ट्रेड डील का साइड इफेक्ट: अमेरिकी आयात से लुढ़के मक्का-सोयाबीन के दाम, खेती पर मंडराया संकट

India US trade deal: भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख नेता राकेश टिकैत ने इस फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई है. उन्होंने कहा कि किसानों को अंधेरे में रखकर ऐसा समझौता किया गया है, जो कृषि क्षेत्र के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. हालांकि, व्यापारी मानते हैं कि बाजार में मनोवैज्ञानिक डर ज्यादा असर डाल रहा है.

नई दिल्ली | Published: 12 Feb, 2026 | 11:03 AM

India US trade deal: भारत के कृषि बाजार में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. अमेरिका और भारत के बीच हुए नए व्यापार समझौते के बाद देश में मक्का और सोयाबीन की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है. इस समझौते के तहत अमेरिका से सोया तेल और पशु आहार से जुड़े कुछ उत्पाद बिना शुल्क के भारत आने की अनुमति दी गई है. जैसे ही यह जानकारी बाजार में पहुंची, किसानों और व्यापारियों के बीच बेचैनी बढ़ गई. खासकर छोटे और मध्यम किसानों को डर सता रहा है कि सस्ते आयात से उनकी फसलों की कीमतें और नीचे जा सकती हैं.

नए ट्रेड डील से क्यों बदला बाजार का मिजाज

पिछले सप्ताह भारत और अमेरिका ने एक अंतरिम व्यापार ढांचे की घोषणा की थी. इस संयुक्त बयान में कहा गया कि भारत अमेरिका से ड्यूटी-फ्री सोया ऑयल और डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स (DDGS) का आयात करेगा. DDGS मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन का उप-उत्पाद होता है, जिसका इस्तेमाल पशु चारे के रूप में किया जाता है. इसी घोषणा के बाद घरेलू बाजार में आशंका पैदा हो गई कि सस्ते अमेरिकी उत्पाद भारतीय किसानों की फसलों से प्रतिस्पर्धा करेंगे.

सोयाबीन और मक्का के दामों में तेज गिरावट

ट्रेड डील की घोषणा के बाद से अब तक सोयाबीन के दामों में करीब 10 प्रतिशत और मक्का के भाव में लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है. बाजार सूत्रों के अनुसार, मक्का इस समय करीब 1,820 रुपये प्रति 100 किलो के आसपास कारोबार कर रहा है, जबकि सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,400 रुपये प्रति 100 किलो है. यानी किसान पहले से ही लागत और बाजार भाव के बीच फंसे हुए हैं.

रिकॉर्ड उत्पादन, लेकिन मांग कमजोर

इकोनॉमिक्स टाइम्स की खबर के अनुसार, कृषि मंत्रालय के अनुमान बताते हैं कि इस बार खरीफ सीजन में भारत का मक्का उत्पादन 14 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 28.3 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच गया है. उत्पादन बढ़ने के बावजूद घरेलू मांग कमजोर बनी हुई है. इथेनॉल उद्योग से खरीद घटने और पशु चारा निर्माताओं की सुस्त मांग ने हालात और मुश्किल बना दिए हैं. ऐसे में DDGS जैसे सस्ते आयात की आशंका से बाजार पर अतिरिक्त दबाव बन गया है.

असर सीमित या गहरा?

हैदराबाद स्थित आईएलए कमोडिटीज प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हरिश गलीपेल्ली का कहना है कि DDGS आयात की वजह से कीमतों पर दबाव तो बना है, लेकिन इसका तात्कालिक असर सीमित रह सकता है. उनके अनुसार, घरेलू आपूर्ति और मांग का संतुलन तय करेगा कि यह गिरावट कितनी गहरी जाती है. हालांकि, व्यापारी मानते हैं कि बाजार में मनोवैज्ञानिक डर ज्यादा असर डाल रहा है.

किसानों और यूनियनों में नाराजगी

किसान संगठनों का कहना है कि सरकार ने यह समझौता किसानों से चर्चा किए बिना किया. भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख नेता राकेश टिकैत ने इस फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई है. उन्होंने कहा कि किसानों को अंधेरे में रखकर ऐसा समझौता किया गया है, जो कृषि क्षेत्र के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. टिकैत ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने इस दिशा में कदम वापस नहीं लिए तो 12 फरवरी को देशभर में विरोध प्रदर्शन किया जाएगा और आगे आंदोलन को और तेज किया जाएगा.

2020–21 के आंदोलन की यादें ताजा

मक्का और सोयाबीन के दाम गिरने से किसानों को 2020–21 के बड़े किसान आंदोलन की यादें फिर से सताने लगी हैं. उस समय भी बाजार सुधार के नाम पर लाए गए कानूनों के खिलाफ किसानों ने महीनों तक आंदोलन किया था, जिसके बाद सरकार को वे कानून वापस लेने पड़े थे. मौजूदा हालात में भी किसानों को डर है कि बाजार एक बार फिर उनके खिलाफ जा रहा है.

फिलहाल साफ है कि अमेरिका से सस्ते आयात की संभावना ने कृषि बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है. सरकार जहां इसे व्यापार और उपभोक्ताओं के हित में बता रही है, वहीं किसान इसे अपनी आमदनी पर सीधा खतरा मान रहे हैं. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार किसानों की चिंताओं को कैसे संबोधित करती है और बाजार को स्थिर रखने के लिए क्या कदम उठाती है.

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