बंदरगाहों पर फंसा बासमती, व्यापारियों के हजारों करोड़ अटके, किसानों पर भी असर तय

ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के महासचिव अजय भालोटिया ने किसान इंडिया को बताया कि अगर यह स्थिति ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. भुगतान अटकने से न केवल नए ऑर्डर प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि पुराने सौदों को भी पूरा करना मुश्किल हो रहा है.

नई दिल्ली | Updated On: 27 Mar, 2026 | 08:04 AM

Basmati rice export: भारत के कृषि निर्यात क्षेत्र के लिए एक बड़ी चिंता सामने आई है. वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव का सीधा असर अब देश के बासमती चावल कारोबार पर पड़ रहा है. हालात ऐसे बन गए हैं कि न सिर्फ निर्यात प्रभावित हुआ है, बल्कि कारोबारियों के हजारों करोड़ रुपये भी फंस गए हैं. इसका असर धीरे-धीरे किसानों तक पहुंचने की आशंका भी जताई जा रही है.

बंदरगाहों पर अटकी खेप, भुगतान भी रुका

बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, बासमती चावल के व्यापार से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि प्रीमियम 1121 बासमती चावल की बड़ी मात्रा फिलहाल बंदरगाहों पर फंसी हुई है. जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण माल अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पा रहा है.

सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस निर्यात के बदले मिलने वाला भुगतान भी अटक गया है. अनुमान है कि करीब 2,000 करोड़ से लेकर 25,000 करोड़ रुपये तक का भुगतान अभी तक नहीं मिला है. इससे व्यापारियों की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ रहा है और उनका नकदी प्रवाह (कैश फ्लो) प्रभावित हो रहा है.

व्यापारियों के सामने बढ़ती मुश्किलें

ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के महासचिव अजय भालोटिया ने किसान इंडिया को बताया कि अगर यह स्थिति ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. कई छोटे और मध्यम स्तर के निर्यातकों के लिए यह संकट अस्तित्व का सवाल बन सकता है. भुगतान अटकने से न केवल नए ऑर्डर प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि पुराने सौदों को भी पूरा करना मुश्किल हो रहा है. इससे पूरे सप्लाई चेन पर असर पड़ रहा है.

किसानों पर भी पड़ेगा असर

बासमती चावल का निर्यात सीधे किसानों से जुड़ा हुआ है. खासकर हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई किसान इस पर निर्भर हैं. अगर निर्यात लगातार प्रभावित रहता है, तो व्यापारियों की खरीद क्षमता कम हो जाएगी. इसका मतलब यह है कि किसानों को अपनी फसल के अच्छे दाम नहीं मिल पाएंगे. आने वाले समय में अगर यह संकट जारी रहा, तो किसानों की आय पर भी असर पड़ सकता है और खेती का पूरा संतुलन बिगड़ सकता है.

सरकार और विशेषज्ञों की चिंता

इस मुद्दे को लेकर सरकार भी सतर्क हो गई है. हाल ही में वेस्ट एशिया संकट पर एक सर्वदलीय बैठक भी हुई, जिसमें कई वरिष्ठ मंत्रियों और नेताओं ने हिस्सा लिया. विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट सिर्फ बासमती चावल तक सीमित नहीं है, बल्कि कई अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सकता है. एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह तनाव लंबा खिंचता है, तो उर्वरक, हीरा उद्योग, ट्रैवल सेक्टर और एयरलाइंस जैसे कई सेक्टर भी प्रभावित हो सकते हैं.

होर्मुज जलडमरूमध्य बना बड़ी वजह

वेस्ट एशिया में व्यापार और ऊर्जा सप्लाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण रास्ता होर्मुज जलडमरूमध्य है. भारत के लिए भी यह बेहद अहम है, क्योंकि देश की बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और एलएनजी इसी रास्ते से आता है.

रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने कच्चे तेल का करीब 85 फीसदी आयात करता है और एलएनजी की जरूरत का लगभग आधा हिस्सा विदेशों से आता है. इसमें से 40-50 फीसदी तेल और 50-60 फीसदी एलएनजी की सप्लाई इसी मार्ग से होती है. लेकिन 1 मार्च 2026 के बाद से इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही काफी कम हो गई है, जिससे व्यापार और सप्लाई दोनों प्रभावित हुए हैं.

बढ़ती लागत और वैश्विक असर

इस संकट का असर सिर्फ निर्यात तक सीमित नहीं है. अगर कच्चे तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होती है, तो उनकी कीमतें बढ़ सकती हैं. इसका असर पेट्रोलियम, टायर, पेंट, केमिकल और टेक्सटाइल जैसे कई उद्योगों पर पड़ सकता है. ऊर्जा महंगी होने से उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिसका असर आम लोगों तक भी पहुंचेगा.

रोजगार पर भी मंडरा रहा खतरा

वेस्ट एशिया में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों और कारोबारियों पर भी इस संकट का असर पड़ रहा है. व्यापार ठप होने से उनकी आमदनी घट रही है और रोजगार के अवसर भी कम हो रहे हैं. अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है.

Published: 27 Mar, 2026 | 09:00 AM

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