तेल कंपनियों पर ग्राहकों को गुमराह करने का आरोप, SOPA ने सरकार से की सख्त नियम बनाने की मांग

संगठन ने केंद्र सरकार से साफ तौर पर कहा है कि खाने के तेल के पैक साइज को फिर से मानक बनाया जाए. यानी हर कंपनी को तय साइज में ही पैकेट बेचना होगा, जिससे ग्राहकों को तुलना करने में आसानी हो. साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर नया नियम लागू किया जाता है, तो कंपनियों को थोड़ा समय दिया जाए, ताकि वे अपने सिस्टम में बदलाव कर सकें.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 29 Apr, 2026 | 03:29 PM

Edible oil packaging: आजकल बाजार में मिलने वाले खाने के तेल के पैकेट को देखकर कई बार लोगों को समझ ही नहीं आता कि कौन सा सस्ता है और कौन महंगा. यही समस्या अब बड़े स्तर पर सामने आ रही है. सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया(SOPA) ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए सरकार से तुरंत कदम उठाने की मांग की है. संगठन का कहना है कि कंपनियां अलग-अलग और अजीब पैक साइज बनाकर ग्राहकों को भ्रमित कर रही हैं.

आखिर क्या है पूरा मामला?

SOPA के मुताबिक, कई तेल कंपनियां अब ऐसे पैकेट बाजार में ला रही हैं जिनका आकार तो लगभग एक जैसा दिखता है, लेकिन उनमें तेल की मात्रा अलग-अलग होती है. उदाहरण के तौर पर, दो पैकेट देखने में समान लगते हैं, लेकिन एक में 880 मिलीलीटर तेल होता है और दूसरे में 910 मिलीलीटर. ऐसे में ग्राहक अक्सर सस्ता दिखने वाला पैकेट खरीद लेते हैं, यह सोचकर कि उन्हें फायदा हो रहा है, जबकि असल में प्रति लीटर कीमत ज्यादा पड़ जाती है. यानी दिखने में सस्ता, लेकिन असल में महंगा.

प्रति यूनिट कीमत लिखने से क्यों नहीं सुलझ रही समस्या?

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, सरकार ने पहले नियम बनाया था कि हर पैकेट पर प्रति यूनिट कीमत (जैसे प्रति मिलीलीटर या प्रति ग्राम) लिखी जाए, ताकि ग्राहक आसानी से तुलना कर सकें. लेकिन SOPA का कहना है कि आम ग्राहक इतनी गणना नहीं करता. जब कीमत पैसों और दशमलव में लिखी होती है, जैसे 24.72 पैसे प्रति मिलीलीटर, तो उसे समझना और उसे लीटर में बदलकर तुलना करना आसान नहीं होता. इसलिए लोग सिर्फ पैकेट का साइज और कुल कीमत देखकर ही फैसला लेते हैं.

कंपनियों पर क्या आरोप है?

SOPA का कहना है कि कुछ कंपनियां इस छूट का गलत फायदा उठा रही हैं. सरकार ने अच्छे इरादे से पैक साइज की पाबंदियां हटाई थीं, लेकिन अब इसका गलत इस्तेमाल हो रहा है. कई ब्रांड एक ही तेल को 15-20 अलग-अलग पैक साइज में बेच रहे हैं. इनमें से कई पैकेट देखने में लगभग एक जैसे होते हैं, लेकिन उनमें मात्रा का फर्क सिर्फ 25 या 50 ग्राम का होता है. इससे ग्राहक आसानी से भ्रमित हो जाता है.

ईमानदार कंपनियों पर भी पड़ रहा असर

इस स्थिति का असर उन कंपनियों पर भी पड़ रहा है जो सही तरीके से काम करना चाहती हैं. SOPA के अनुसार, बाजार में प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि उन्हें भी मजबूरी में ऐसे पैक साइज अपनाने पड़ रहे हैं, वरना वे पीछे रह जाएंगी. इससे पूरा बाजार असंतुलित हो रहा है और पारदर्शिता खत्म होती जा रही है.

SOPA ने सरकार से क्या मांग की?

संगठन ने केंद्र सरकार से साफ तौर पर कहा है कि खाने के तेल के पैक साइज को फिर से मानक बनाया जाए. यानी हर कंपनी को तय साइज में ही पैकेट बेचना होगा, जिससे ग्राहकों को तुलना करने में आसानी हो. साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर नया नियम लागू किया जाता है, तो कंपनियों को थोड़ा समय दिया जाए, ताकि वे अपने सिस्टम में बदलाव कर सकें.

ग्राहकों के लिए क्यों जरूरी है यह कदम?

यह मुद्दा सीधे आम आदमी से जुड़ा है, क्योंकि खाने का तेल हर घर की जरूरत है. अगर ग्राहक सही कीमत और मात्रा को समझ नहीं पाएगा, तो वह अनजाने में ज्यादा पैसा खर्च करेगा. इसलिए जरूरी है कि बाजार में साफ और आसान नियम हों, जिससे ग्राहक बिना किसी भ्रम के सही चुनाव कर सके.

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