महाराष्ट्र रबी सीजन खेती गाइड: गेहूं-गन्ना से बागवानी तक, बदलते मौसम में सुरक्षित फसल, खाद और सिंचाई की पूरी रणनीति

बदलते मौसम, अनियमित बारिश, बढ़ती लागत और बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच अब रबी खेती केवल परंपरागत अनुभव पर निर्भर नहीं रह गई है. आज यह जरूरी हो गया है कि किसान वैज्ञानिक सलाह, आधुनिक तकनीक और स्थानीय परिस्थितियों को साथ लेकर आगे बढ़े.

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नई दिल्ली | Published: 5 Jan, 2026 | 05:09 PM

Maharashtra rabi guide: महाराष्ट्र में रबी का मौसम खेती के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है. खरीफ की कटाई के बाद खेतों में जो नमी बची रहती है, वही रबी फसलों की नींव बनती है. यही वह समय होता है जब किसान अगर सही योजना बना ले, तो पूरे साल की आमदनी को सुरक्षित कर सकता है. रबी की खेती केवल ठंड के मौसम की फसल नहीं है, बल्कि यह समझदारी, समय पर निर्णय और संसाधनों के संतुलित उपयोग की परीक्षा भी है.

बदलते मौसम, अनियमित बारिश, बढ़ती लागत और बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच अब रबी खेती केवल परंपरागत अनुभव पर निर्भर नहीं रह गई है. आज यह जरूरी हो गया है कि किसान वैज्ञानिक सलाह, आधुनिक तकनीक और स्थानीय परिस्थितियों को साथ लेकर आगे बढ़े. इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए ICAR से जुड़ी रबी सीजन की कृषि सलाह महाराष्ट्र के किसानों के लिए एक भरोसेमंद मार्गदर्शक की तरह काम करती है.

महाराष्ट्र में रबी खेती की आधारभूत समझ

महाराष्ट्र का कृषि परिदृश्य बहुत विविध है. विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में खेती मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर रहती है, जबकि पश्चिमी महाराष्ट्र और कुछ उत्तरी जिलों में नहरों, कुओं और बांधों के कारण सिंचाई की बेहतर सुविधा है. यही कारण है कि रबी फसलों की योजना हर क्षेत्र में अलग-अलग तरीके से बनानी पड़ती है. आमतौर पर रबी मौसम सितंबर के मध्य से शुरू होकर अक्टूबर नवंबर में बुवाई और मार्च–अप्रैल में कटाई तक चलता है. इस दौरान गेहूं, चना, ज्वार, सरसों, कुसुम जैसी फसलें प्रमुख भूमिका निभाती हैं. इनके साथ-साथ सब्जियां, बागवानी फसलें और पशुपालन जैसी सहायक गतिविधियां भी किसान की आय को सहारा देती हैं.

रबी योजना में वैज्ञानिक सलाह का महत्व

रबी फसलों के लिए जारी की जाने वाली कृषि सलाहें केवल कागजी निर्देश नहीं होतीं, बल्कि ये खेतों में हुए लंबे शोध और किसानों के वास्तविक अनुभवों पर आधारित होती हैं. वैज्ञानिकों का उद्देश्य सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि जोखिम को कम करना, लागत को नियंत्रण में रखना और खेती को लंबे समय तक टिकाऊ बनाना होता है. जब किसान इन सलाहों को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाता है, तो खेती अधिक सुरक्षित और लाभकारी बन जाती है.

महाराष्ट्र की मुख्य फसलें

चना: रबी दालों की रीढ़

चना महाराष्ट्र की सबसे भरोसेमंद रबी दाल मानी जाती है. वर्षा आधारित क्षेत्रों में इसकी बुवाई अक्टूबर के पहले पखवाड़े में बची हुई नमी पर की जाती है, जबकि सिंचित क्षेत्रों में अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के पहले सप्ताह तक बुवाई बेहतर रहती है. चना हल्की से मध्यम काली मिट्टी में अच्छा प्रदर्शन करता है. उन्नत देशी किस्में जैसे आकाश, फुले विक्रम, फुले विक्रांत और JAKI-9218 अधिक उपज देने में सक्षम हैं. वहीं काबुली चने के लिए PKV कबुली-2, विराट और BDNGK-798 जैसी किस्में किसानों के बीच लोकप्रिय हैं.

बीज दर किस्म और दाने के आकार पर निर्भर करती है. बुवाई से पहले बीज उपचार बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे बीजजनित रोगों और शुरुआती कीटों से बचाव होता है. चना फसल में संतुलित उर्वरक प्रबंधन खास भूमिका निभाता है. फास्फोरस और पोटाश का सही उपयोग जड़ों को मजबूत बनाता है और पौधे को स्वस्थ रखता है. फूल और फली बनने की अवस्था पर यदि सिंचाई उपलब्ध हो, तो पैदावार में साफ बढ़ोतरी देखी जाती है. कीट नियंत्रण के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाने से लागत भी घटती है और फसल सुरक्षित रहती है.

गेहूं: सिंचित क्षेत्रों की रीढ़

महाराष्ट्र में गेहूं मुख्य रूप से सिंचित क्षेत्रों की फसल है. समय पर बोया गया गेहूं अधिक उत्पादन देता है, इसलिए नवंबर के पहले पखवाड़े में बुवाई सबसे उपयुक्त मानी जाती है. यदि किसी कारण से देरी हो जाए, तो दिसंबर के मध्य तक भी बुवाई संभव है, बशर्ते पानी उपलब्ध हो. वर्षा आधारित क्षेत्रों में गेहूं अक्टूबर के पहले पखवाड़े में बची नमी पर बोया जाता है.

उन्नत और रोग-रोधी किस्मों का चयन गेहूं की सफलता की कुंजी है. गेहूं की फसल में कुछ सिंचाई चरण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, जैसे कि अंकुरण के बाद शुरुआती अवस्था, कल्ले निकलना, फूल आना और दाना भरना. सीमित पानी की स्थिति में भी यदि इन्हीं अवस्थाओं पर सिंचाई कर दी जाए, तो उपज संतोषजनक रहती है. खाद प्रबंधन में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि पौधे स्वस्थ रहें और दानों का भराव अच्छा हो.

रबी ज्वार: कम पानी में सुरक्षित फसल

रबी ज्वार महाराष्ट्र के सूखे और अर्ध-सूखे क्षेत्रों के लिए एक भरोसेमंद विकल्प है. यह फसल मुख्य रूप से खरीफ फसलों की कटाई के बाद बची हुई नमी पर बोई जाती है. सितंबर के मध्य से अक्टूबर के आरंभ तक बुवाई करने से पौधों को ठंड से पहले अच्छी जड़ पकड़ने का मौका मिलता है. ज्वार की फसल में कतारों की दूरी और पौधों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि नमी और पोषक तत्वों का सही उपयोग हो सके.

रबी ज्वार में संतुलित उर्वरक प्रयोग से दाने और चारे दोनों का उत्पादन बढ़ता है. बीज उपचार और शुरुआती निगरानी से तना छेदक जैसे कीटों से बचाव किया जा सकता है. यह फसल न केवल अनाज देती है, बल्कि पशुपालन के लिए उच्च गुणवत्ता का चारा भी उपलब्ध कराती है.

कुसुम (सैफ्लावर): सूखे इलाकों की मजबूत तिलहनी फसल

कुसुम उन फसलों में से है जो कम पानी और कठिन परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन देती हैं. महाराष्ट्र के कई सूखे इलाकों में यह रबी की अहम तिलहनी फसल बन चुकी है. अक्टूबर के पहले पखवाड़े में बची हुई नमी पर इसकी बुवाई की जाती है. कुसुम की फसल गहरी जड़ें बनाती है, जिससे यह मिट्टी की निचली परतों से भी नमी और पोषक तत्व ले सकती है.

कुसुम में पौध संख्या नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है, ताकि हर पौधे को पर्याप्त जगह और पोषण मिल सके. एफिड जैसे कीटों का प्रकोप कभी-कभी बढ़ सकता है, इसलिए समय पर जैविक या रासायनिक उपाय अपनाने चाहिए. कुसुम का तेल स्वास्थ्य के लिहाज से अच्छा माना जाता है और बाजार में इसकी मांग बनी रहती है.

अलसी और सरसों: सीमित क्षेत्र, लेकिन स्थिर आमदनी

अलसी कम अवधि की रबी फसल है, जिसे अक्टूबर के मध्य तक बोना चाहिए. संतुलित उर्वरक और समय पर खरपतवार नियंत्रण से इसकी पैदावार बेहतर होती है. वहीं सरसों नवंबर के पहले पखवाड़े में बोई जाती है और यह तिलहन के रूप में किसानों को अतिरिक्त आय देती है. सरसों में फफूंदजनित रोगों से बचाव और फूल आने के समय हल्की सिंचाई से उपज में सुधार होता है. सरसों की खेती से किसान को तेल के साथ-साथ खली भी मिलती है, जो पशु आहार में काम आती है.

गन्ना: रबी के साथ दीर्घकालीन आय का मजबूत आधार

महाराष्ट्र में गन्ना केवल एक फसल नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है. रबी मौसम के दौरान प्री-सीजन और सामान्य सीजन गन्ने की बुवाई की जाती है. प्री-सीजन गन्ना अक्टूबर से मध्य नवंबर तक लगाया जाता है, जबकि सामान्य सीजन का गन्ना जनवरी से फरवरी के बीच बोया जाता है. अच्छी जल निकास वाली मध्यम से भारी काली मिट्टी गन्ने के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है.

गन्ने की खेती में सही किस्मों का चयन, कतारों और पौधों के बीच उचित दूरी तथा चरणबद्ध खाद प्रबंधन बेहद जरूरी है. नाइट्रोजन को कई हिस्सों में देने से पौधों की बढ़वार संतुलित रहती है और तनों में रस भराव अच्छा होता है. निराई-गुड़ाई, मिट्टी चढ़ाना और कीट-रोगों की नियमित निगरानी से फसल मजबूत बनती है. सही प्रबंधन के साथ गन्ने की खेती किसानों को लंबे समय तक स्थिर आय देती है और चीनी मिलों, गुड़ व एथेनॉल उद्योग से जोड़कर ग्रामीण रोजगार को मजबूती देती है.

बागवानी फसलें: रबी में अतिरिक्त आमदनी का जरिया

रबी मौसम में बागवानी फसलों की भूमिका भी बेहद अहम है. अनार में अंबिया बहार के लिए छंटाई, नियंत्रित सिंचाई और संतुलित पोषण जरूरी होता है. संतरा और मीठे संतरे में जल तनाव प्रबंधन से फूलन और फलन बेहतर होता है. आम में जैविक मल्चिंग और फल मक्खी नियंत्रण पर ध्यान देना चाहिए. केला और अंगूर में ठंड से बचाव और नियंत्रित सिंचाई से पौधों की सेहत बनी रहती है.

सब्जी फसलें

रबी मौसम में बैंगन, टमाटर, प्याज और भिंडी जैसी सब्जियां किसानों को जल्दी नकदी देती हैं. उन्नत किस्मों का चयन, समय पर रोपाई और रोग-कीट प्रबंधन से इन फसलों में अच्छा मुनाफा संभव है. प्याज में कटाई से पहले सिंचाई रोकना और सही समय पर कटाई करने से भंडारण क्षमता बढ़ती है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं.

फूलों की खेती

गेंदा, गुलदाउदी, रजनीगंधा, ग्लैडियोलस, चमेली और गुलाब जैसी फूलों की फसलें रबी मौसम में अच्छी आमदनी देती हैं. सही दूरी, संतुलित उर्वरक और रोग नियंत्रण से फूलों की गुणवत्ता सुधरती है. अच्छी गुणवत्ता वाले फूलों को बाजार में बेहतर दाम मिलते हैं, जिससे किसानों की आमदनी बढ़ती है.

उर्वरक उपयोग पर एक नजर

रबी फसलों की सफलता में उर्वरक प्रबंधन की भूमिका बेहद अहम है. अक्सर किसान या तो जरूरत से ज्यादा खाद डाल देते हैं या फिर सही समय पर खाद नहीं देते, जिससे फसल की बढ़वार प्रभावित होती है और लागत भी बढ़ती है. रबी मौसम में मिट्टी की जांच कराकर उसी के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग करना सबसे बेहतर तरीका है.

दलहनी फसलों में अधिक नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती, जबकि गेहूं और गन्ने जैसी फसलों में नाइट्रोजन को चरणों में देना जरूरी होता है. जैविक खाद, गोबर की खाद और जैव उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की सेहत को सुधारता है और लंबे समय में रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करता है. सही उर्वरक प्रबंधन से न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि मिट्टी भी उपजाऊ बनी रहती है.

पशुपालन और सहायक गतिविधियां

रबी खेती के साथ पशुपालन किसानों की आय को स्थिर बनाता है. हरे चारे की योजना, समय पर टीकाकरण और संतुलित आहार से दूध उत्पादन बढ़ता है. मत्स्य पालन, रेशम उत्पादन और अन्य सहायक उद्यम ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करते हैं. फसल कटाई के बाद अनाज और दालों का सही भंडारण नुकसान को कम करता है और बेहतर दाम दिलाने में मदद करता है.

कटाई के बाद प्रबंधन और मूल्य संवर्धन

रबी फसलों की सफलता केवल खेत तक सीमित नहीं होती. कटाई के बाद सही भंडारण, प्रसंस्करण और पैकेजिंग से किसानों को बेहतर कीमत मिलती है. दालों को प्रोसेस करना, फलों से जूस और सूखे उत्पाद बनाना, और सब्जियों का प्रसंस्करण किसानों की आमदनी को कई गुना बढ़ा सकता है.

टिकाऊ खेती की दिशा

महाराष्ट्र में रबी खेती की असली ताकत समय पर निर्णय, वैज्ञानिक सलाह और संसाधनों के समझदारी भरे उपयोग में है. न्यूनतम जुताई, जल संरक्षण, यंत्रीकरण और महिला किसानों की भागीदारी खेती को टिकाऊ बनाती है. अगर किसान पारंपरिक अनुभव को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ें और ICAR जैसी संस्थाओं की सलाह को जमीनी स्तर पर अपनाएं, तो रबी मौसम न केवल सुरक्षित होगा, बल्कि आने वाले वर्षों में खेती को आर्थिक रूप से और भी मजबूत आधार देगा.

महाराष्ट्र के किसानों को क्या करना चाहिए

महाराष्ट्र के किसानों को सबसे पहले मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता देनी चाहिए. हर दो–तीन साल में मिट्टी की जांच कराना जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि खेत में किस पोषक तत्व की कमी या अधिकता है. इसी आधार पर खाद और उर्वरक डालने से खर्च भी घटता है और फसल भी मजबूत होती है.

बुवाई से पहले मौसम का पूर्वानुमान जरूर देखना चाहिए. बिना मौसम देखे की गई बुवाई अक्सर अंकुरण खराब होने या फसल नष्ट होने का कारण बनती है, खासकर वर्षा आधारित क्षेत्रों में.

हमेशा क्षेत्र के अनुकूल और प्रमाणित किस्मों का ही चयन करें. स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा सुझाई गई किस्में रोगों के प्रति अधिक सहनशील होती हैं और बाजार में भी बेहतर दाम दिलाती हैं.

बीज उपचार को कभी न छोड़ें. यह एक छोटा-सा कदम है, लेकिन इससे बीजजनित रोग, शुरुआती कीट और कमजोर अंकुरण से बचाव होता है. जैविक और रासायनिक दोनों तरह के उपचार उपलब्ध हैं, जिनका संतुलित उपयोग करना चाहिए.

पानी का समझदारी से उपयोग करना बेहद जरूरी है. ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीक अपनाने से पानी की बचत होती है और फसल को जरूरत के मुताबिक नमी मिलती है. सीमित पानी में भी सही समय पर सिंचाई करने से अच्छा उत्पादन संभव है.

कीट और रोग नियंत्रण के लिए इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) अपनाना चाहिए. खेत की नियमित निगरानी, फेरोमोन ट्रैप, जैविक उपाय और जरूरत पड़ने पर ही रसायन, यह संतुलन लंबे समय में खेत और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद होता है.

कटाई के बाद भंडारण और मूल्य संवर्धन पर ध्यान देना चाहिए. अनाज को सही नमी पर सुखाकर संग्रहित करना, दाल बनवाना या फल-सब्जियों का प्रसंस्करण करना किसानों की आमदनी बढ़ा सकता है.

महाराष्ट्र के किसानों को क्या नहीं करना चाहिए

किसानों को सबसे बड़ी गलती से बचना चाहिए, और वह है अंधाधुंध रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग. ज्यादा दवा डालने से न तो पैदावार दोगुनी होती है और न ही समस्या खत्म होती है, बल्कि मिट्टी खराब होती है और लागत बढ़ती है.

बिना योजना के एक ही फसल को बार-बार उगाना भी नुकसानदायक है. फसल चक्र न अपनाने से मिट्टी के पोषक तत्व खत्म होते हैं और कीट-रोग स्थायी हो जाते हैं.

बहुत गहरी जुताई और बार-बार जुताई से बचना चाहिए, खासकर रबी मौसम में. इससे मिट्टी की नमी तेजी से उड़ जाती है और सूक्ष्म जीव नष्ट होते हैं. न्यूनतम जुताई अपनाना अधिक लाभदायक है.

कई किसान केवल सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा कर लेते हैं. बिना विशेषज्ञ सलाह के नई दवा, नई तकनीक या महंगी मशीनरी अपनाना जोखिम भरा हो सकता है. हर नई चीज को पहले छोटे स्तर पर आजमाना चाहिए.

गलत समय पर सिंचाई करना भी बड़ी गलती है. जरूरत से ज्यादा पानी देने से जड़ें सड़ सकती हैं, पोषक तत्व बह जाते हैं और रोग बढ़ते हैं.

कटाई के बाद खेत में फसल अवशेष जलाना नहीं चाहिए. इससे मिट्टी की जैविक शक्ति घटती है और पर्यावरण प्रदूषित होता है. अवशेषों को मिट्टी में मिलाना या मल्च के रूप में उपयोग करना बेहतर है.

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