रबर की कमी से टायर फैक्ट्रियों पर लग सकता है ब्रेक, अब ATMA ने उठाए तीखे सवाल

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस समय प्राकृतिक रबर का पीक उत्पादन सीजन माना जाता है. आमतौर पर इसी दौर में बाजार में रबर की आवक सबसे ज्यादा होती है. बावजूद इसके, टायर निर्माता कंपनियां पर्याप्त मात्रा में रबर जुटाने के लिए संघर्ष कर रही हैं.

नई दिल्ली | Published: 27 Jan, 2026 | 03:42 PM

Natural rubber shortage: देश में ऑटोमोबाइल सेक्टर की रफ्तार तेज है, सड़कों पर गाड़ियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और टायरों की मांग भी हर साल नए रिकॉर्ड बना रही है. लेकिन इसी बीच टायर उद्योग के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी होती नजर आ रही है. प्राकृतिक रबर की उपलब्धता में आई भारी कमी ने टायर कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है. उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो उत्पादन से लेकर बाजार आपूर्ति तक पर असर पड़ सकता है.

रबर की कमी क्यों बन रही है बड़ी समस्या

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, प्राकृतिक रबर टायर निर्माण की सबसे अहम कच्ची सामग्री है. टायर बनाना कोई ऐसा काम नहीं है जिसे बीच में रोका और फिर शुरू कर लिया जाए. यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. ऐसे में अगर रबर की सप्लाई में लंबे समय तक रुकावट आती है, तो फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप होने का खतरा बढ़ जाता है. ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ATMA) ने इसी को लेकर चिंता जताई है और कहा है कि मौजूदा हालात उद्योग के लिए गंभीर संकेत दे रहे हैं.

पीक सीजन में भी नहीं मिल रहा रबर

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस समय प्राकृतिक रबर का पीक उत्पादन सीजन माना जाता है. आमतौर पर इसी दौर में बाजार में रबर की आवक सबसे ज्यादा होती है. बावजूद इसके, टायर निर्माता कंपनियां पर्याप्त मात्रा में रबर जुटाने के लिए संघर्ष कर रही हैं. ATMA के चेयरमैन अरुण मैमन के अनुसार, मौसम से जुड़ी कुछ दिक्कतें समझ में आती हैं, लेकिन मौजूदा कमी का स्तर बताता है कि समस्या सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे संरचनात्मक और बाजार से जुड़े कारण भी हो सकते हैं.

बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई परेशानी

प्राकृतिक रबर की कमी का सीधा असर इसकी कीमतों पर भी दिखने लगा है. बाजार में रबर के दाम लगातार चढ़ रहे हैं और अब यह करीब 200 रुपये प्रति किलो के आसपास पहुंच चुके हैं. इससे टायर कंपनियों की लागत बढ़ रही है, जिसका असर आगे चलकर गाड़ियों और टायरों की कीमतों पर भी पड़ सकता है. उद्योग का मानना है कि अगर यह स्थिति बनी रही, तो आम उपभोक्ता की जेब पर भी इसका बोझ पड़ेगा.

बीमारी और मौसम भी बने कारण

रबर उत्पादन में गिरावट के पीछे कुछ प्राकृतिक कारण भी हैं. पारंपरिक रबर उत्पादक इलाकों में पत्तों के झड़ने से जुड़ी बीमारी और बढ़ते तापमान ने उत्पादन को प्रभावित किया है. इससे रबर के पेड़ों से मिलने वाला लेटेक्स कम हुआ है. हालांकि उद्योग का कहना है कि सिर्फ इन कारणों से इतनी बड़ी कमी को पूरी तरह नहीं समझाया जा सकता.

जमाखोरी की आशंका

ATMA ने यह भी आशंका जताई है कि कुछ कारोबारी कीमतों में और तेजी की उम्मीद में रबर की जमाखोरी कर रहे हैं. इससे बाजार में उपलब्धता और कम हो रही है. संगठन का कहना है कि इस तरह की सट्टेबाजी और जमाखोरी पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है, ताकि हालात और न बिगड़ें.

आंकड़ों और हकीकत में अंतर

टायर उद्योग ने रबर बोर्ड के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए हैं. रबर बोर्ड के अनुसार अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच प्राकृतिक रबर उत्पादन में करीब 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन उद्योग के आकलन के मुताबिक, इसी अवधि में उत्पादन करीब 8 प्रतिशत तक घटा है. यही नहीं, बोर्ड द्वारा बताए गए रबर स्टॉक के आंकड़े भी जमीनी सच्चाई से मेल नहीं खाते. इसी वजह से ATMA ने रबर बोर्ड से स्वतंत्र और निष्पक्ष आकलन कराने की मांग की है, ताकि सही तस्वीर सामने आ सके.

बिना टैपिंग वाले बागानों की ओर ध्यान

रबर बोर्ड के अनुमान के मुताबिक देश में करीब दो लाख हेक्टेयर रबर बागान ऐसे हैं, जहां अभी टैपिंग नहीं हो रही है. टायर उद्योग का मानना है कि अगर इन बागानों को सक्रिय किया जाए, तो घरेलू सप्लाई में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हो सकती है. फिलहाल भारत अपनी कुल प्राकृतिक रबर जरूरत का सिर्फ 60 प्रतिशत ही घरेलू उत्पादन से पूरा कर पा रहा है.

आयात पर राहत की मांग

बढ़ते संकट को देखते हुए टायर उद्योग ने सरकार से एक बार फिर सीमित मात्रा में बिना शुल्क प्राकृतिक रबर आयात की अनुमति देने की मांग दोहराई है. उद्योग का कहना है कि घरेलू कमी को पूरा करने के लिए यह कदम जरूरी है. साथ ही रबर बोर्ड और सरकार से तुरंत हस्तक्षेप करने, सप्लाई को स्थिर करने और जमाखोरी पर रोक लगाने की अपील भी की गई है.

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