दालों को लेकर भारत-अमेरिका के बीच बढ़ी तनातनी, टैरिफ विवाद में ट्रंप से हस्तक्षेप की मांग
अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है और वैश्विक खपत का करीब 27 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में होता है. भारत में मसूर, चना, सूखी फलियां और मटर जैसी दालें रोजमर्रा के खाने का अहम हिस्सा हैं. इसके बावजूद भारत ने इन दालों के आयात पर भारी शुल्क लगा रखा है.
अमेरिका और भारत के बीच कृषि व्यापार एक बार फिर चर्चा में आ गया है. इस बार मुद्दा दालों का है, जिसे लेकर अमेरिका के बड़े दाल उत्पादक राज्यों के नेताओं ने चिंता जताई है. अमेरिका के दो वरिष्ठ सांसदों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अपील की है कि वे भारत के साथ होने वाले किसी भी भविष्य के व्यापार समझौते में दालों पर लगने वाले ऊंचे शुल्क को कम कराने के लिए दखल दें. उनका कहना है कि भारत द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ की वजह से अमेरिकी दाल उत्पादक वैश्विक बाजार में पिछड़ते जा रहे हैं.
भारत सबसे बड़ा उपभोक्ता, लेकिन रास्ता मुश्किल
अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है और वैश्विक खपत का करीब 27 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में होता है. भारत में मसूर, चना, सूखी फलियां और मटर जैसी दालें रोजमर्रा के खाने का अहम हिस्सा हैं. इसके बावजूद भारत ने इन दालों के आयात पर भारी शुल्क लगा रखा है, जिससे अमेरिकी किसानों के लिए भारतीय बाजार में अपनी उपज बेचना बेहद मुश्किल हो गया है.
मोंटाना और नॉर्थ डकोटा की चिंता
यह पत्र मोंटाना और नॉर्थ डकोटा से आने वाले दो रिपब्लिकन सांसदों ने लिखा है. इन राज्यों को अमेरिका में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक माना जाता है, खासकर मटर जैसी फसलों में. सांसदों का कहना है कि भारत की मौजूदा नीति की वजह से अमेरिकी किसानों को “अनुचित प्रतिस्पर्धा” का सामना करना पड़ रहा है, जबकि उनके उत्पाद गुणवत्ता के मामले में किसी से कम नहीं हैं.
30 फीसदी शुल्क बना बड़ा रोड़ा
पत्र में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि भारत ने पिछले साल 30 अक्टूबर को पीली मटर पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने की घोषणा की थी, जो 1 नवंबर 2025 से लागू हो गया. इसके बाद अमेरिकी दालों की भारत में कीमत काफी बढ़ गई और उनकी मांग पर असर पड़ा. सांसदों का कहना है कि इस तरह के फैसले अमेरिकी किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गए हैं.
ट्रंप से फिर उम्मीद
अमेरिकी सांसदों ने अपने पत्र में यह भी याद दिलाया कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी उन्होंने यही मुद्दा उठाया था. उस समय राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद उनका पत्र भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा था. सांसदों का दावा है कि उस पहल से अमेरिकी किसानों को बातचीत की मेज तक पहुंचने में मदद मिली थी. अब एक बार फिर वे ट्रंप से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से उठाएंगे.
दोनों देशों को होगा फायदा
सांसदों का मानना है कि अगर भारत दालों पर लगाए गए टैरिफ में नरमी दिखाता है, तो इससे दोनों देशों को फायदा होगा. एक तरफ अमेरिकी किसानों को बड़ा बाजार मिलेगा, वहीं दूसरी ओर भारतीय उपभोक्ताओं को दालें सस्ते दामों पर मिल सकेंगी. उन्होंने इसे भारत-अमेरिका आर्थिक सहयोग को मजबूत करने वाला कदम बताया है.
पुराने फैसलों का असर अब भी जारी
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि 2019 में भारत को अमेरिका की जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) सूची से हटाए जाने के बाद भारतीय टैरिफ और सख्त हो गए थे. इसके चलते अमेरिकी कृषि निर्यातकों को पहले से ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा. सांसदों का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि इन व्यापारिक असंतुलनों को दूर किया जाए.
फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति ट्रंप इस मांग पर क्या रुख अपनाते हैं. अगर भारत और अमेरिका के बीच नए व्यापार समझौते की बातचीत आगे बढ़ती है, तो दालों का मुद्दा एक अहम एजेंडा बन सकता है. अमेरिकी सांसदों का साफ कहना है कि उनके किसान दुनिया को भोजन उपलब्ध कराने की पूरी क्षमता रखते हैं, बस उन्हें निष्पक्ष व्यापार का मौका मिलना चाहिए.