पाम ऑयल की आवक घटी तो हिला खाद्य तेल बाजार, आयात में 11.6 प्रतिशत की बड़ी गिरावट
खाद्य तेल आयात में गिरावट के बीच एक सकारात्मक संकेत रबी फसलों से मिला है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2 जनवरी 2026 तक रबी फसलों का रकबा बढ़कर 99.30 लाख हेक्टेयर हो गया है. पिछले साल इसी समय यह 93.27 लाख हेक्टेयर था.
भारत में खाने के तेल की जरूरत बहुत बड़ी है और इसका बड़ा हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है. लेकिन तेल वर्ष 2025-26 की शुरुआत में ही खाद्य तेल के आयात से जुड़े आंकड़ों ने बाजार की दिशा बदलने के संकेत दे दिए हैं. नवंबर और दिसंबर 2025 के दौरान भारत के खाद्य तेल आयात में 11.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह पाम ऑयल की कम आवक मानी जा रही है, जिसने पूरे खाद्य तेल बाजार को प्रभावित किया है.
नवंबर-दिसंबर में कितना हुआ आयात
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के आंकड़ों के मुताबिक, तेल वर्ष 2025-26 के पहले दो महीनों यानी नवंबर और दिसंबर में भारत ने कुल 25.13 लाख टन खाद्य तेल का आयात किया. जबकि पिछले तेल वर्ष 2024-25 की इसी अवधि में यह आयात 28.43 लाख टन था. साफ है कि एक साल के भीतर खाद्य तेल के आयात में अच्छी-खासी कमी आई है.
पाम ऑयल की आवक में बड़ी गिरावट
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे बदलाव की सबसे बड़ी वजह पाम ऑयल रही. नवंबर-दिसंबर 2025 के दौरान भारत में पाम ऑयल (जिसमें आरबीडी पामोलीन और क्रूड पाम ऑयल शामिल है) का कुल आयात घटकर 11.39 लाख टन रह गया. जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 13.44 लाख टन था. सिर्फ दिसंबर 2025 की बात करें तो पाम ऑयल का आयात नवंबर के 6.32 लाख टन से घटकर 5.07 लाख टन रह गया.
रिफाइंड तेल की जगह क्रूड तेल पर जोर
इस बार आयात के पैटर्न में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है. SEA के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता के अनुसार, नवंबर-दिसंबर 2025 में रिफाइंड तेल का हिस्सा कुल खाद्य तेल आयात का सिर्फ 0.14 प्रतिशत रह गया. जबकि पिछले तेल वर्ष की इसी अवधि में यह 18 प्रतिशत था. इसका मतलब है कि रिफाइंड तेल का आयात लगभग खत्म हो गया है.
इसके उलट क्रूड खाद्य तेल का आयात तेजी से बढ़ा है. नवंबर-दिसंबर 2025 में क्रूड खाद्य तेल का हिस्सा बढ़कर 99.86 प्रतिशत हो गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 82 प्रतिशत था. इन दो महीनों में भारत ने सिर्फ 3,500 टन रिफाइंड पामोलीन आयात किया, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह मात्रा 5.17 लाख टन थी. वहीं क्रूड खाद्य तेल का आयात बढ़कर 25.09 लाख टन हो गया, जो पिछले साल 23.26 लाख टन था.
सोयाबीन तेल में उतार-चढ़ाव
सोयाबीन तेल के आयात में कुल मिलाकर ज्यादा बदलाव नहीं दिखा, लेकिन महीनेवार आंकड़ों में फर्क जरूर आया. तेल वर्ष 2025-26 के पहले दो महीनों में भारत ने 8.75 लाख टन सोयाबीन तेल आयात किया, जबकि पिछले साल यह 8.80 लाख टन था. हालांकि दिसंबर 2025 में सोयाबीन तेल का आयात बढ़कर 5.05 लाख टन हो गया, जो नवंबर में 3.71 लाख टन था. इससे साफ है कि पाम ऑयल की कमी को कुछ हद तक सोयाबीन तेल से पूरा किया गया.
सूरजमुखी तेल का आयात भी घटा
सूरजमुखी तेल के आयात में भी गिरावट दर्ज की गई है. नवंबर-दिसंबर 2025 के दौरान भारत ने 4.92 लाख टन सूरजमुखी तेल आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 6.17 लाख टन था. हालांकि यहां भी दिसंबर में स्थिति बदली और सूरजमुखी तेल का आयात नवंबर के 1.43 लाख टन से बढ़कर दिसंबर में 3.50 लाख टन हो गया.
किन देशों से आया तेल
देशवार आंकड़ों पर नजर डालें तो नवंबर-दिसंबर 2025 में मलेशिया ने भारत को 4.95 लाख टन क्रूड पाम ऑयल भेजा. इसके बाद इंडोनेशिया से 3.84 लाख टन क्रूड पाम ऑयल और 3,500 टन आरबीडी पामोलीन आया. सोयाबीन तेल के मामले में अर्जेंटीना सबसे आगे रहा, जहां से 5.92 लाख टन क्रूड सोयाबीन डीगम्ड ऑयल भारत आया. इसके अलावा ब्राजील से 98,562 टन और चीन से 1.05 लाख टन सोयाबीन तेल का आयात हुआ.
सूरजमुखी तेल की बात करें तो रूस ने 2.66 लाख टन क्रूड सूरजमुखी तेल भारत भेजा. इसके बाद अर्जेंटीना से 84,863 टन और यूक्रेन से 1.07 लाख टन तेल आया.
रबी की बढ़ी बुवाई से राहत की उम्मीद
खाद्य तेल आयात में गिरावट के बीच एक सकारात्मक संकेत रबी फसलों से मिला है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2 जनवरी 2026 तक रबी फसलों का रकबा बढ़कर 99.30 लाख हेक्टेयर हो गया है. पिछले साल इसी समय यह 93.27 लाख हेक्टेयर था. खास तौर पर सरसों और रेपसीड की बुवाई 89.36 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है, जो पिछले साल 86.57 लाख हेक्टेयर थी.
बीवी मेहता के अनुसार दिसंबर 2025 के दूसरे पखवाड़े में बारिश नहीं हुई और तापमान फसलों के लिए अनुकूल रहा, जिससे फसल की बढ़वार सामान्य बनी हुई है.
इन तमाम आंकड़ों से साफ है कि खाद्य तेल आयात में आई गिरावट का मुख्य कारण पाम ऑयल की कम आवक है. अगर घरेलू स्तर पर सरसों जैसी तिलहनी फसलों का उत्पादन अच्छा रहता है, तो आने वाले समय में भारत की आयात पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है. हालांकि वैश्विक बाजार और कीमतों पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा, क्योंकि इन्हीं पर आगे के दाम और उपलब्धता निर्भर करेगी.