2025 में दाल आयात के आंकड़ों में बड़ा बदलाव, घरेलू कमी के चलते बढ़ी चना और उड़द की खरीद

साल 2025 के दौरान भारत ने कुल 65.69 लाख टन दालों का आयात किया. यह आंकड़ा पिछले वर्ष के 68.75 लाख टन की तुलना में लगभग 4.5 प्रतिशत कम है. पहली नजर में यह गिरावट छोटी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे दालों की अलग-अलग किस्मों में बड़े बदलाव छिपे हैं.

नई दिल्ली | Published: 24 Feb, 2026 | 03:45 PM

Pulses imports: भारत में दालें केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि रोजमर्रा के भोजन का अहम हिस्सा हैं. हर घर की थाली में दाल का होना लगभग तय माना जाता है. बढ़ती आबादी और बदलती खानपान की आदतों के बीच दालों की मांग लगातार बढ़ रही है. हालांकि देश में दालों का उत्पादन होता है, फिर भी कई बार जरूरत को पूरा करने के लिए आयात का सहारा लेना पड़ता है.

साल 2025 के दौरान भारत ने कुल 65.69 लाख टन दालों का आयात किया. यह आंकड़ा पिछले वर्ष के 68.75 लाख टन की तुलना में लगभग 4.5 प्रतिशत कम है. पहली नजर में यह गिरावट छोटी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे दालों की अलग-अलग किस्मों में बड़े बदलाव छिपे हैं. कुछ दालों का आयात तेजी से घटा, तो कुछ की खरीद में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली.

पीली मटर के आयात में तेज गिरावट

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में पीली मटर के आयात में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई. जनवरी से दिसंबर के बीच इसका आयात करीब 56 प्रतिशत घटकर 12.90 लाख टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष यह 29.39 लाख टन था. इस कमी का मुख्य कारण सरकार द्वारा पीली मटर पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाना रहा.

शुल्क बढ़ने से आयात महंगा हो गया, जिससे व्यापारियों ने खरीद घटा दी. फिर भी कनाडा इस श्रेणी में भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना रहा. इसके बाद रूस, लातविया और अर्जेंटीना जैसे देशों से भी कुछ मात्रा में आयात हुआ. लेकिन कुल मिलाकर पीली मटर की आवक में आई गिरावट ने कुल दाल आयात को नीचे खींचा.

चना आयात में जबरदस्त उछाल

जहां पीली मटर में गिरावट दिखी, वहीं चना के आयात में असाधारण बढ़ोतरी दर्ज की गई. 2025 में चना का आयात 301 प्रतिशत बढ़कर 15.81 लाख टन तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष यह केवल 3.94 लाख टन था. यह वृद्धि बताती है कि घरेलू बाजार में चना की मांग ज्यादा रही या उत्पादन अपेक्षा से कम रहा.

ऑस्ट्रेलिया भारत को चना आपूर्ति करने वाला प्रमुख देश रहा. इसके अलावा तंजानिया और म्यांमार से भी चना की खरीद की गई. चना की बढ़ती आवक ने बाजार में आपूर्ति संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई.

उड़द की मांग भी बढ़ी

उड़द, जिसे काली दाल भी कहा जाता है, के आयात में भी 41 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. घरेलू उत्पादन में कमी के कारण व्यापारियों को विदेशों से अधिक खरीद करनी पड़ी. म्यांमार उड़द का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा, जबकि ब्राजील से भी उल्लेखनीय मात्रा में आयात हुआ.

उड़द का उपयोग दक्षिण भारतीय व्यंजनों और दाल आधारित उत्पादों में अधिक होता है, इसलिए इसकी मांग स्थिर बनी रहती है. उत्पादन में थोड़ी भी कमी आयात बढ़ने का कारण बन जाती है.

मसूर और अरहर में हल्की बढ़त

मसूर दाल के आयात में बहुत मामूली वृद्धि दर्ज की गई. 2025 में यह 10.61 लाख टन रहा, जो पिछले वर्ष के लगभग बराबर है. कनाडा और ऑस्ट्रेलिया मसूर के प्रमुख स्रोत रहे. इसी तरह अरहर (तूर) के आयात में भी करीब 5 प्रतिशत की बढ़त देखी गई और यह 13.25 लाख टन तक पहुंच गया. मोजांबिक, म्यांमार और तंजानिया इस श्रेणी में प्रमुख निर्यातक रहे.

अन्य दालों में कमी

दालों की अन्य श्रेणी में आयात लगभग 48 प्रतिशत घटकर 2.42 लाख टन रह गया. यह दर्शाता है कि कुछ विशेष किस्मों की मांग या उपलब्धता में बदलाव आया है.

2025 में दालों के आयात में हल्की गिरावट जरूर दर्ज हुई, लेकिन अलग-अलग दालों में अलग तस्वीर सामने आई. जहां पीली मटर पर शुल्क बढ़ने से आयात घटा, वहीं चना और उड़द की अधिक खरीद ने कुल आंकड़ों को संतुलित किया. यह रुझान दिखाता है कि सरकार की नीतियां, घरेलू उत्पादन और वैश्विक बाजार तीनों मिलकर दाल आयात की दिशा तय करते हैं. आने वाले समय में घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया तो आयात पर निर्भरता और कम हो सकती है.

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