PHOTOS: चना किसानों के लिए अलर्ट! फरवरी में ये गलती की तो 30 फिसदी तक घट सकती है पैदावार, एक्सपर्ट से जानें उपाय
Chane Ki Kheti: फरवरी का महीना चने की फसल के लिए निर्णायक समय होता है. इसी दौर में खेतों में फलियां बनती हैं और दानों का आकार तय होता है. लेकिन जरा सी लापरवाही, बढ़ता तापमान या फली छेदक कीट पूरे सीजन की मेहनत पर पानी फेर सकता है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं कि अगर इस स्टेज पर सही देखभाल और समय पर नियंत्रण किया जाए, तो पैदावार में बड़ा इजाफा संभव है.

फरवरी चने की फसल के लिए बेहद महत्वपूर्ण समय है, क्योंकि इसी दौरान फलियों में दाने बनना शुरू होते हैं. इस चरण में लापरवाही से दाने छोटे रह सकते हैं और उत्पादन घट सकता है, इसलिए खास निगरानी जरूरी है.

कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार फली छेदक कीट तैयार हो रही फलियों में छेद कर दानों को नुकसान पहुंचाता है. अगर समय पर नियंत्रण न किया जाए तो पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है.

किसानों को सुबह या शाम खेत का निरीक्षण करना चाहिए. फलियों में छोटे छेद या हरे कीट दिखें तो तुरंत कार्रवाई करें. फेरोमोन ट्रैप से कीटों की सक्रियता का समय पर पता लगाया जा सकता है, जिससे सही दवा का चयन आसान होता है.

खेत में नमी बनी रहे, लेकिन जलजमाव न हो. जरूरत के अनुसार हल्की सिंचाई करें. सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव दानों के भराव को बेहतर बनाता है और पौधों को मजबूत करता है, जिससे कीटों का प्रकोप कम होता है.

कीट प्रकोप बढ़ने पर इमिडक्लोरोपिड का छिड़काव (1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) 20 दिन के अंतराल पर दो बार किया जा सकता है. पहली बार जैविक और दूसरी बार रासायनिक दवा से लगभग 90% तक नियंत्रण संभव है.

जब 90-95 फीसदी फलियां भूरी हो जाएं और दानों में 18-20 फीसदी नमी रहे, तभी कटाई करें. सुबह कटाई करना बेहतर रहता है, क्योंकि इससे फलियां कम टूटती हैं और पैदावार में 30 फीसदी तक की संभावित कमी से बचा जा सकता है.