जम्मू-कश्मीर में सूखे की आहट: जनवरी में 96 फीसदी बारिश की कमी, पानी और खेती पर मंडराया संकट
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र में जनवरी में औसतन 33 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस बार अब तक सिर्फ 1.4 मिलीमीटर वर्षा ही दर्ज की गई है. मौसम विभाग की भाषा में इसे “लार्ज डेफिसिट” यानी गंभीर कमी की श्रेणी में रखा गया है.
जम्मू-कश्मीर में इस सर्दी का मौसम उम्मीदों के बिल्कुल उलट साबित हो रहा है. आमतौर पर जनवरी का महीना बर्फबारी और बारिश के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार घाटी से लेकर जम्मू और लद्दाख तक मौसम ने लोगों को निराश किया है. जनवरी के पहले 18 दिनों में राज्य में सामान्य से करीब 96 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है. यह आंकड़ा सिर्फ मौसम का नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में जल संकट, खेती और सेहत से जुड़ी बड़ी परेशानियों का संकेत दे रहा है.
सामान्य से बेहद कम बरसात, IMD के आंकड़े चिंताजनक
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र में जनवरी में औसतन 33 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस बार अब तक सिर्फ 1.4 मिलीमीटर वर्षा ही दर्ज की गई है. मौसम विभाग की भाषा में इसे “लार्ज डेफिसिट” यानी गंभीर कमी की श्रेणी में रखा गया है. कश्मीर, जम्मू और लद्दाख – तीनों हिस्से इस कमी की चपेट में हैं.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर घाटी के कई जिले जैसे बडगाम, शोपियां और श्रीनगर में जनवरी के दौरान एक बूंद भी बारिश नहीं हुई. पुलवामा, बांदीपोरा, कुलगाम, अनंतनाग और बारामूला जैसे जिलों में भी बारिश का आंकड़ा 1 से 2 मिलीमीटर के आसपास ही सिमटा रहा. जम्मू क्षेत्र में डोडा, रामबन, सांबा और उधमपुर जैसे जिलों में शून्य वर्षा दर्ज की गई, जबकि राजौरी और पुंछ जैसे इलाकों में भी सामान्य से बहुत कम बारिश हुई. लद्दाख के लेह और कारगिल में भी हालात कुछ बेहतर नहीं हैं.
लगातार सूखी सर्दियां, पानी का भंडार नहीं हो पा रहा तैयार
यह पहली बार नहीं है जब जम्मू-कश्मीर में सर्दियों के दौरान इतनी कम बारिश और बर्फबारी हुई हो. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि 2018 के बाद से दिसंबर और जनवरी के महीने लगातार सूखे गुजर रहे हैं. सिर्फ 2020 और 2021 में स्थिति थोड़ी बेहतर रही थी. बर्फबारी का दायरा अब केवल ऊंचाई वाले इलाकों जैसे गुलमर्ग, सोनमर्ग, जोजिला दर्रा और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित रह गया है, जबकि मैदानी और आबादी वाले इलाके लगभग सूखे हैं.
सर्दियों में गिरने वाली बर्फ ही गर्मियों में नदियों, झीलों, झरनों और पीने के पानी के स्रोतों की जान होती है. जब बर्फ कम पड़ती है, तो गर्मियों में पानी का संकट लगभग तय हो जाता है.
झेलम नदी और सहायक नदियों में घटता जलस्तर
सूखे का असर अब साफ तौर पर जलस्रोतों पर दिखने लगा है. झेलम नदी का जलस्तर संगम पर शून्य स्तर से नीचे चला गया है, जो अपने आप में एक चेतावनी है. झेलम की कई सहायक नदियां और नाले या तो बेहद कम बहाव पर हैं या कुछ जगहों पर सूखने लगे हैं. कुलगाम, अनंतनाग, पुलवामा और त्राल जैसे इलाकों में पानी की उपलब्धता पहले ही प्रभावित हो चुकी है.
जल विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आने वाले दिनों में अच्छी बर्फबारी नहीं हुई, तो सिंचाई और पीने के पानी की योजनाओं पर भारी दबाव पड़ेगा.
खेती, बागवानी और सेहत पर दिखने लगा असर
कश्मीर की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खेती और बागवानी पर टिका है. सेब उत्पादक किसानों का कहना है कि बर्फ न गिरने से मिट्टी में नमी नहीं बन पा रही है. इससे पेड़ों की सेहत कमजोर हो सकती है और आने वाले मौसम में पैदावार प्रभावित होने की आशंका है. किसानों को डर है कि अगर गर्मियों तक यही हालात रहे, तो फसलें और बाग दोनों संकट में आ जाएंगे.
सूखे मौसम का असर लोगों की सेहत पर भी दिखने लगा है. अस्पतालों में सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ रही है. धूल, सूखी हवा और बढ़ते तापमान का असर खासकर बुजुर्गों और बच्चों पर ज्यादा पड़ रहा है. वहीं जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं, क्योंकि नमी की कमी से हालात और खतरनाक हो गए हैं.
आगे क्या बढ़ेगा संकट या मिलेगी राहत?
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर सर्दियों के बचे हुए दिनों में कोई मजबूत पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं हुआ, तो हालात और बिगड़ सकते हैं. बर्फबारी ही एकमात्र ऐसा जरिया है, जो ग्लेशियरों और जलस्रोतों को दोबारा भर सकती है. फिलहाल हल्की बर्फबारी की संभावना जताई जा रही है, लेकिन यह साफ नहीं है कि उसका असर निचले इलाकों तक पहुंचेगा या नहीं.
अगर मौसम ने जल्द करवट नहीं ली, तो जम्मू-कश्मीर को आने वाली गर्मियों में पानी की भारी किल्लत, खेती में नुकसान और रोजमर्रा की जिंदगी में गंभीर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. यह सूखा सिर्फ एक मौसम की खबर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक बड़ी चेतावनी बनकर सामने आया है.