मुश्किल दौर से गुजर रहा भारतीय चाय सेक्टर… महंगी खाद, बिजली और श्रमिकों की कमी ने बढ़ाई चिंता

India tea industry crisis: पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में ही चाय से जुड़ा पूरा इकोसिस्टम करीब 32 लाख लोगों की आजीविका का आधार है. लेकिन आज यही उद्योग गंभीर आर्थिक दबाव में है. बढ़ती लागत, स्थिर कीमतें, मजदूरों की कमी और बदलते मौसम ने चाय बागानों की कमर तोड़ दी है.

नई दिल्ली | Published: 16 Feb, 2026 | 07:35 AM

India tea industry crisis: भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है और यह उद्योग सीधे तौर पर 10 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है. पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में ही चाय से जुड़ा पूरा इकोसिस्टम करीब 32 लाख लोगों की आजीविका का आधार है. लेकिन आज यही उद्योग गंभीर आर्थिक दबाव में है. बढ़ती लागत, स्थिर कीमतें, मजदूरों की कमी और बदलते मौसम ने चाय बागानों की कमर तोड़ दी है. ऐसे में उद्योग से जुड़े प्रतिनिधि सरकार से ठोस नीति समर्थन और संरचनात्मक सुधार की मांग कर रहे हैं.

लागत बढ़ी, दाम नहीं बढ़े

इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार, टी एसोसिएशन ऑफ इंडिया की नॉर्थ बंगाल शाखा के चेयरमैन उत्तम चक्रवर्ती का कहना है कि कई चाय बागानों को लागत से कम कीमत पर चाय बेचनी पड़ रही है. इससे कर्ज बढ़ रहा है और आर्थिक संकट गहराता जा रहा है. उनका साफ कहना है कि अगर उच्च गुणवत्ता वाली चाय का उत्पादन कर उचित दाम नहीं मिले, तो उद्योग का टिके रहना मुश्किल है.

चाय उत्पादन में मजदूरी सबसे बड़ा खर्च है. कुल उत्पादन लागत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा मजदूरी पर खर्च होता है. ऐसे में मजदूरी दरों में बढ़ोतरी और महंगाई का सीधा असर उद्योग पर पड़ता है. उर्वरक, कोयला, कीटनाशक और बिजली की कीमतों में भी लगातार वृद्धि हुई है. केवल बिजली पर ही तैयार चाय की प्रति किलो लागत लगभग 10 से 11 रुपये तक पहुंच रही है.

कीमत और लागत के बीच बढ़ता अंतर

एसोसिएशन की अध्यक्ष शैलजा मेहता ने कहा कि लंबे समय से उत्पादन लागत और बाजार में मिलने वाली कीमत के बीच संतुलन नहीं बन पा रहा है. उनका मानना है कि जब तक लागत और कीमत के बीच सामंजस्य नहीं होगा, तब तक उद्योग को स्थिरता नहीं मिल सकती. उन्होंने न्यूनतम टिकाऊ मूल्य (Minimum Sustainable Price) व्यवस्था लागू करने की मांग की, ताकि उत्पादकों को कम से कम इतना दाम मिल सके जिससे उनका खर्च निकल सके और उन्हें उचित लाभ भी मिले.

मजदूरों की कमी बनी बड़ी चुनौती

चाय उद्योग को केवल आर्थिक दबाव ही नहीं, बल्कि श्रमिक संकट का भी सामना करना पड़ रहा है. कई बागानों में पीक सीजन के दौरान 25 से 50 प्रतिशत तक मजदूर अनुपस्थित रहते हैं. ऐसे में बाहर से मजदूर बुलाने पड़ते हैं, जिनकी लागत ज्यादा होती है. इससे उत्पादन खर्च और बढ़ जाता है.

मौसम का असर भी चिंता का कारण

जलवायु परिवर्तन ने भी चाय उद्योग की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. अनियमित बारिश, बढ़ता तापमान और कीटों का प्रकोप उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर रहे हैं. मौसम की अनिश्चितता के कारण पैदावार में गिरावट आ रही है और कई बार चाय की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता है.

सरकार से क्या मांग

उद्योग से जुड़े लोगों ने टी बोर्ड इंडिया से लंबित सब्सिडी जल्द जारी करने की मांग की है. साथ ही कार्यशील पूंजी ऋण पर ब्याज में राहत, विशेष चाय उत्पादन के लिए प्रोत्साहन और मशीनरी अपग्रेड के लिए वित्तीय सहायता की भी मांग की गई है.

चाय उत्पादकों का कहना है कि चाय की खेती मूल रूप से कृषि गतिविधि है, इसलिए उन्हें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की योजनाओं का लाभ भी मिलना चाहिए. इसके अलावा बिजली दरों में कमी और सोलर पावर नीति के तेज क्रियान्वयन की भी मांग की गई है, ताकि ऊर्जा लागत कम की जा सके.

सस्ते आयात से बढ़ी चिंता

उद्योग प्रतिनिधियों ने सस्ती आयातित चाय और ब्लेंडेड चाय को भारतीय मूल का बताकर बेचने की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई है. उनका कहना है कि इससे घरेलू उत्पादकों को नुकसान हो रहा है और निर्यात बाजार में भारत की साख प्रभावित हो सकती है.

चाय उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण रोजगार का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यदि समय रहते नीतिगत सहयोग नहीं मिला, तो यह क्षेत्र और गंभीर संकट में फंस सकता है. उद्योग जगत का मानना है कि सही मूल्य समर्थन, लागत नियंत्रण और संरचनात्मक सुधारों के जरिए ही चाय उद्योग को टिकाऊ बनाया जा सकता है.

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