वैश्विक संकट ने भारतीय कृषि को झकझोरा, बढ़ती लागत और शिपिंग संकट के बीच फंसे किसान

अनाज की तुलना में फल और सब्जियां जल्दी खराब हो जाती हैं, इसलिए यह संकट इनके लिए ज्यादा गंभीर है. रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र से ही करीब 16,000 टन अंगूर का निर्यात प्रभावित हुआ है, जिसमें से 5,000-6,000 टन माल बंदरगाहों पर खराब होने के खतरे में है.

नई दिल्ली | Published: 9 Apr, 2026 | 09:21 AM

West Asia conflict agriculture impact: पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध अब भारत के कृषि क्षेत्र पर भी असर डालने लगा है. पहले यह संकट सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित लग रहा था, लेकिन अब इसका असर खेतों, किसानों और बाजार तक साफ दिखाई दे रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत के कृषि क्षेत्र के लिए “डबल झटका” साबित हो रही है एक तरफ खेती से पहले लागत बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ फसल तैयार होने के बाद उसे बाजार तक पहुंचाने में दिक्कत आ रही है.

खेती से पहले बढ़ती लागत ने बढ़ाई चिंता

इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार, सबसे पहला असर खेती की लागत पर देखने को मिल रहा है. युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे कृषि से जुड़े कई जरूरी इनपुट महंगे हो गए हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, तेल की कीमतें करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 105-120 डॉलर तक पहुंच गई हैं. इसका सीधा असर खाद, कीटनाशक और परिवहन लागत पर पड़ा है. विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ एक महीने में ही खेती की लागत 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ गई है. इसका मतलब यह है कि किसानों को अब पहले से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, जिससे उनकी आय पर दबाव बढ़ सकता है.

उर्वरक और कच्चे माल की सप्लाई पर दबाव

युद्ध के कारण सप्लाई चेन भी प्रभावित हुई है. खासकर उर्वरकों और रसायनों के कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि फिलहाल कोई बड़ी कमी नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है, खासकर खरीफ सीजन के दौरान. अगर यह स्थिति लंबी चली, तो खेती की उत्पादकता पर असर पड़ सकता है और उत्पादन घट सकता है.

फसल तैयार, लेकिन बाजार तक पहुंचने में दिक्कत

जहां एक तरफ खेती की लागत बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ तैयार फसल को निर्यात करने में भी बड़ी मुश्किलें सामने आ रही हैं. पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण शिपिंग रूट प्रभावित हुए हैं, जिससे हजारों कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं.

करीब 800 से 1000 कंटेनर, जिनमें अंगूर, केला, अनार, तरबूज और सब्जियां शामिल हैं, समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.

खराब हो रही फल-सब्जियां, बढ़ा नुकसान

अनाज की तुलना में फल और सब्जियां जल्दी खराब हो जाती हैं, इसलिए यह संकट इनके लिए ज्यादा गंभीर है. रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र से ही करीब 16,000 टन अंगूर का निर्यात प्रभावित हुआ है, जिसमें से 5,000-6,000 टन माल बंदरगाहों पर खराब होने के खतरे में है. हर एक कंटेनर में करीब 24 लाख रुपये का माल होता है, ऐसे में कुल नुकसान सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.

घरेलू बाजार में गिर गए दाम

जब निर्यात नहीं हो पा रहा है, तो वही फल और सब्जियां घरेलू बाजार में आ रही हैं. इससे बाजार में सप्लाई बढ़ गई है और कीमतें गिर गई हैं. उदाहरण के तौर पर, आंध्र प्रदेश में केले की कीमत 23,000 रुपये प्रति टन से गिरकर 6,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है, जो करीब 74 प्रतिशत की गिरावट है. इससे किसानों को दोहरा नुकसान हो रहा है एक तरफ लागत बढ़ी, दूसरी तरफ फसल का दाम घट गया.

श्रमिकों की कमी ने बढ़ाई परेशानी

इस संकट का असर कृषि श्रम पर भी पड़ा है. LPG की कीमतों और जीवन यापन की लागत बढ़ने से शहरों में काम करने वाले मजदूर वापस अपने गांव लौट रहे हैं. दिल्ली, मुंबई और सूरत जैसे शहरों से बड़ी संख्या में मजदूर लौट रहे हैं, जिससे खेतों में काम करने के लिए श्रमिकों की कमी हो गई है. कई जगह मजदूरों ने दोगुनी मजदूरी की मांग शुरू कर दी है, जिससे किसानों की लागत और बढ़ गई है.

फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय पर कटाई, पैकिंग और शिपमेंट नहीं हो पाती, तो फसल की गुणवत्ता खराब हो सकती है. खासकर बागवानी फसलों में 2-3 दिन की देरी भी नुकसान बढ़ा सकती है. इससे किसानों को बाजार में कम दाम मिल सकता है.

खाद्यान्न भंडार मजबूत, लेकिन चिंता बनी

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश में अनाज का भंडार फिलहाल पर्याप्त है. करीब 60 मिलियन टन से ज्यादा गेहूं और चावल का स्टॉक मौजूद है, जो जरूरत से काफी ज्यादा है. इससे फिलहाल खाद्यान्न की कमी का खतरा नहीं है, लेकिन फल-सब्जियों और अन्य नाशवान उत्पादों के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है.

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