटा हो गया है. ट्रैक्टर मालिकों का कहना है कि डीजल की बढ़ती कीमत, ड्राइवरों की मजदूरी और रखरखाव खर्च बढ़ने के कारण उन्हें किराया बढ़ाना पड़ा है.
38,000 मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरकों की कमी
इसके साथ ही किसानों को रासायनिक उर्वरकों की कमी की समस्या का भी सामना करना पड़ रहा है. कृषि मंत्री एन. चेलुवरायस्वामी ने हाल ही में कहा कि राज्य में करीब 38,000 मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरकों की कमी है. उर्वरकों की कमी और बढ़ती लागत ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है, क्योंकि खरीफ सीजन की बुवाई का समय नजदीक है.
खाद महंगा होने से किसान परेशान
उर्वरकों की कमी का असर बाजार में भी दिखाई दे रहा है. कमी का फायदा उठाते हुए कई जगह रासायनिक खाद के एक बैग की खुदरा कीमत 100 से 200 रुपये तक बढ़ गई है. वहीं, जैविक विकल्पों जैसे गोबर खाद (फार्मयार्ड मैन्योर) की कीमत भी बढ़ गई है. पिछले साल की तुलना में एक ट्रैक्टर खाद की कीमत करीब 2,000 रुपये तक अधिक हो गई है. इसके अलावा कृषि मजदूरों की मजदूरी बढ़ने से बुवाई की कुल लागत में भी भारी इजाफा हुआ है और अब किसानों को प्रति एकड़ करीब 5,000 रुपये तक अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है.
सरकार से जल्द हस्तक्षेप करने की मांग
खेती और रोजमर्रा की जिंदगी दोनों की बढ़ती लागत के बीच किसान संगठनों ने राज्य सरकार से जल्द हस्तक्षेप करने की मांग की है. उनका कहना है कि बुवाई का समय निकलने से पहले सरकार को उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और किसानों को राहत देने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए. प्रांथा रैथा संघ के राज्य महासचिव यशवंता टी ने कहा कि राज्य का किसान समुदाय इस समय बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है. खेती में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की कीमतें तेजी से बढ़ने के कारण इस सीजन में कृषि करना किसानों के लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा है. उन्होंने सरकार से मांग की कि किसानों को राहत देने के लिए तुरंत एक विशेष पैकेज की घोषणा की जाए। इस पैकेज में कृषि आदानों पर सीधी सब्सिडी, ब्याज मुक्त ऋण और फसलों के लिए विशेष मूल्य सहायता जैसी सुविधाएं शामिल हों, ताकि किसानों को बढ़ती लागत और संभावित नुकसान से बचाया जा सके.