Monsoon 2026: देश में इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है. जून का महीना खत्म होने को है, लेकिन अब तक सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है. मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जून के आखिर तक देश में करीब 40 प्रतिशत कम बारिश रहने का अनुमान है. ऐसे में किसानों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि खरीफ फसलों की बुवाई और खेती का बड़ा हिस्सा समय पर होने वाली बारिश पर निर्भर करता है.
जून में बारिश रही काफी कम
मौसम विभाग के अनुसार 29 जून तक देश में करीब 9.21 सेंटीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से लगभग 42 प्रतिशत कम है. खासकर जून के दूसरे पखवाड़े में बारिश की कमी और ज्यादा रही, जहां करीब 47 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. हालांकि महीने के आखिरी दिनों में कुछ राज्यों में बारिश बढ़ी है, जिससे कुल कमी थोड़ी घटकर लगभग 39 से 40 प्रतिशत रहने की संभावना है.
अगले तीन महीनों में भी नहीं दिख रही बड़ी राहत
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही अनुमान लगाया था कि इस बार पूरे मॉनसून सीजन में सामान्य से कम बारिश हो सकती है. विभाग के मुताबिक इस साल मॉनसून सामान्य औसत (LPA) का करीब 90 प्रतिशत रहने की संभावना है. अगर जून में बारिश लगभग 10 सेंटीमीटर पर खत्म होती है, तो जुलाई से सितंबर के बीच काफी अच्छी बारिश की जरूरत होगी. लेकिन मौसम के अलग-अलग मॉडल फिलहाल ऐसी किसी बड़ी सुधार की उम्मीद नहीं जता रहे हैं. कुछ अंतरराष्ट्रीय मॉडल तो अगले तीन महीनों में सामान्य से काफी कम बारिश का अनुमान लगा रहे हैं.
जुलाई रहेगा सबसे अहम महीना
मॉनसून के पूरे सीजन में जुलाई सबसे ज्यादा बारिश वाला महीना माना जाता है. कुल मॉनसून बारिश का लगभग एक-तिहाई हिस्सा जुलाई में ही होता है. इसलिए किसानों और कृषि क्षेत्र की नजर अब जुलाई के मौसम पर टिकी हुई है. अगर जुलाई में अच्छी बारिश नहीं होती, तो खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं.
खाद की मांग पर भी पड़ेगा असर
कम बारिश का असर सिर्फ खेती पर ही नहीं, बल्कि उर्वरकों की मांग पर भी दिखाई दे सकता है. खरीफ सीजन में किसान आमतौर पर बुवाई के साथ ही पहली बार खाद का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन जहां बारिश देर से पहुंची है या अभी तक पर्याप्त नहीं हुई है, वहां बुवाई भी प्रभावित हुई है. ऐसे में खाद की पहली खुराक देने में भी देरी हो रही है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, खरीफ सीजन के लिए बड़ी मात्रा में उर्वरकों की जरूरत का अनुमान लगाया गया है. हालांकि अगर बारिश सामान्य से कम रहती है, तो खासकर वर्षा आधारित खेती वाले इलाकों में खाद की वास्तविक मांग भी घट सकती है.
विशेषज्ञों ने दी यह सलाह
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) का कहना है कि उर्वरकों की खपत काफी हद तक मॉनसून और बुवाई की स्थिति पर निर्भर करती है. अगर लगातार अच्छी बारिश होती है और बुवाई तेजी से आगे बढ़ती है, तभी खाद की मांग बढ़ेगी. वहीं बारिश में देरी होने पर किसान खाद का उपयोग भी देर से करेंगे.
किसानों को क्या करना चाहिए?
ऐसे में किसान मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमानों पर लगातार नजर रखें. जल्दबाजी में बुवाई करने के बजाय पर्याप्त बारिश का इंतजार करें और अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विभाग की सलाह के अनुसार ही फसल और उर्वरकों का इस्तेमाल करें.