शाही लीची को टक्कर दे रही तेजपुर लीची, GI टैग से मिली पहचान.. विदेशों में भी डिमांड

तेजपुर लीची अपने स्वाद, रंग और गुणवत्ता के लिए जानी जाती है और इसे 2013 में GI टैग मिला है. यह असम के सोनितपुर में 150 से अधिक किसानों द्वारा उगाई जाती है. APEDA के जरिए इसका निर्यात विदेशों तक हो रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार इसमें उत्पादन और वैश्विक विस्तार की बड़ी संभावनाएं हैं.

नोएडा | Updated On: 15 Jun, 2026 | 03:18 PM

Litchi Farming: जब भी लीची की बात होती है, तो अक्सर लोगों के मन में बिहार के मुजफ्फरपुर की शाही लीची का नाम सबसे पहले आता है. यह माना जाता है कि देश की सबसे मशहूर और स्वादिष्ट लीची वही है, क्योंकि इसे GI टैग भी मिला हुआ है. लेकिन असल में असम की तेजपुर लीची भी किसी मामले में कम नहीं है. तेजपुर लीची अपने बेहतरीन स्वाद, मीठे रस और आकर्षक लाल रंग के लिए जानी जाती है. इसे भी GI टैग प्राप्त है, जो इसकी गुणवत्ता और खास पहचान को दर्शाता है. इसी वजह से तेजपुर लीची की मांग न सिर्फ देश में, बल्कि विदेशों में भी बढ़ रही है और इसका निर्यात भी किया जा रहा है.

असम की तेजपुर लीची को 2013 में GI टैग मिला था, जिसका रजिस्ट्रेशन नंबर 438 है. यह टैग नॉर्थ ईस्ट रीजनल एग्रीकल्चरल मार्केटिंग कॉरपोरेशन (NERAMAC) के प्रयासों से हासिल हुआ था. GI टैग का मतलब है कि इस फल का नाम कानूनी रूप से सुरक्षित हो जाता है और इसे केवल उसी क्षेत्र के असली उत्पादक ही इस्तेमाल कर सकते हैं. इस पहचान से तेजपुर लीची की बाजार में अलग पहचान बनी है और खासकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग बढ़ाने में मदद मिली है.

किसानों को ज्यादा कमाई की उम्मीद

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) की मदद से इसकी खेप पहले ही यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में भेजी जा चुकी है. इसके प्रचार के लिए ‘लीची उत्सव’ जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं, ताकि लोगों में इसके आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व को बढ़ावा मिल सके. खास बात यह है कि निर्यात से जुड़े किसानों को घरेलू बाजार  की तुलना में करीब 10 फीसदी ज्यादा कीमत मिलती है. इससे किसानों की आय बढ़ने की उम्मीद है. इस पहल से असम के फल उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान मिलेगी, किसानों की कमाई बढ़ेगी और राज्य की वैश्विक फल बाजार में हिस्सेदारी मजबूत होगी.

400 बीघा जमीन पर हो रही खेती

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि अभी भी तेजपुर लीची का वैश्विक बाजार में विस्तार सीमित है. इसका कारण सप्लाई चेन की समस्याएं, एक समान खेती तकनीक की कमी, कटाई के बाद भंडारण की कमजोर व्यवस्था और बाजार से जुड़ाव की कमी है. इसलिए इसके वैश्विक ब्रांड बनने की प्रक्रिया अभी पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाई है. ऐसे तेजपुर में लीची की खेती का इतिहास 1923 से शुरू होता है. उस समय प्रसिद्ध साहित्यकार और तेजपुर नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष पद्मनाथ गोहैन बरुआ ने शहर में लीची के बागान लगाए थे. मौजूदा वक्त में तेजपुर में 150 से ज्यादा किसान करीब 400 बीघा जमीन पर लीची की खेती कर रहे हैं. हाल ही में आयोजित एक महोत्सव में लीची की कई किस्मों का प्रदर्शन किया गया, जिनमें चाही, बिलाती, बॉम्बेया, पियाजी, चाइनीज, रोंगिया, कैथ बॉम्बेवा और इलायची लीची शामिल हैं.

तेजपुर लीची की खासियत

असम के सोनितपुर जिले में उगाई जाने वाली तेजपुर लीची अपनी खास मिठास, रसदार गूदे और चमकदार लाल रंग के लिए जानी जाती है. इसकी बेहतरीन गुणवत्ता के कारण इसे भौगोलिक संकेतक (GI टैग) मिला हुआ है. ऐसे तेजपुर की लीची की खेती के लिए गर्म और नमी वाली उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु सबसे अच्छी मानी जाती है. विशेषज्ञों के अनुसार गर्मियों में तापमान 40.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि सर्दियों में पाला नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि इससे फसल को नुकसान हो सकता है. इसकी खेती के लिए गहरी, अच्छी जल निकासी वाली और जैविक पदार्थों से भरपूर दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. मिट्टी का pH स्तर 5.0 से 7.0 के बीच होना चाहिए. इसके अलावा, फूल आने के समय यानी फरवरी-मार्च में तेज बारिश नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे परागण प्रभावित होता है और उत्पादन पर असर पड़ता है.

तेजपुर लीची का प्रोडक्शन

लीची की खेती में पौधरोपण आमतौर पर जुलाई-अगस्त के मॉनसून सीजन में या फिर फरवरी-मार्च में किया जाता है. यह समय पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए उपयुक्त माना जाता है. तेजपुर में लीची के पेड़ों में फरवरी के महीने से फूल आना शुरू हो जाता है. मई तक फल पूरी तरह पक जाते हैं और जून में इसकी मुख्य कटाई की जाती है. उत्पादन की बात करें तो एक पुराने लीची के पेड़ से हर साल औसतन 7,000 से 8,000 फल मिलते हैं, जबकि नए पौधों से लगभग 3,000 से 4,000 फल प्राप्त होते हैं. तेजपुर की एक खास बात यह भी है कि यहां लीची की खेती प्राकृतिक तरीके से की जाती है, यानी इसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता.

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Published: 15 Jun, 2026 | 03:14 PM

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