गर्मी बढ़ते ही करेला फसल पर कीटों का हमला, समय रहते अपनाएं ये बचाव उपाय

कई बार खेत में मेहनत करने के बाद भी कीट और बीमारियां पूरी फसल को नुकसान पहुंचा देती हैं. खासकर गर्मी के मौसम में करेला की बेल पर तरह-तरह की समस्याएं दिखने लगती हैं. अगर किसान समय रहते इनके लक्षण पहचान लें और सही कदम उठा लें, तो बड़ी हानि से बचा जा सकता है.

नई दिल्ली | Updated On: 28 Feb, 2026 | 11:06 AM

Bitter gourd farming: करेला की खेती आज कई किसानों के लिए अच्छी आमदनी का जरिया बन चुकी है. बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है और सेहत के लिहाज से भी यह सब्जी काफी फायदेमंद मानी जाती है. लेकिन कई बार खेत में मेहनत करने के बाद भी कीट और बीमारियां पूरी फसल को नुकसान पहुंचा देती हैं. खासकर गर्मी के मौसम में करेला की बेल पर तरह-तरह की समस्याएं दिखने लगती हैं. सरकारी वेबसाइट ppqs.gov.in के अनुसार, अगर किसान समय रहते इनके लक्षण पहचान लें और सही कदम उठा लें, तो बड़ी हानि से बचा जा सकता है.

रैड बीटल: छोटे पौधों का बड़ा दुश्मन

करेला की फसल जब छोटी होती है, तब रैड बीटल का खतरा ज्यादा रहता है. यह चमकीले रंग का कीट पत्तियों को कुतरकर खा जाता है. धीरे-धीरे पौधा कमजोर पड़ने लगता है और उसकी बढ़वार रुक जाती है. इसकी सूंडी मिट्टी में जाकर जड़ों को काट देती है, जिससे पौधा अचानक मुरझा सकता है.

इससे बचने के लिए किसान को रोजाना खेत का निरीक्षण करना चाहिए. अगर पत्तियों पर कीट दिखें तो तुरंत नीम आधारित दवा का छिड़काव करें. प्रकोप ज्यादा हो तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह से उचित कीटनाशक का इस्तेमाल किया जा सकता है. समय पर नियंत्रण से फसल को आसानी से बचाया जा सकता है.

पाउडरी मिल्ड्यू: सफेद चूर्ण जैसा रोग

अगर पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसा पदार्थ दिखने लगे, तो समझिए पाउडरी मिल्ड्यू रोग का हमला है. शुरुआत में छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं, जो बाद में पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं. पत्तियां पीली होकर सूखने लगती हैं और बेल की ताकत कम हो जाती है.

इस रोग से बचने के लिए खेत में हवा का अच्छा प्रवाह जरूरी है. बेलों को बहुत ज्यादा घना न होने दें. जैविक उपाय के तौर पर छाछ और गौमूत्र का घोल बनाकर छिड़काव करना लाभदायक होता है. जरूरत पड़ने पर फफूंदनाशक दवाओं का सीमित और सही मात्रा में प्रयोग किया जा सकता है.

एन्थ्रेक्नोज: काले धब्बों से सावधान

एन्थ्रेक्नोज रोग में पत्तियों पर काले या भूरे धब्बे दिखाई देते हैं. धीरे-धीरे यह धब्बे बढ़ने लगते हैं और पौधा कमजोर हो जाता है. अगर समय पर इलाज न किया जाए तो फल भी प्रभावित हो सकते हैं और उनकी गुणवत्ता घट जाती है.

खेत की साफ-सफाई इस रोग से बचाव का पहला कदम है. संक्रमित पत्तियों को तोड़कर खेत से बाहर कर दें. नीम और लहसुन से बना जैविक घोल भी काफी असरदार होता है. ज्यादा फैलाव होने पर कृषि सलाह के अनुसार फफूंदनाशक का प्रयोग किया जा सकता है.

चूर्णिल आसिता: पूरा पौधा ढकने वाला रोग

इस बीमारी में पत्तियों और तनों पर सफेद धुंधली परत बन जाती है, जो बाद में चूर्ण की तरह दिखने लगती है. अगर इसे अनदेखा किया जाए तो पूरा पौधा प्रभावित हो सकता है और फलों का आकार छोटा रह जाता है.

बचाव के लिए रोगग्रस्त पौधों को हटाकर नष्ट करना जरूरी है. नियमित अंतराल पर उचित दवा का छिड़काव करने से इस रोग को काबू में रखा जा सकता है.

मोजेक रोग: पत्तियों में रंग बदलने की समस्या

मोजेक रोग वायरस से फैलता है. इसमें पत्तियां सिकुड़ जाती हैं और उन पर हरे-पीले धब्बे दिखाई देते हैं. पौधा बौना रह जाता है और फल कम लगते हैं. यह रोग अक्सर सफेद मक्खी जैसे कीटों से फैलता है.

इसका सीधा इलाज नहीं है, इसलिए रोकथाम ही सबसे बड़ा उपाय है. संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करें. सफेद मक्खी को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर उचित दवा का छिड़काव करें और खेत में पीले चिपचिपे ट्रैप लगाएं.

सही देखभाल से मिलेगा बेहतर मुनाफा

करेला की अच्छी फसल के लिए संतुलित खाद, समय पर सिंचाई और खेत की नियमित निगरानी बहुत जरूरी है. पानी का जमाव न होने दें और फसल चक्र अपनाएं. जैविक और रासायनिक उपायों का संतुलित उपयोग करें.

अगर किसान इन बातों का ध्यान रखें और बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचान लें, तो करेला की फसल सुरक्षित रहेगी और उत्पादन भी अच्छा मिलेगा. सही समय पर उठाया गया छोटा कदम, पूरे सीजन की मेहनत को बचा सकता है और अच्छी कमाई का रास्ता खोल सकता है.

Published: 28 Feb, 2026 | 10:52 AM

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