पंजाब की मिर्च का दुबई में जलवा, 15 टन हुआ निर्यात.. आखिर क्यों बढ़ रही मांग ?
निर्यात के लिए तैयारी सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने पहले छोटे स्तर पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया और फिर उसे बड़े स्तर पर बढ़ाया. इसके तहत मखू बेल्ट जैसे क्षेत्रों में समूहों में नियंत्रित खेती की गई. मुख्य कृषि अधिकारी बलविंदर सिंह के अनुसार, फसल को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार सख्त कृषि तकनीकों के तहत उगाया गया, ताकि बड़े पैमाने पर निर्यात से पहले गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके.
Chilli Export: पंजाब के सीमावर्ती जिले फिरोजपुर ने खेती के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. यहां उगाई गई हरी मिर्च पहली बार दुबई के बाजारों तक पहुंची है, जिसे राज्य से इस फसल का पहला विदेशी निर्यात माना जा रहा है. हाल ही में जिले से 15 मीट्रिक टन हरी मिर्च की पहली खेप भेजी गई है. यह इस बात का संकेत है कि किसान अब पारंपरिक गेहूं-धान की खेती से हटकर ज्यादा मुनाफे वाली और निर्यात आधारित फसलों की ओर बढ़ रहे हैं.
फिरोजपुर में करीब 5,000 किसान लगभग 12,000 हेक्टेयर क्षेत्र में मिर्च की खेती कर रहे हैं, जिससे यह जिला पंजाब में मिर्च उत्पादन में सबसे आगे है. पूरे राज्य में मिर्च की खेती करीब 19,661 हेक्टेयर में हो रही है और कुल उत्पादन लगभग 2,94,915 मीट्रिक टन है. डिप्टी कमिश्नर दीपशिखा शर्मा ने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से कहा कि साल 2017 में मिर्च की खेती का क्षेत्र करीब 2,000 एकड़ था, जो 2024-25 में बढ़कर लगभग 12,000 एकड़ हो गया है और अब सालाना उत्पादन 20,000 टन से ज्यादा हो चुका है. उन्होंने कहा कि इस बदलाव के पीछे संस्थागत स्तर पर किए गए समन्वित प्रयासों का बड़ा योगदान है. जिला स्तरीय निर्यात प्रोत्साहन समिति ने विदेश व्यापार महानिदेशालय के साथ मिलकर नीतियों, गुणवत्ता मानकों, लॉजिस्टिक्स और बाजार संपर्क को बेहतर तरीके से जोड़ा, ताकि हरी मिर्च को ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ योजना के तहत एक प्रमुख निर्यात फसल बनाया जा सके.
छोटे स्तर पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू
निर्यात के लिए तैयारी सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने पहले छोटे स्तर पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया और फिर उसे बड़े स्तर पर बढ़ाया. इसके तहत मखू बेल्ट जैसे क्षेत्रों में समूहों में नियंत्रित खेती की गई. मुख्य कृषि अधिकारी बलविंदर सिंह के अनुसार, फसल को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार सख्त कृषि तकनीकों के तहत उगाया गया, ताकि बड़े पैमाने पर निर्यात से पहले गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके.
प्रति एकड़ लगभग 3.5 गुना अधिक मुनाफा
बागवानी विकास अधिकारी और मिर्च के नोडल अधिकारी डॉ सिमरन सिंह ने कहा कि GRIP 3.0 (ग्रासरूट इनोवेशन प्रोग्राम) जैसे कार्यक्रमों के तहत वैज्ञानिक तकनीकों और किसानों की नई पहल से मिर्च की पैदावार और गुणवत्ता में सुधार हुआ है. उन्होंने कहा कि निर्यातकों और फूड प्रोसेसिंग कंपनियों से मजबूत जुड़ाव होने के कारण उत्पादन की बिक्री सुनिश्चित हुई है और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन भी बेहतर तरीके से हो रहा है. आर्थिक रूप से भी किसानों को अच्छा फायदा मिल रहा है. हालांकि मिर्च की खेती में लागत ज्यादा है, लेकिन यह गेहूं की तुलना में प्रति एकड़ लगभग 3.5 गुना अधिक मुनाफा देती है. एक सीजन में 6 से 8 बार फसल लेने की वजह से किसानों को लगातार आय मिलती रहती है.
मिर्च की खेती से किसानों की बढ़ी इनकम
आर्थिक लाभ के साथ-साथ यह खेती का मॉडल पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है. इसमें इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट, जैव उर्वरकों और फसल अवशेषों के उपयोग से रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम हुई है और मिट्टी की सेहत में सुधार हुआ है. सर्दियों में खेती करने से कीटों का प्रकोप भी कम होता है, जिससे उत्पाद की गुणवत्ता और निर्यात क्षमता बढ़ती है. दस्तुआल साहिब के किसान मनप्रीत सिंह ने कहा कि इस मॉडल से खेती ज्यादा टिकाऊ हुई है. मिर्च की तुड़ाई में ज्यादा श्रम की जरूरत होने से बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार मिला है, जिससे परिवारों की आय और आर्थिक स्वतंत्रता दोनों बढ़ी हैं.
मिर्च विकास केंद्र की स्थापना की गई
इस बदलाव में संस्थागत समर्थन की अहम भूमिका रही है. नीति आयोग के आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत मिर्च विकास केंद्र की स्थापना की गई है. इसके साथ ही PMFME (प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना) और राष्ट्रीय बागवानी मिशन जैसी योजनाओं ने किसानों को प्रशिक्षण, प्रोसेसिंग और बाजार तक पहुंच में मदद दी है. किसान उत्पादक संगठनों ने उत्पादन को एकत्र कर निर्यात को भी आसान बनाया है.