Report: 92 फीसदी बारिश के अनुमान से बढ़ी चिंता, मॉनसून कमजोर तो खेती-ग्रामीण बाजार पर असर तय

इस साल एक और बड़ी चिंता पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष है. इस संघर्ष के कारण गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है, जो उर्वरक बनाने के लिए जरूरी होती है. जब गैस की कमी होती है, तो खाद और कीटनाशकों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. इससे या तो उनकी कीमत बढ़ जाती है या बाजार में कमी हो जाती है.

नई दिल्ली | Updated On: 18 Apr, 2026 | 02:16 PM

Monsoon forecast 2026: भारत की खेती पूरी तरह से मौसम पर निर्भर मानी जाती है, खासकर मानसून पर. ऐसे में अगर बारिश कम होने का अनुमान सामने आए, तो किसानों के साथ-साथ पूरी अर्थव्यवस्था की चिंता बढ़ जाती है. भारत मौसम विज्ञान विभाग ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून का पहला पूर्वानुमान जारी किया है. इसके अनुसार इस साल देश में बारिश सामान्य से कम रह सकती है. विभाग ने अनुमान लगाया है कि कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 92 प्रतिशत ही रहेगी. यह पिछले 25 सालों में सबसे कम शुरुआती अनुमान माना जा रहा है.

खेती के लिए क्यों जरूरी है अच्छा मानसून

भारत में बड़ी संख्या में किसान अभी भी बारिश पर निर्भर खेती करते हैं. खासकर खरीफ फसलें जैसे धान, मक्का और दालें सीधे मानसून पर निर्भर होती हैं. अगर बारिश समय पर और पर्याप्त मात्रा में हो, तो फसल अच्छी होती है और किसानों की आमदनी बढ़ती है. लेकिन अगर बारिश कम हो जाए, तो फसल की पैदावार घट जाती है. इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ग्रामीण बाजार, रोजगार और देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है.

बैंक ऑफ बड़ौदा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मानसून का सीधा असर कृषि उत्पादन और ग्रामीण खर्च पर पड़ता है. जब खेती अच्छी होती है, तो गांवों में खरीदारी बढ़ती है और अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है.

पश्चिम एशिया का संकट भी बना परेशानी

इस साल एक और बड़ी चिंता पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष है. इस संघर्ष के कारण गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है, जो उर्वरक बनाने के लिए जरूरी होती है. जब गैस की कमी होती है, तो खाद और कीटनाशकों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. इससे या तो उनकी कीमत बढ़ जाती है या बाजार में कमी हो जाती है. दोनों ही स्थिति किसानों के लिए मुश्किल पैदा करती हैं, क्योंकि खेती की लागत बढ़ जाती है.

सिंचाई की कमी से बढ़ता जोखिम

भारत में अभी भी पूरी खेती सिंचाई से नहीं जुड़ी है. पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, केवल 50 से 60 प्रतिशत खेती ही सिंचाई के दायरे में आती है. इसका मतलब है कि बाकी खेत पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं. ऐसे में अगर मानसून कमजोर रहता है, तो इन इलाकों में फसल पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है. साथ ही, मानसून का असर जलाशयों पर भी पड़ता है. अगर बारिश कम होगी, तो बांधों में पानी कम भरेगा, जिससे पूरे साल पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है.

खरीफ फसलों पर ज्यादा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून का असर सबसे ज्यादा खरीफ फसलों पर पड़ता है. आंकड़े बताते हैं कि खरीफ उत्पादन और बारिश के बीच मजबूत संबंध है. हालांकि रबी फसलें भी प्रभावित होती हैं, लेकिन उनका असर थोड़ा कम होता है. फिर भी अगर जलाशयों में पानी कम रहेगा, तो रबी फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं.

पहले भी दिख चुका है असर

पिछले अनुभव बताते हैं कि जब मानसून कमजोर होता है, तो खेती पर असर पड़ता ही है. 2014-15 और 2015-16 में जब बारिश सामान्य से काफी कम रही थी, तब खरीफ उत्पादन घट गया था. हालांकि उन वर्षों में रबी फसलें कुछ हद तक संभली रहीं, लेकिन कुल मिलाकर कृषि क्षेत्र दबाव में रहा.

अभी सिर्फ शुरुआती अनुमान

यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह मानसून का पहला अनुमान है. मई के अंत तक इसका अपडेटेड पूर्वानुमान जारी किया जाएगा, जिसमें कुछ बदलाव संभव है. फिर भी यह शुरुआती संकेत किसानों और सरकार दोनों के लिए तैयारी करने का मौका देता है.

क्या हो सकता है असर

अगर मानसून कमजोर रहता है और खाद की सप्लाई भी प्रभावित होती है, तो खेती की लागत बढ़ सकती है और उत्पादन घट सकता है. इससे किसानों की आय पर असर पड़ेगा और ग्रामीण बाजार भी कमजोर हो सकते हैं. इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ सकता है, क्योंकि कृषि का योगदान अभी भी बहुत महत्वपूर्ण है.

ऐसी स्थिति में जरूरी है कि किसान और सरकार दोनों मिलकर तैयारी करें. पानी का सही उपयोग, वैकल्पिक खेती और संतुलित खाद का इस्तेमाल जैसी चीजें मदद कर सकती हैं.

Published: 18 Apr, 2026 | 01:48 PM

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