केरल में दक्षिण-पश्चिम मानसून पहुंचने के 72 घंटे में ही 11 राज्यों में इसकी एंट्री हो चुकी है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने मॉनसून के तेजी से आगे बढ़ने का अलर्ट जारी किया है. दक्षिण राज्यों के ज्यादातर हिस्सों से होते हुए मॉनसून मिजोरम, मणिपुर से होते अरुणाचल प्रदेश में पहुंच गया है. वहीं, अल नीनो के लगातार मजबूत होने के संकेतों ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं. इसे कृषि उत्पादन के लिए बढ़ते संकट के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे में किसानों के लिए सरकार ने सलाह जारी की है और कृषि वैज्ञानिकों ने अहम सुझाव दिए हैं.
72 घंटे में 11 राज्यों में पहुंचा मॉनसून
4 जून को केरल के तट से टकराने के 72 घंटे के भीतर मॉनसून 11 राज्यों तक पहुंच गया है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 7 जून के शाम के अपडेट तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पश्चिम मध्य बंगाल की खाड़ी के कुछ और हिस्सों से होते हुए पूरे उत्तर-पूर्वी बंगाल की खाड़ी के कुछ और हिस्सों में पहुंच गया है. इसके साथ ही उत्तर-पश्चिमी बंगाल की खाड़ी के कुछ और हिस्सों, पूरे नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम, त्रिपुरा, असम होते हुए अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ गया है.
अगले 3 दिन में ओडिशा, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में पहुंचेगा
मौसम विभाग ने कहा कि अगले 3-4 दिनों के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून के मध्य अरब सागर के कुछ और हिस्सों से आगे बढ़ते हुए महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना के कुछ हिस्सों में पहुंचकर आंध्र प्रदेश के कुछ और हिस्सों, तमिलनाडु और दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी के शेष हिस्सों में प्रवेश कर चुका है. इसके साथ ही पश्चिम-मध्य और उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी के कुछ और हिस्सों, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कुछ हिस्सों, पूर्वोत्तर राज्यों के शेष हिस्सों और उप हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं.
अगले 7 दिन इन राज्यों में भारी बारिश का रेड अलर्ट
मौसम विभाग ने अगले 7 दिन केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर-पूर्वी भारत में भारी बारिश की चेतावनी दी है. मौसम विभाग ने कहा है कि मॉनसून की वजह से अगले 7 दिनों के दौरान केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तरपूर्वी भारत में अलग-अलग स्थानों पर भारी से बहुत भारी वर्षा (7-20 सेमी) होने की संभावना है. साथ ही 8 से 10 जून के बीच कर्नाटक में अलग-अलग जगहों पर अत्यधिक भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है.
मजबूत होता अल नीनो कृषि क्षेत्र के लिए खतरनाक
मॉनसून मिशन क्लाइमेट फोरकास्ट सिस्टम (MMCFS) का आकलन कहता है अल नीनो स्थिति लगातार मजबूत हो रही है. दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन के दौरान ‘अल-नीनो’ की स्थिति बनने का पहले की अलर्ट जारी किया जा चुका है. इस साल मॉनसून के दौरान औसत से कम बारिश के पूर्वानुमान की वजह भी अल नीनो की मजबूती को बताया गया है. कहा गया है कि जुलाई के आसपास अल नीनो पूरी तरह सक्रिय हो जाएगा. अल नीनो के मजबूत होने पर बारिश कम हो जाएगी और सूखे की स्थिति बनने का खतरा बढ़ जाएगा. इससे खरीफ सीजन की फसलों की बुवाई, उत्पादन के साथ ही पूरे कृषि अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचने की आशंका गहरा गई है.
अल नीनो और सूखे की आशंका को देखते हुए एडवाइजरी
महाराष्ट्र सरकार ने कम बारिश की स्थिति को देखते हुए किसानों को सलाह दी है कि वे खरीफ सीजन की फसलों की बुवाई में जल्दबाजी न करें. कहा है कि 15 जून से पहले मॉनसून की अच्छी और व्यापक बारिश होने की संभावना कम है, इसलिए अधिकारियों ने किसानों को बुवाई का काम जल्दबाजी में शुरू न करने की सलाह दी है. अधिकारियों ने रविवार को बताया कि मौसम का पूर्वानुमान राज्य भर में कम बारिश और मॉनसून के धीरे-धीरे आगे बढ़ने का संकेत दे रहा है. महाराष्ट्र के कृषि और आपदा प्रबंधन विभाग ने कहा कि हालांकि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून दक्षिण कोंकण में पहुंच गया है और 9 जून तक सिंधुदुर्ग और रत्नागिरी जिलों के कुछ हिस्सों में हल्की से भारी बारिश हो सकती है, लेकिन अगले एक हफ्ते तक राज्य भर में बारिश का कुल पैटर्न कमजोर रहने की उम्मीद है.
क्या करें किसान
मौसम और कृषि एक्सपर्ट कहते हैं कि अल नीनो और संभावित सूखे की स्थिति को देखते हुए किसानों को अभी से सावधानी बरतनी चाहिए. खरीफ सीजन में कम बारिश या बारिश में लंबे अंतराल की आशंका होने पर कम अवधि और सूखा झेलने वाली किस्मों का चयन करें. खेत में नमी बचाने के लिए मल्चिंग, मेड़बंदी और वर्षा जल संचयन जैसे उपाय अपनाएं. धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के बजाय बाजरा, ज्वार, अरहर, मूंग और उड़द जैसी कम पानी वाली फसलों पर भी विचार किया जा सकता है.
कृषि विज्ञान केंद्र रामपुर के प्रमुख मयंक राय ने किसान इंडिया को बताया कि अल नीनो का खतरा खेती को बुरी तरह प्रभावित कर सकते है. इससे बचाव के लिए किसान अपनी फसलों की सिंचाई के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी जल-बचत तकनीकों का उपयोग करें तथा मौसम विभाग की सलाह और स्थानीय कृषि वैज्ञानिकों के निर्देशों के अनुसार बुवाई का समय तय करें. साथ ही फसल बीमा और वैकल्पिक चारा व्यवस्था पर भी ध्यान दें, ताकि मौसम की मार से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम किया जा सके.