Peanut Exports: दक्षिण–पूर्व एशिया में भारतीय मूंगफली के व्यापार को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. इंडोनेशिया ने भले ही भारत से मूंगफली के आयात पर सख्ती की हो, लेकिन इसके बावजूद वहां भारतीय मूंगफली की अवैध खेपें लगातार पहुंच रही हैं. ताजा हालात यह हैं कि मलेशिया के रास्ते इंडोनेशिया तक मूंगफली पहुंचाने का एक पूरा गैरकानूनी नेटवर्क सक्रिय हो गया है, जिससे न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं, बल्कि भारतीय कृषि निर्यात की साख पर भी असर पड़ने का खतरा बढ़ गया है.
मलेशिया के रास्ते इंडोनेशिया पहुंच रही मूंगफली
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, भारत से मूंगफली की खेप पहले मलेशिया के पोर्ट क्लांग पहुंचाई जाती है. वहां इसे ‘ट्रांजिट कार्गो’ बताकर उतार लिया जाता है. इसके बाद छोटे जहाजों और बार्ज के जरिए मूंगफली को इंडोनेशिया के डुमाई बंदरगाह तक पहुंचाया जाता है. डुमाई को पहले से ही इंडोनेशिया का एक संवेदनशील और तस्करी वाला बंदरगाह माना जाता है. यहां से यह माल सड़क मार्ग से जकार्ता और सुराबाया जैसे बड़े शहरों तक भेज दिया जाता है.
बताया जा रहा है कि नवंबर में जहां आधिकारिक रास्ते से केवल कुछ दर्जन कंटेनर ही इंडोनेशिया पहुंचे, वहीं अवैध रास्ते से सैकड़ों कंटेनर मूंगफली वहां उतारी गईं. इससे यह साफ हो जाता है कि इंडोनेशिया में पहुंच रही मूंगफली का बड़ा हिस्सा गैरकानूनी तरीके से जा रहा है.
आंकड़ों ने खोली सच्चाई
सरकारी और व्यापारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो सितंबर 2025 तक भारत से मूंगफली का निर्यात कभी 6,500 टन से ऊपर नहीं गया था. लेकिन अक्टूबर से इसमें अचानक तेज उछाल देखने को मिला. अक्टूबर में मलेशिया को भेजी गई मूंगफली 8,000 टन से ज्यादा हो गई, नवंबर में यह आंकड़ा करीब 16,000 टन तक पहुंच गया और दिसंबर में भी 15,000 टन के आसपास बना रहा. जबकि मलेशिया की सालाना जरूरत करीब 55,000 टन ही होती है. ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर आयात ने व्यापार जगत को चौंका दिया है.
कागजी रिकॉर्ड गायब, नकद में सौदे
इस अवैध कारोबार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कोई पक्का कागजी रिकॉर्ड नहीं होता. जैसे ही मूंगफली पोर्ट क्लांग पर उतरती है, उसके बाद खेप का मालिकाना बदल जाता है. न तो सही इनवॉइस बनते हैं और न ही खरीद-बिक्री के दस्तावेज. पूरा लेन-देन नकद में होता है. इंडोनेशिया में दूसरे स्तर के खरीदार भी नकद सौदे ही पसंद करते हैं, ताकि टैक्स और ट्रेसिंग से बचा जा सके. हालांकि बड़ी फूड फैक्ट्रियां इस रास्ते से माल नहीं ले पातीं, क्योंकि उन्हें टैक्स छूट और आधिकारिक कागजात की जरूरत होती है.
घरेलू दामों पर असर
अवैध मूंगफली की बाढ़ का असर इंडोनेशिया के घरेलू बाजार पर भी साफ दिखने लगा है. वहां मूंगफली के दाम 35,000 इंडोनेशियाई रुपिया प्रति किलो से गिरकर 30,000–32,000 रुपिया प्रति किलो तक आ गए हैं. इन दामों में भी तस्करों और नाव संचालकों का कमीशन शामिल है. स्थानीय प्रशासन और टैक्स विभाग डुमाई बंदरगाह पर नजर रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन व्यापार सूत्रों का कहना है कि कई बार पैसों के दम पर रास्ता निकाल लिया जाता है.
गुणवत्ता और अफ्लाटॉक्सिन की बड़ी चुनौती
इस साल भारतीय मूंगफली की गुणवत्ता भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है. खरीफ सीजन में बारिश के कारण सुखाने की प्रक्रिया प्रभावित हुई, खासकर सितंबर–अक्टूबर में. इससे मूंगफली में अफ्लाटॉक्सिन का स्तर काफी बढ़ गया. इंडोनेशिया में इसकी अधिकतम सीमा 15 पीपीबी है, जबकि भारत में 20 पीपीबी तक की अनुमति है. लेकिन इस साल कई खेपों में अफ्लाटॉक्सिन का स्तर तय सीमा से कई गुना ज्यादा पाया गया. यही वजह है कि हाल ही में एक भारतीय निर्यातक पर प्रतिबंध भी लगाया गया.
चीन और थाईलैंड की सख्ती
स्थिति तब और जटिल हो गई जब चीन ने अपने साझेदार देशों को निर्देश दिए कि वे मूंगफली की गुणवत्ता जांच सख्त करें और चीनी उत्पादकों से ज्यादा खरीद करें. इसके बाद थाईलैंड ने जून 2025 से भारत से मूंगफली के आयात पर रोक लगा दी. अब केवल कुछ चुनिंदा भारतीय निर्यातकों को ही वहां भेजने की अनुमति है. इंडोनेशिया ने भी मान्य निर्यातकों की संख्या घटाकर करीब 75 कर दी है.
भारतीय निर्यात के लिए चेतावनी
इन हालातों ने भारतीय मूंगफली निर्यात के सामने बड़ी चेतावनी खड़ी कर दी है. अगर अवैध रास्तों से होने वाला यह कारोबार नहीं रुका और गुणवत्ता पर सख्ती नहीं बरती गई, तो आने वाले समय में भारत को और बड़े बाजारों से हाथ धोना पड़ सकता है. व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि अब जरूरत है पारदर्शी सप्लाई चेन, सख्त गुणवत्ता नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पूरी तरह पालन करने की, ताकि भारतीय कृषि उत्पादों की साख बनी रह सके.