ठंड ने बिगाड़ी चाय उद्योग की सेहत, 15 फीसदी तक घटा देश का कुल उत्पादन, जानें आंकड़े

India tea production: उत्तर भारत के असम और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख चाय उत्पादक राज्यों में सर्दियों के दौरान चाय के पौधे सामान्य तौर पर विश्राम की अवस्था में रहते हैं. इसे डॉर्मेंसी पीरियड कहा जाता है. इसलिए जनवरी में वहां उत्पादन बहुत कम रहता है.

नई दिल्ली | Published: 3 Mar, 2026 | 06:55 AM

India tea production: भारत में चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की आदत और लाखों किसानों की आजीविका का आधार है. लेकिन इस साल की शुरुआत चाय उद्योग के लिए कुछ खास अच्छी नहीं रही. जनवरी महीने में देशभर में चाय उत्पादन में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. खासकर तमिलनाडु में पाले और लंबे समय तक चली ठंड की वजह से उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ, जिसका असर पूरे देश के आंकड़ों पर दिखा.

जनवरी में 15 प्रतिशत घटा देश का चाय उत्पादन

चाय बोर्ड के ताजा आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 में देश का कुल चाय उत्पादन करीब 14.5 मिलियन किलोग्राम रहा. पिछले साल इसी महीने यह आंकड़ा लगभग 17.15 मिलियन किलोग्राम था. यानी एक साल में करीब 15 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. चाय जैसे बड़े उद्योग में इतनी गिरावट चिंता की बात मानी जा रही है.

विशेषज्ञों का कहना है कि जनवरी आमतौर पर उत्पादन का हल्का महीना होता है, लेकिन इस बार मौसम ने हालात और मुश्किल बना दिए. दक्षिण भारत के बागानों में ठंड का असर ज्यादा देखने को मिला.

तमिलनाडु में पाले ने बिगाड़ी तस्वीर

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, तमिलनाडु, खासकर नीलगिरि क्षेत्र, दक्षिण भारत का बड़ा चाय उत्पादक इलाका है. इस साल जनवरी में यहां कड़ाके की ठंड और पाले ने चाय की कोमल पत्तियों को नुकसान पहुंचाया. परिणामस्वरूप राज्य का उत्पादन करीब 35 प्रतिशत तक गिर गया.

जहां पिछले साल जनवरी में तमिलनाडु में करीब 11.94 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन हुआ था, वहीं इस साल यह घटकर लगभग 7.70 मिलियन किलोग्राम रह गया. पाले की वजह से कई बागानों में नई कोंपलें जल गईं और पौधों की बढ़त रुक गई.

बागान मालिकों का कहना है कि लगातार कई दिनों तक सुबह-सुबह पाला पड़ने से उत्पादन चक्र प्रभावित हुआ. चाय की खेती में तापमान का संतुलन बेहद जरूरी होता है, और इस बार मौसम ने साथ नहीं दिया.

केरल और कर्नाटक भी अछूते नहीं रहे

केरल के मुन्नार क्षेत्र में भी लंबे समय तक ठंडी हवाएं और कम तापमान बना रहा. इससे वहां का उत्पादन करीब 10 प्रतिशत घटकर 4.37 मिलियन किलोग्राम पर आ गया, जबकि पिछले साल यह लगभग 4.87 मिलियन किलोग्राम था.

कर्नाटक में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई. वहां उत्पादन 0.37 मिलियन किलोग्राम से घटकर करीब 0.28 मिलियन किलोग्राम रह गया. हालांकि यह गिरावट तमिलनाडु जितनी गंभीर नहीं थी, लेकिन कुल मिलाकर दक्षिण भारत के आंकड़े कमजोर रहे.

दक्षिण भारत में 28 प्रतिशत की बड़ी गिरावट

अगर पूरे दक्षिण भारत की बात करें तो जनवरी में यहां का कुल उत्पादन लगभग 12.35 मिलियन किलोग्राम रहा, जो पिछले साल के 17.08 मिलियन किलोग्राम से करीब 28 प्रतिशत कम है. यह गिरावट साफ दिखाती है कि मौसम का असर क्षेत्रीय स्तर पर कितना गहरा रहा. दक्षिण भारत खासकर सर्दियों में भी उत्पादन जारी रखता है, इसलिए यहां की गिरावट का सीधा असर राष्ट्रीय उत्पादन पर पड़ा.

उत्तर भारत में अलग स्थिति

उत्तर भारत के असम और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख चाय उत्पादक राज्यों में सर्दियों के दौरान चाय के पौधे सामान्य तौर पर विश्राम की अवस्था में रहते हैं. इसे डॉर्मेंसी पीरियड कहा जाता है. इसलिए जनवरी में वहां उत्पादन बहुत कम रहता है.

इस साल जनवरी में उत्तर भारत से कुल लगभग 2.15 मिलियन किलोग्राम उत्पादन दर्ज हुआ, जो पिछले साल की तुलना में थोड़ा अधिक रहा. असम और पश्चिम बंगाल में मामूली बढ़ोतरी देखी गई, लेकिन यह दक्षिण भारत की कमी की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं थी.

किस प्रकार की चाय पर पड़ा असर

श्रेणी के अनुसार देखें तो जनवरी में सीटीसी (CTC) चाय का उत्पादन लगभग 11.34 मिलियन किलोग्राम रहा. ऑर्थोडॉक्स चाय का उत्पादन करीब 2.79 मिलियन किलोग्राम और ग्रीन टी का उत्पादन लगभग 0.37 मिलियन किलोग्राम दर्ज किया गया.

दक्षिण भारत खासकर ऑर्थोडॉक्स और कुछ विशेष किस्मों की चाय के लिए जाना जाता है. इसलिए वहां की गिरावट से निर्यात बाजार पर भी असर पड़ सकता है.

आगे क्या असर हो सकता है

उत्पादन में गिरावट का सीधा असर बाजार में कीमतों पर पड़ सकता है. यदि आने वाले महीनों में मौसम सामान्य रहता है तो स्थिति संभल सकती है, लेकिन अगर ठंड या अन्य मौसमीय बाधाएं बनी रहीं तो सालभर के उत्पादन लक्ष्य पर असर पड़ने की आशंका है.

कई उत्पादकों का मानना है कि अब जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. कभी अचानक पाला, तो कभी लंबे समय तक सूखा या अत्यधिक बारिश—इन सबका असर चाय जैसी संवेदनशील फसल पर जल्दी दिखाई देता है.

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