बकरी पालकों के लिए अलर्ट, आहार और टीकाकरण की छोटी चूक से हो सकता है बड़ा नुकसान

बकरी पालन में सिर्फ संख्या बढ़ाना ही मुनाफे की गारंटी नहीं है. सही नस्ल, पौष्टिक आहार, समय पर टीकाकरण और साफ बाड़ा ही बेहतर उत्पादन की कुंजी है. छोटी लापरवाही से मेमनों की मौत और नुकसान बढ़ सकता है. सही प्रबंधन अपनाकर पशुपालक कम लागत में ज्यादा कमाई और स्वस्थ पशु पा सकते हैं.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 3 Apr, 2026 | 11:52 AM

Goat Farming: गांवों में बकरी पालन आज सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि कम लागत में अच्छी कमाई का भरोसेमंद जरिया बन चुका है. यही वजह है कि छोटे किसान और पशुपालक तेजी से इस काम की ओर बढ़ रहे हैं. लेकिन कई बार लोग यह सोचकर ज्यादा बकरियां खरीद लेते हैं कि संख्या बढ़ेगी तो मुनाफा भी बढ़ जाएगा. असल में फायदा संख्या से नहीं, सही देखभाल, सही नस्ल, अच्छा आहार और समय पर इलाज से मिलता है. केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. वाई के सोनी के अनुसार, अगर बकरी पालन में कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखा जाए तो उत्पादन तेजी से बढ़ सकता है, बच्चों की मौत कम हो सकती है और कमाई दोगुनी तक पहुंच सकती है.

सही नस्ल का चुनाव ही मुनाफे की पहली सीढ़ी

डॉ. वाई के सोनी के अनुसार, बकरी पालन  में सबसे बड़ी गलती गलत नस्ल चुनना मानी जाती है. कई पशुपालक बिना मौसम और इलाके को समझे किसी भी नस्ल की बकरी खरीद लेते हैं, जिससे बीमारी, कमजोर वृद्धि और कम उत्पादन जैसी परेशानी सामने आती है. विशेषज्ञों के मुताबिक स्थानीय जलवायु में पली-बढ़ी नस्लें ज्यादा मजबूत होती हैं. ऐसी बकरियां मौसम को जल्दी अपनाती हैं, कम बीमार पड़ती हैं और उनकी जीवित रहने की क्षमता भी बेहतर रहती है. अगर प्रजनन के लिए अच्छे बकरे का चयन किया जाए तो बच्चों की गुणवत्ता भी बेहतर मिलती है. साथ ही एक ही बकरे का लंबे समय तक उपयोग करने से बचना चाहिए. समय-समय पर बदलाव करने से नस्ल की गुणवत्ता बनी रहती है. यही तरीका आगे चलकर दूध, मांस और बच्चों की संख्या बढ़ाने में मदद करता है.

संतुलित आहार से बढ़ेगा वजन और उत्पादन

अक्सर पशुपालक बकरियों को सिर्फ चराई  पर छोड़ देते हैं, जबकि यही सबसे बड़ी चूक साबित हो सकती है. केवल घास या पत्तियों पर निर्भर रहने से बकरियों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता. बेहतर उत्पादन के लिए दाना मिश्रण बहुत जरूरी है. इसमें मक्का, चोकर, खली और खनिज लवण जैसी चीजें शामिल करनी चाहिए. प्रजनन के समय फ्लशिंग डाइट देना बेहद फायदेमंद माना जाता है. इससे बकरी जल्दी हीट में आती है और गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है. वहीं नवजात मेमनों को जन्म के दो घंटे के भीतर खीस जरूर पिलानी चाहिए. यह उनके लिए पहली प्राकृतिक दवा की तरह काम करती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनाती है. सही आहार से बकरियों का वजन तेजी से बढ़ता है, दूध देने वाली बकरियों का उत्पादन सुधरता है और बच्चों की बढ़वार भी बेहतर होती है. कमाई बढ़ाने के लिए यह सबसे आसान और असरदार तरीका माना जाता है.

टीकाकरण और कृमिनाशन में लापरवाही पड़ सकती है भारी

बकरी पालन में सबसे ज्यादा नुकसान बीमारियों से होता है. कई बार पशुपालक शुरुआती टीका तो लगवा देते हैं, लेकिन बूस्टर डोज को नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही बाद में बड़ी बीमारी और मौत का कारण बन जाती है. विशेषज्ञों का कहना है कि समय-समय पर टीकाकरण और कृमिनाशन जरूरी है.

पेट में कीड़े होने से बकरियों का वजन  रुक जाता है, भूख कम हो जाती है और शरीर कमजोर पड़ने लगता है. इसी तरह संक्रामक रोगों से बचाने के लिए तय समय पर वैक्सीन लगवाना जरूरी है. बूस्टर डोज छूटने पर पूरी सुरक्षा नहीं बन पाती. कई बार इससे अचानक मौत तक हो जाती है, जिससे पशुपालक को सीधा आर्थिक नुकसान होता है. एक और जरूरी बात यह है कि खुद से दवा देने से बचना चाहिए. बिना सलाह एंटीबायोटिक या गलत दवा देने से बीमारी बढ़ सकती है और दवा असर करना भी बंद कर सकती है.

साफ-सुथरा बाड़ा और सही प्रबंधन से घटेगी मृत्युदर

बकरियों का रहने का स्थान उनकी सेहत पर सीधा असर डालता है. अगर बाड़ा गीला, गंदा या बंद होगा तो संक्रमण तेजी से फैलता है. इसलिए बकरियों के लिए साफ, सूखा और हवादार बाड़ा होना चाहिए. जमीन से थोड़ा ऊंचा बना बाड़ा और भी बेहतर माना जाता है, क्योंकि इससे नमी कम रहती है और बीमारी का खतरा घटता है.

गर्मियों में हीट स्ट्रेस  और सर्दियों में ठंड से बचाव भी बहुत जरूरी है. छोटे मेमनों को खास देखभाल की जरूरत होती है. वहीं तीन महीने की उम्र से पहले नर मेमनों का बधियाकरण कराने से उनका वजन तेजी से बढ़ता है और वे शांत रहते हैं. बिना बधिया किए गए बकरे अपनी ऊर्जा लड़ाई और भागदौड़ में खर्च करते हैं, जबकि बधिया पशु उसी ऊर्जा को शरीर बढ़ाने में लगाते हैं.

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