क्रिसिल रिपोर्ट: वैश्विक तनाव से सूरजमुखी तेल हुआ महंगा, लोगों के लिए राइस ब्रान- सोयाबीन बने नए विकल्प

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष. इस कारण सप्लाई चेन पर असर पड़ा है और सूरजमुखी तेल की उपलब्धता कम हो गई है. जब बाजार में किसी चीज की सप्लाई कम होती है, तो उसकी कीमत अपने आप बढ़ने लगती है. यही सूरजमुखी तेल के साथ भी हो रहा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Updated On: 3 Apr, 2026 | 10:51 AM

sunflower oil demand: आजकल किचन का खर्च पहले से ज्यादा महसूस होने लगा है, और इसकी एक बड़ी वजह है खाने के तेलों की बढ़ती कीमतें. खासकर सूरजमुखी तेल अब आम लोगों की पहुंच से धीरे-धीरे दूर होता नजर आ रहा है. हालात ऐसे बन रहे हैं कि इस वित्त वर्ष में भारत में सूरजमुखी तेल की खपत करीब 10 प्रतिशत तक घट सकती है. क्रिसिल रिपोर्ट के अनुसार, इसके पीछे सिर्फ महंगाई ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय हालात भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.

आखिर क्यों घट रही है मांग?

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष. इस कारण सप्लाई चेन पर असर पड़ा है और सूरजमुखी तेल की उपलब्धता कम हो गई है. जब बाजार में किसी चीज की सप्लाई कम होती है, तो उसकी कीमत अपने आप बढ़ने लगती है. यही सूरजमुखी तेल के साथ भी हो रहा है.

कीमत बढ़ने के कारण अब लोग धीरे-धीरे दूसरे सस्ते विकल्पों की ओर जा रहे हैं. राइस ब्रान ऑयल और सोयाबीन तेल इस समय सूरजमुखी तेल से 10 से 20 रुपये प्रति लीटर तक सस्ते मिल रहे हैं, इसलिए लोग इन्हें ज्यादा पसंद कर रहे हैं.

कीमतों में कितना फर्क आया?

अगर हाल के महीनों की बात करें, तो जनवरी 2026 में सूरजमुखी तेल करीब 150 रुपये प्रति लीटर मिल रहा था. लेकिन अब इसकी कीमत बढ़कर 170 से 175 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है. यानी कुछ ही महीनों में 20-25 रुपये का सीधा इजाफा हुआ है.

कच्चे सूरजमुखी तेल की आयात कीमत भी काफी बढ़ी है. पहले यह करीब 1275 डॉलर प्रति टन थी, जो अब बढ़कर 1420 से 1440 डॉलर प्रति टन के बीच पहुंच गई है. ऊपर से रुपये की कमजोरी और शिपिंग खर्च बढ़ने से भारत में इसकी लागत और ज्यादा हो गई है.

भारत क्यों है ज्यादा प्रभावित?

भारत में सूरजमुखी तेल की खपत कुल खाद्य तेल उपयोग का लगभग 12 से 14 प्रतिशत हिस्सा है. देश में हर साल करीब 25 से 26 मिलियन टन खाद्य तेल की खपत होती है, जिसमें सूरजमुखी तेल की अच्छी हिस्सेदारी है.

लेकिन समस्या यह है कि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, खासकर यूक्रेन और रूस से. ऐसे में जब वैश्विक स्तर पर युद्ध या तनाव होता है, तो इसका सीधा असर भारत की सप्लाई और कीमतों पर पड़ता है.

सप्लाई में क्या दिक्कत आ रही है?

अभी जहाजों को तेल लेकर आने में ज्यादा दूरी तय करनी पड़ रही है, जैसे केप ऑफ गुड होप के रास्ते से जाना पड़ रहा है. इससे समय और खर्च दोनों बढ़ गए हैं. इसके अलावा, युद्ध वाले क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों का बीमा भी महंगा हो गया है. इन सब वजहों से भारत में आने वाले सूरजमुखी तेल की लागत बढ़ गई है, और इसका बोझ आखिरकार आम उपभोक्ता को ही उठाना पड़ रहा है.

कंपनियों की स्थिति कैसी है?

दिलचस्प बात यह है कि खपत घटने के बावजूद कंपनियों की कमाई पर ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला है. कंपनियां बढ़ी हुई लागत को धीरे-धीरे ग्राहकों तक पहुंचा रही हैं. साथ ही, पहले से सस्ते दाम पर खरीदा गया स्टॉक भी उन्हें फायदा दे रहा है. इसी कारण उनकी मुनाफा दर करीब 4.8 से 5 प्रतिशत के आसपास बनी रहने की उम्मीद है.

स्टॉक भी हुआ कम

आमतौर पर कंपनियां 30 से 45 दिन का स्टॉक रखती हैं, लेकिन अभी यह घटकर 20 से 30 दिन रह गया है. इसका मतलब है कि बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और कंपनियां ज्यादा जोखिम नहीं लेना चाहतीं. हालांकि, कम स्टॉक होने से कंपनियों का कुछ पैसा फंसा नहीं रहता, जिससे उनकी नकदी स्थिति थोड़ी बेहतर हो जाती है.

अगर अंतरराष्ट्रीय हालात ऐसे ही बने रहे, तो सूरजमुखी तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं. इससे लोगों का रुझान और ज्यादा सस्ते तेलों की तरफ जाएगा.

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Published: 3 Apr, 2026 | 10:20 AM
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