130 देशों में पहुंचा भारतीय सीफूड, अमेरिका सबसे बड़ा बाजार… उत्पादन 197 लाख टन के पार
भारत अब सिर्फ कुछ देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि करीब 130 देशों में अपने सीफूड उत्पाद भेज रहा है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ग्राहक है, जो कुल निर्यात का 36.42 फीसदी हिस्सा लेता है. इसके अलावा चीन, यूरोपियन यूनियन, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व जैसे बड़े बाजार भी भारत के लिए अहम हैं.
भारत का मत्स्य पालन और सीफूड सेक्टर आज केवल एक पारंपरिक काम नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बन चुका है. यह क्षेत्र लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा है और साथ ही देश को बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा भी दिला रहा है. पिछले कुछ वर्षों में इसमें जो बदलाव आया है, उसने भारत को दुनिया के प्रमुख सीफूड निर्यातकों में शामिल कर दिया है.
सरकार के निवेश से बदली तस्वीर
PIB की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने साल 2015 से अब तक इस क्षेत्र में करीब 39,272 करोड़ रुपये का बड़ा निवेश किया है. इसका सीधा असर यह हुआ कि मछली पालन अब ज्यादा संगठित और आधुनिक हो गया है. आज लगभग 3 करोड़ मछुआरे और मछली पालक सीधे इस क्षेत्र से जुड़े हैं, जबकि इससे जुड़े अन्य कामों में यह संख्या लगभग दोगुनी हो जाती है.
यह सिर्फ रोजगार ही नहीं दे रहा, बल्कि ग्रामीण इलाकों में आर्थिक मजबूती भी ला रहा है. छोटे किसानों और मछुआरों के लिए यह एक स्थायी आय का जरिया बनता जा रहा है.
उत्पादन में जबरदस्त बढ़ोतरी
अगर उत्पादन के आंकड़ों को देखें, तो यह क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है. वर्ष 2019-20 में जहां देश में 141.64 लाख टन मछली का उत्पादन हुआ था, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर 197.75 लाख टन पहुंच गया.
हर साल औसतन 7 फीसदी की दर से बढ़ता यह उत्पादन दिखाता है कि भारत अब इस क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रहा है. यही कारण है कि भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एक्वाकल्चर उत्पादक देश बन चुका है और वैश्विक उत्पादन में करीब 8 फीसदी हिस्सेदारी रखता है.
निर्यात में दोगुनी से ज्यादा छलांग
भारत के सीफूड निर्यात ने भी पिछले एक दशक में शानदार प्रदर्शन किया है. 2013-14 में जहां निर्यात का आंकड़ा 30,213 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 62,408 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इसमें सबसे बड़ा योगदान झींगा यानी श्रिम्प का है, जिसकी अकेले निर्यात वैल्यू 43,334 करोड़ रुपये रही. यह बताता है कि भारत का श्रिम्प बाजार दुनिया में कितना मजबूत हो चुका है.
दुनिया के बाजारों में भारत की पकड़
भारत अब सिर्फ कुछ देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि करीब 130 देशों में अपने सीफूड उत्पाद भेज रहा है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ग्राहक है, जो कुल निर्यात का 36.42 फीसदी हिस्सा लेता है. इसके अलावा चीन, यूरोपियन यूनियन, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व जैसे बड़े बाजार भी भारत के लिए अहम हैं. यह विविधता भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत बनाती है.
उत्पादों में बढ़ी विविधता
पहले जहां निर्यात मुख्य रूप से कुछ सीमित उत्पादों तक था, अब इसमें काफी विविधता आ गई है. आज भारत से फ्रोजन श्रिम्प, फ्रोजन मछली, स्क्विड, सूखे उत्पाद और कई वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स भेजे जा रहे हैं.
सबसे खास बात यह है कि वैल्यू एडेड उत्पादों का हिस्सा भी तेजी से बढ़ा है. पहले यह केवल 2.5 फीसदी था, जो अब बढ़कर 11 फीसदी हो गया है. इससे निर्यात की गुणवत्ता और कमाई दोनों में सुधार हुआ है.
आधुनिक तकनीक और नई योजनाओं का असर
सरकार की प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) ने इस क्षेत्र को नई दिशा दी है. इसके तहत बेहतर बीज, नई तकनीक, रोग नियंत्रण और ट्रेसबिलिटी सिस्टम पर काम किया जा रहा है. साथ ही, कोल्ड स्टोरेज, मछली बंदरगाह और सप्लाई चेन को भी मजबूत किया जा रहा है, ताकि उत्पाद खराब न हों और समय पर बाजार तक पहुंचें.
इसके अलावा ट्यूना, सीबास, टिलापिया, पंपानो और समुद्री शैवाल जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे भारत प्रीमियम बाजारों में भी अपनी पकड़ बना सके.
अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार काम
वैश्विक बाजार में टिके रहने के लिए भारत अब अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन भी तेजी से कर रहा है. अमेरिका जैसे बड़े बाजार के नियमों के अनुसार मछली पकड़ने और प्रोसेसिंग में बदलाव किए जा रहे हैं. इसके साथ ही ट्रेसबिलिटी सिस्टम को मजबूत किया गया है, ताकि हर उत्पाद की पूरी जानकारी उपलब्ध हो सके और गुणवत्ता बनी रहे.
कारोबार हुआ आसान
सरकार ने कारोबार को आसान बनाने के लिए कई प्रक्रियाओं को डिजिटल किया है. अब जरूरी मंजूरियां पहले के मुकाबले काफी जल्दी मिल जाती हैं. इससे व्यापारियों का समय और पैसा दोनों बचता है और निर्यात को बढ़ावा मिलता है.
आने वाले समय में भारत केवल मात्रा पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता और वैल्यू एडेड उत्पादों पर ज्यादा ध्यान देगा. नए बाजारों में विस्तार, बेहतर प्रोसेसिंग और मजबूत सप्लाई चेन इस दिशा में अहम भूमिका निभाएंगे.