ईंधन और ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ने के साथ ही अंडे, चिकन और प्रोटीन से भरपूर अन्य जरूरी चीजों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की आशंका बढ़ गई है. क्योंकि, बढ़ते तापमान और हीटवेव से पोल्ट्री, एक्वाकल्चर और एनीमल सेक्टर पहले से ही घटते उत्पादन का दबाव झेल रहा है. अब वैश्विक हालातों के चलते फीड के लिए कच्चे माल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है. इसके अलावा अब ताजा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिर से इजाफा होने से किसानों और ट्रेडर्स को नुकसान का दबाव बढ़ गया है.
मक्का और सोयाबीन की ढुलाई महंगी
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर पोल्ट्री और एक्वाकल्चर (मछली, झींगा, केकड़ा आदि) फीड सेक्टर पर दिखता है, क्योंकि मक्का, सोयाबीन और अन्य कच्चे माल की ढुलाई महंगी हो जाती है. ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ने से पोल्ट्री फीड बनाने की लागत भी बढ़ती है, जिसका असर अंडे और चिकन की कीमतों पर दिखाई देता है. इसके अलावा बिजली और उत्पादन लागत बढ़ने से पोल्ट्री फार्मर्स का मुनाफा घट सकता है और छोटे कारोबारियों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है.
ग्राहकों को लग सकता है महंगाई का झटका
भारतीय मिश्रित पशु आहार निर्माता संघ (CLFMA) के चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी ने बताया कि ईंधन कीमतों से परिवहन और कृषि के साथ ही उससे जुड़े क्षेत्रों में बार-बार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. डीजल की ज्यादा कीमतें एनीमल फीड बनाने के सामान, पोल्ट्री उत्पादों और अन्य कृषि चीजों को ट्रांसपोर्ट करने की लागत को बढ़ा रही हैं, जिससे पूरी सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में चिकेन, अंडे, एक्वाकल्चर उत्पादों की कीमतों में बढ़ोत्तरी का झटका लग सकता है.
पोल्ट्री और एक्वाकल्चर में लागत का 70 फीसदी हिस्सा फीड का
उन्होंने कहा कि पोल्ट्री और एक्वाकल्चर (मछली, झींगा, केकड़ा आदि) में उत्पादन लागत का लगभग 60–70 फीसदी हिस्सा फीड का होता है, इसलिए लॉजिस्टिक्स खर्चों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी का किसानों के मुनाफे और ग्राहकों के लिए कीमतों पर सीधा असर पड़ता है. ऐसे समय में जब किसान और कृषि से जुड़े कारोबार पहले से ही कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक सप्लाई चेन की चुनौतियों से जूझ रहे हैं. ईंधन की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी से जरूरी खाद्य उत्पादों को घरेलू और निर्यात, दोनों ही बाजारों में किफायती और प्रतिस्पर्धी बनाए रखना और भी मुश्किल होता जा रहा है.
पोल्ट्री और एक्वाकल्चर किसानों को नुकसान
ट्रांसपोर्टेशन की ज्यादा लागत पूरी वैल्यू चेन पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है. फीड बनाने वालों से लेकर पोल्ट्री और एक्वाकल्चर किसानों तक नुकसान के खतरे के साथ ही लागत बढ़ रही है. इस बोझ को कम करने के लिए सरकार को कृषि क्षेत्र के लिए ईंधन करों को तर्कसंगत बनाने, रेल और जल आधारित ट्रांसपोर्टेशन में सुधार करने के साथ ही कृषि लॉजिस्टिक्स के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने जैसे कदमों पर विचार करना चाहिए.
स्थानीय स्तर पर सामान खरीदने और फीड उत्पादन को सेंट्रालाइज करने को बढ़ावा देने से भी लंबी दूरी के ट्रांसपोर्टेशन पर निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है. इनपुट लागत को स्थिर रखना न केवल किसानों और कृषि से जुड़े कारोबारों को सहारा देने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि ग्राहकों के लिए प्रोटीन से भरपूर किफायती खाद्य उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भी जरूरी है.
भीषण गर्मी में पहले से खर्च बढ़ने से टेंशन में पोल्ट्री सेक्टर
किसानों को पशुओं और पोल्ट्री को गर्मी के तनाव से निपटने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ता है. इसमें कूलिंग सिस्टम, हवादार व्यवस्था, पानी की आपूर्ति और बिजली के इस्तेमाल पर होने वाला निवेश शामिल है. मुर्गी पालन और डेयरी जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता में थोड़ी सी भी गिरावट मुनाफे पर बहुत बुरा असर डालती है, क्योंकि इन क्षेत्रों में लागत का ढांचा पहले से ही बहुत कसा हुआ होता है. इसके अलावा लू का असर चारे और दाने की गुणवत्ता और उपलब्धता पर भी पड़ता है. फसलों की पैदावार कम होने या ऊपर-नीचे होने से चारे की कीमतें बढ़ जाती हैं. इससे पूरी उत्पादन श्रृंखला (value chain) में मुनाफा और भी कम हो जाता है.