यूरोपीय सेब की एंट्री से हिला कश्मीर का सेब कारोबार… किसानों के लिए फायदे कम, चिंता ज्यादा
जम्मू-कश्मीर देश के कुल सेब उत्पादन का 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा देता है. हर साल यहां करीब 20 से 22 लाख टन सेब का उत्पादन होता है, जिससे लगभग 12 हजार करोड़ रुपये का कारोबार होता है. इस पूरी व्यवस्था से सीधे और परोक्ष रूप से सात लाख से ज्यादा परिवार जुड़े हुए हैं. सेब की खेती यहां सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ है.
India EU trade deal: भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते की चर्चा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे कश्मीर के सेब किसानों की बेचैनी भी बढ़ती जा रही है. घाटी में हजारों परिवारों की रोजी-रोटी सेब की खेती पर निर्भर है. ऐसे में किसानों को आशंका है कि अगर यूरोप से सस्ते सेब भारतीय बाजार में आने लगे, तो स्थानीय सेब की कीमतों पर सीधा असर पड़ेगा और उनकी मेहनत का सही दाम मिलना मुश्किल हो जाएगा.
प्रस्तावित समझौते में क्या बदलने वाला है
प्रस्तावित ढांचे के तहत यूरोपीय संघ से आने वाले सेबों को भारत में न्यूनतम आयात मूल्य 80 रुपये प्रति किलो पर अनुमति दी जाएगी और इस पर 20 प्रतिशत आयात शुल्क लगेगा. अभी तक यूरोप से आयात होने वाले सेबों पर करीब 50 प्रतिशत तक शुल्क लगता रहा है. शुरुआती दौर में आयात की सीमा 50 हजार टन तय की गई है, जिसे आने वाले दस वर्षों में बढ़ाकर एक लाख टन तक किया जा सकता है. कागजों पर यह व्यवस्था संतुलित दिखती है, लेकिन कश्मीर के किसानों का कहना है कि जमीन पर इसका असर उनके पक्ष में नहीं होगा.
स्थानीय सेब की कीमत और मुकाबले की चुनौती
कश्मीर में उगने वाले अलग-अलग किस्मों के सेब आमतौर पर 125 से 135 रुपये प्रति किलो के बीच बिकते हैं. अच्छे मौसम और बाजार की मांग होने पर कीमत इससे भी ऊपर चली जाती है. किसानों और व्यापारियों का कहना है कि यूरोप से आने वाले सेब भारतीय मंडियों में करीब 95-100 रुपये प्रति किलो की दर से उतर सकते हैं. इतनी कम कीमत पर आयात होने वाले सेब स्थानीय सेब के लिए सीधी चुनौती बन जाएंगे. नतीजा यह हो सकता है कि व्यापारी सस्ता आयातित सेब खरीदने लगें और कश्मीरी सेब की मांग घट जाए.
कश्मीर की अर्थव्यवस्था में सेब की अहम भूमिका
जम्मू-कश्मीर देश के कुल सेब उत्पादन का 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा देता है. हर साल यहां करीब 20 से 22 लाख टन सेब का उत्पादन होता है, जिससे लगभग 12 हजार करोड़ रुपये का कारोबार होता है. इस पूरी व्यवस्था से सीधे और परोक्ष रूप से सात लाख से ज्यादा परिवार जुड़े हुए हैं. सेब की खेती यहां सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ है. किसानों का कहना है कि अगर कीमतों में गिरावट आई, तो इसका असर सिर्फ बागवानों पर नहीं बल्कि पैकिंग, ढुलाई, मंडी और कोल्ड स्टोरेज से जुड़े लोगों पर भी पड़ेगा.
विदेशी खेती बनाम स्थानीय हालात
किसान यह भी तर्क देते हैं कि यूरोपीय देशों में सेब की खेती अत्यधिक मशीनीकृत है. वहां बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, श्रम लागत कम होती है और आधुनिक तकनीक के कारण उत्पादकता ज्यादा रहती है. इसके उलट कश्मीर में सेब की खेती आज भी काफी हद तक पारंपरिक तरीकों पर निर्भर है. मौसम की मार, परिवहन की दिक्कतें और बढ़ती लागत के बीच किसानों के लिए लागत निकालना ही बड़ी चुनौती बन जाता है. ऐसे में सस्ते आयात से प्रतिस्पर्धा करना उनके लिए और कठिन हो जाएगा.
पहले से बढ़ते आयात ने बढ़ाई परेशानी
किसानों की चिंता यूं ही नहीं है. बीते कुछ वर्षों में अफगानिस्तान, ईरान और तुर्किये जैसे देशों से सेब का आयात तेजी से बढ़ा है. सिर्फ एक साल में ही करीब पांच लाख टन सेब भारत आया, जिसमें ईरान और तुर्किये का बड़ा हिस्सा रहा. इन आयातों ने पहले ही घरेलू बाजार में दबाव बना दिया है. अब अगर यूरोप से भी बड़ी मात्रा में सेब आने लगे, तो हालात और बिगड़ सकते हैं.
किसानों की मांग और उम्मीदें
कश्मीर के सेब उत्पादक चाहते हैं कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में उनकी आजीविका को प्राथमिकता दी जाए. उनका कहना है कि सरकार को आयात नीति बनाते समय घरेलू किसानों के हितों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए. बेहतर भंडारण, प्रसंस्करण, निर्यात प्रोत्साहन और मूल्य स्थिरीकरण जैसे उपाय किए जाएं, ताकि किसान वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकें. किसानों को उम्मीद है कि उनकी आवाज सुनी जाएगी और सेब की खेती को कमजोर होने से बचाया जाएगा.