सरकारी गोदामों में अनाज का लगा अंबार, गेहूं-चावल का स्टॉक जरूरत से तीन गुना पहुंचा

सरकार हर साल गेहूं और चावल का एक निश्चित भंडार रखती है, जिसे “बफर स्टॉक” कहा जाता है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जरूरत पड़ने पर गरीबों और राशन कार्ड धारकों को पर्याप्त मात्रा में अनाज मिल सके. इसके अलावा प्राकृतिक आपदा, सूखा या बाजार में कीमतें बढ़ने जैसी परिस्थितियों में भी यही भंडार काम आता है.

नई दिल्ली | Published: 7 May, 2026 | 07:34 AM

देश में इस समय गेहूं और चावल का सरकारी भंडार काफी मजबूत स्थिति में पहुंच गया है. भारतीय खाद्य निगम यानी भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में रखा खाद्यान्न स्टॉक अब तय बफर सीमा से लगभग तीन गुना ज्यादा हो गया है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1 अप्रैल 2026 तक गेहूं और चावल का कुल सरकारी भंडार 604.02 लाख टन पहुंच गया है. जबकि इस समय सरकार को केवल 210.40 लाख टन खाद्यान्न स्टॉक रखने की जरूरत थी.

यह बढ़ता भंडार एक तरफ खाद्य सुरक्षा के लिहाज से राहत की खबर माना जा रहा है, लेकिन दूसरी ओर किसानों के लिए चिंता भी बढ़ा रहा है क्योंकि कई फसलों के बाजार भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP से नीचे चल रहे हैं.

चावल का स्टॉक जरूरत से काफी ज्यादा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस समय चावल का कुल स्टॉक 386.10 लाख टन है. जबकि सरकार के तय बफर मानक के अनुसार केवल 135.80 लाख टन चावल रखना जरूरी था. इसका मतलब है कि सरकार के पास जरूरत से कहीं ज्यादा चावल मौजूद है. सरकार इन भंडारों का इस्तेमाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और दूसरी खाद्य योजनाओं में करती है.

गेहूं का भंडार भी मजबूत स्थिति में

चावल के साथ-साथ गेहूं का सरकारी भंडार भी काफी ज्यादा है. 1 अप्रैल तक सरकारी गोदामों में गेहूं का स्टॉक 217.92 लाख टन दर्ज किया गया, जबकि तय बफर मानक केवल 74.60 लाख टन था. विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छी खरीद और बेहतर उत्पादन की वजह से सरकारी भंडार लगातार बढ़ रहा है.

क्यों रखा जाता है बफर स्टॉक?

सरकार हर साल गेहूं और चावल का एक निश्चित भंडार रखती है, जिसे “बफर स्टॉक” कहा जाता है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जरूरत पड़ने पर गरीबों और राशन कार्ड धारकों को पर्याप्त मात्रा में अनाज मिल सके. इसके अलावा प्राकृतिक आपदा, सूखा या बाजार में कीमतें बढ़ने जैसी परिस्थितियों में भी यही भंडार काम आता है.

रबी सीजन की खरीद अभी जारी

इस समय 2026 रबी सीजन की गेहूं और चावल खरीद प्रक्रिया जारी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 334.17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोए गए गेहूं में से लगभग 97 प्रतिशत की कटाई पूरी हो चुकी है. इसके साथ ही दालों की कटाई भी लगभग समाप्त हो गई है.

धान की कटाई इन राज्यों में जारी

धान की कटाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. आंकड़ों के अनुसार करीब 59.32 प्रतिशत धान की कटाई पूरी हो चुकी है. तमिलनाडु, केरल, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में अभी भी धान की कटाई का काम चल रहा है.

MSP से नीचे बिक रही कई फसलें

एक तरफ सरकारी गोदामों में अनाज का बड़ा भंडार जमा हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को बाजार में सही कीमत नहीं मिल पा रही है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार कई रबी फसलों के थोक भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चल रहे हैं.

गेहूं का भाव MSP से नीचे

इस समय बाजार में गेहूं का औसत थोक भाव 2,530 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है. जबकि सरकार ने गेहूं का MSP 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है. यानी बाजार में गेहूं MSP से करीब 2.13 प्रतिशत नीचे बिक रहा है.

धान और मक्का की कीमतों में भी गिरावट

धान की कीमतों में भी गिरावट दर्ज की गई है. पिछले साल की तुलना में धान का भाव 3.17 प्रतिशत घटकर 2,294 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है. वहीं मक्का की स्थिति और ज्यादा खराब बताई जा रही है. मक्का का बाजार भाव 23.71 प्रतिशत गिरकर 1,831 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया है, जबकि इसका MSP 2,400 रुपये प्रति क्विंटल तय है.

दालें और तिलहन भी MSP से नीचे

अरहर, मूंग, बाजरा और सूरजमुखी जैसी फसलें भी MSP से नीचे बिक रही हैं. इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है क्योंकि लागत बढ़ने के बावजूद बाजार में उन्हें सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं.

किसानों के सामने बढ़ी चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लागत और बाजार भाव के बीच बढ़ता अंतर है. डीजल, खाद, बीज और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बाजार में फसलों की कीमत MSP से नीचे रहने के कारण किसानों का मुनाफा कम हो रहा है.

सरकार के सामने भी बड़ी चुनौती

सरकार के लिए भी यह स्थिति आसान नहीं है. एक तरफ गोदामों में रिकॉर्ड मात्रा में अनाज जमा हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को बेहतर कीमत दिलाने का दबाव बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को खरीद व्यवस्था मजबूत करने और बाजार में संतुलन बनाए रखने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं.

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