तमिलनाडु का सलेम साबूदाना बना वैश्विक ब्रांड, कनाडा भेजी गई पहली जीआई-टैग खेप
साबूदाना उद्योग सलेम और आसपास के क्षेत्रों में हजारों किसानों और खासकर जनजातीय समुदायों की आजीविका का आधार है. टैपिओका की खेती से जुड़े किसान लंबे समय से बेहतर बाजार की तलाश में थे. अब जीआई टैग और सीधे निर्यात की व्यवस्था से बिचौलियों की भूमिका घटेगी.
GI tagged Salem sabudana: भारत का पारंपरिक खाद्य उत्पाद अब दुनिया की थाली तक पहुंचने लगा है. तमिलनाडु के सलेम में बनने वाला मशहूर साबूदाना अब कनाडा के बाजार में भी अपनी पहचान बनाएगा. कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानी एपीडा ने सलेम से 0.5 मीट्रिक टन जीआई-टैग वाले साबूदाने की खेप को कनाडा भेजने की अनुमति दे दी है. खास बात यह है कि मार्च 2023 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिलने के बाद यह पहली बार है जब उत्पादक संस्था सागोसर्व ने सीधे विदेश में निर्यात किया है.
सलेम क्यों है खास
तमिलनाडु देश में टैपिओका का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है और सलेम को लंबे समय से साबूदाना और स्टार्च उद्योग का केंद्र माना जाता है. यहां तैयार होने वाला साबूदाना टैपिओका की जड़ों से बनाया जाता है. इसकी गुणवत्ता, सफेदी और दानों की एकरूपता इसे खास बनाती है. देश के कई हिस्सों में यह रोजमर्रा के भोजन और व्रत-उपवास के दौरान प्रमुख रूप से इस्तेमाल होता है.
साल 2023 के मार्च महीने में सलेम साबूदाने को जीआई टैग मिला था. इस टैग से यह प्रमाणित होता है कि यह उत्पाद अपने क्षेत्र की खास पहचान और गुणवत्ता से जुड़ा है. इससे न केवल उत्पाद की साख बढ़ती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी उसकी अलग पहचान बनती है.
सागोसर्व की अहम भूमिका
सलेम साबूदाने को जीआई टैग दिलाने में सागोसर्व नामक संस्था की बड़ी भूमिका रही है. इस संस्था के पास 334 पंजीकृत सदस्य हैं. यह संगठन गुणवत्ता नियंत्रण, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन के काम को व्यवस्थित तरीके से संभालता है. कनाडा के लिए भेजी गई 0.5 मीट्रिक टन की यह खेप सागोसर्व द्वारा सीधे निर्यात की गई पहली आधिकारिक खेप है, जो एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है.
किसानों और स्थानीय समुदाय को फायदा
साबूदाना उद्योग सलेम और आसपास के क्षेत्रों में हजारों किसानों और खासकर जनजातीय समुदायों की आजीविका का आधार है. टैपिओका की खेती से जुड़े किसान लंबे समय से बेहतर बाजार की तलाश में थे. अब जीआई टैग और सीधे निर्यात की व्यवस्था से बिचौलियों की भूमिका घटेगी और किसानों को अपनी फसल का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी. इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.
पारंपरिक बाजार से वैश्विक मंच तक
अब तक सलेम का साबूदाना मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के व्यापारियों को भेजा जाता था. इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, वियतनाम और सिंगापुर जैसे देशों में भी निर्यात होता रहा है, लेकिन वह ज्यादातर व्यापारियों के जरिए होता था. यह पहली बार है जब जीआई अधिकृत संस्था ने सीधे विदेशी खरीदार को उत्पाद भेजा है.
एपीडा ने 18 फरवरी 2026 को सलेम में एक विशेष कार्यक्रम के जरिए इस निर्यात को बढ़ावा दिया. संस्था का उद्देश्य है कि जीआई-टैग वाले भारतीय उत्पादों को सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जाए और मूल्यवर्धित कृषि निर्यात को बढ़ाया जाए.
वहीं कनाडा को भेजी गई यह छोटी खेप आने वाले समय में बड़े अवसरों का रास्ता खोल सकती है. अगर विदेशी बाजार में सलेम साबूदाने को अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है, तो निर्यात का दायरा और बढ़ सकता है. इससे न केवल भारत की पहचान मजबूत होगी बल्कि स्थानीय किसानों और उद्योग को भी नई दिशा मिलेगी.
सलेम का साबूदाना अब सिर्फ देश तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी खास पहचान के साथ दुनिया के बाजार में कदम रख चुका है. यह कदम भारत के पारंपरिक कृषि उत्पादों के लिए एक नई शुरुआत माना जा रहा है.