‘पहाड़ों का काला सोना’ है यह फसल, खेती करने पर होगी मोटी कमाई.. जानें बुवाई का तरीका
काला जीरा का स्वाद सामान्य जीरे की तुलना में ज्यादा गहरा और तीखा होता है, क्योंकि इसके बीज बड़े और गहरे रंग के होते हैं. यह कई तरह के व्यंजनों के स्वाद को और बेहतर बना देता है. काला जीरा का इस्तेमाल हिमाचली खाने में बहुत आम है, जैसे दाल, करी, अचार और चटनी में. अक्सर इसे हल्का भूनकर पीसा जाता है, ताकि इसका स्वाद और खुशबू और भी बढ़ जाए.
Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश का नाम आते ही लोगों के जहन में सबसे पहले मीठे सेब की तस्वीर उभरकर सामने आती है. क्योंकि लोगों को लगता है कि हिमाचल प्रदेश में केवल सेब की ही खेती होती है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. यहां पर किसान बड़े स्तर पर काला जीरा की भी खेती करते हैं. यह जीरा अपने खुशबू और बेहतरीन फ्लेवर के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. यही वजह है कि इसे जीआई टैग मिला हुआ है. यह अपनी तेज खुशबू, मिट्टी जैसे स्वाद और औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है. स्थानीय लोग इसे ‘पहाड़ों का काला सोना’ भी कहते हैं.
हिमाचली काला जीरा को ‘शाह जीरा’ भी कहा जाता है. हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में पाया जाने वाला एक कीमती औषधीय मसाला है. यह मुख्य रूप से किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा और शिमला जैसे क्षेत्रों में 1850 से 3100 मीटर की ऊंचाई पर उगता है. ऐसे हिमाचली काला जीरा पाचन के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है और इसमें सूजन कम करने वाले तथा एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं. पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग पेट दर्द, मधुमेह और मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं में किया जाता है. इसका स्वाद हल्का कड़वा, तीखा और नटी होता है. इसे दाल, करी, अचार और हिमाचल की प्रसिद्ध नमकीन चाय में इस्तेमाल किया जाता है.
खाने का बढ़ाता है स्वाद
पहले यह मुख्य रूप से जंगली रूप में मिलता था, लेकिन अब किन्नौर के सांगला सहित कई क्षेत्रों में किसान इसकी खेती कर रहे हैं, जिससे यह उनकी आमदनी का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है. इसमें कई जरूरी विटामिन और खनिज भी पाए जाते हैं. यह मसाला न केवल खाने का स्वाद बढ़ाता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी काफी फायदेमंद है और अब इसकी मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बढ़ रही है.
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इन ब्यंजनों में आता है काम
काला जीरा का स्वाद सामान्य जीरे की तुलना में ज्यादा गहरा और तीखा होता है, क्योंकि इसके बीज बड़े और गहरे रंग के होते हैं. यह कई तरह के व्यंजनों के स्वाद को और बेहतर बना देता है. काला जीरा का इस्तेमाल हिमाचली खाने में बहुत आम है, जैसे दाल, करी, अचार और चटनी में. अक्सर इसे हल्का भूनकर पीसा जाता है, ताकि इसका स्वाद और खुशबू और भी बढ़ जाए. इसे साबुत रूप में तड़के में भी डाला जाता है और चावल के व्यंजनों में सुगंध बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यह मसाला पाचन के लिए अच्छा माना जाता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है.
ठंडा और शुष्क मौसम खेती लिए अनुकूल
काला जीरा की खेती के लिए ठंडा और शुष्क मौसम सबसे अच्छा माना जाता है. इसके लिए रेतीली-दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है, क्योंकि इसमें पौधे अच्छे से बढ़ते हैं. इसकी बुवाई अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है. इसे कतारों में बोना बेहतर होता है, जिसमें एक कतार से दूसरी कतार की दूरी लगभग 30 सेमी और बीज की गहराई 2 से 2.5 सेमी रखी जाती है. प्रति हेक्टेयर 5 से 7 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. यह फसल 3 से 4 साल में अच्छी उपज देने लगती है.
बुवाई से पहले ऐसे तैयार करें खेत
खेत की तैयारी के लिए 2 से 3 बार गहरी जुताई करके मिट्टी को अच्छी तरह भुरभुरा बना लिया जाता है. आखिरी जुताई के समय खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) मिलाना जरूरी होता है, जिससे फसल की बढ़वार अच्छी होती है. काला जीरा की फसल को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, हल्की सिंचाई ही पर्याप्त होती है क्योंकि अधिक पानी फसल को नुकसान पहुंचा सकता है. खेत में समय-समय पर निराई-गुड़ाई करके खरपतवार को हटाना जरूरी होता है. जब पौधे पूरी तरह सूख जाते हैं, तब उनकी कटाई की जाती है. यह एक बहुवर्षीय फसल है, जो 3 से 4 साल बाद अच्छी पैदावार देती है. इसका बाजार में अच्छा दाम मिलता है, जिससे किसानों को अच्छा लाभ होता है. इसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर लगभग 5-10 क्विंटल है.
खबर से जुड़े जरूरी आंकड़े
- साल में 2019 में काला जीरा को मिला जीआई टैग
- प्रति हेक्टेयर 10 क्विंटल तक है पैदावार
- अक्टूबर से नवंबर में होती है बुवाई
- खेती के लिए रेतीली-दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है
- प्रति हेक्टेयर 5 से 7 किलोग्राम बीज की जरूरत
- किन्नौर जिले में होती है सबसे अधिक खेती